आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
पृष्ठ 367, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 367
१४ · आल्हखण्ड । ३६६ मान्त्रिक ललिते के तवलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १४० माथ नवावौं पितु अपनेको ह्याँ ते करौं तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छायही मोरि भगवन्त १४१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी,आई,ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयाग नारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भवद्वुकृपाशङ्करसूनु पं०ललिताप्रसादकृत आल्हा कन्नौजवासवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ आल्हा निकासी सम्पूर्ण ॥ इति ॥