भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 374

लाखनिका विवाह । ३७३ ७

ब्याहन आये लखनाको अगुआकार बनाफरराय ५६ आल्हा ऊदन के बारीहन रूपन जानो नाम हमार ॥ ऐपनवारी लै आयन है पावैं नेग आपके द्वार ५७ कीरति गावत रूपनबारी जावैं आल्हाके दरबार ॥ इतना सुनिकै राजा बोले चाहिये नेग काह तब द्वार ५८ रूपन बोले महराजाते चाहैं यही आपके द्वार ॥ दुइघंटाभरि चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ५६ कीरति गावत रूपन जावै होवै जगमें नाम तुम्हार ॥ बारी आवा बघऊदन का द्वारे कठिन कीन तलवार ६० इतना सुनिकै गंगाधर ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥ जाय न पावै रूपन बारी आरी होय लोहके घाय ६१ इतना सुनिकै रजपूतन ने अपनी खैंचिलीन तलवार ॥ रूपन बारी बेंदुल परते गरुई हाँक दीन ललकार ६२ प्राणपियारे ज्यहि होवैं ना सोई लड़ै आय सरदार ॥ धावा कीन्ह्यो रजपूतनने बेंदुल भली मचाई रार ६३ टापन मारे रजपूतन का काहू दाँतन लेय चबाय ॥ जब मनपावै सो रूपनका तड़पत उड़ा दूरलगजाय ६४ का गति वरणौं तहँ रूपनकौ दूनों हाथ करै तलवार ॥ बड़े लड़ैया बूँदीवाले तेऊ हनैं अपनी वार ६५ दुइ दश पन्द्रह बीसक तीसक गिरिगे समरभूमि मैदान ॥ देखि तमाशा गंगाधर जी द्वारे बहुत भये हैरान ६६ क्रोधित हैकै महराजा ने आपै खैंचिलीन तलवार ॥ ऐंड़ लगायो तब रूपन ने घोड़ा चला गयो वापार ६७ मारु मारु औ हल्ला करिकै पाछे चले बहुत सरदार ॥