आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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जौंरा भौंरा दुइ हाथिन को हमरे द्वारे देयँ पछार १२८ खता माफ करि हम आल्हाकै औ कनउज माँ लेंय बसाय ॥ इतना सुनिकै सय्यद् बोले धावन पठै लेउ बुलवाय १२६ तब महराजा कनउज वाला तुरतै धावन दीन पठाय ॥ खबरि सुनाई त्यहि आल्हा को तुमको राजा रहे बुलाय १३० मीरासय्यद् तहँ बैठे हैं तिनहिन हमें दीन पठवाय ॥ इतना सुनिकै आल्हाऊदन दोऊ भाय बनाफरराय १३१ अपनी अपनी असवारिनचढ़ि तहँते कूच दीन करवाय ॥ जौंरा भौंरा मस्ता हाथी जयचंद द्वारेदीन ढिलाय १३२ आल्हा ऊदन दोऊ भाई पहुंचे तुरत द्वारपर आय ॥ जयचंद बोले तब आल्हाते मानो कही बनाफरराय १३३ हथी पछारो जो द्वारे पर तौ तकसीर माफ द्वैजाय ॥ इतना सुनिकै उदयसिंहने मनमांसुमिरिशारदामाय १३४ ताकिकै मस्तक इक हाथी के भाला हना लघुरवा भाय ॥ पैठिग भांला त्यहि हाथी के तुरतै गिरा पछारा खाय १३५ दन्त पकारकै फिरि दूसरे के ऊदन दीन्ह्यो द्वार लिटाय ॥ देखि वीरता उदयसिंह की जयचंद बहुतगयो हर्षाय १३६ बाँह पकरिकै फिरि आल्हा कै औ दरबार पहुँचा जाय ॥ कीनि खातिरी भल ऊदन की खालीमहलदीनकरवाय १३७ लै कै लश्कर तब कनउज मां बसिगे तहां बनाफरराय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डागड़ानिशाकोआय १३८ परे आलसी खटिया तकितकि सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय १३६ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहै चन्द औ सूर ॥