आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ आल्हाखण्ड । ३७२ गमकैं तबला सब तम्बुन में सावन यथा मेघ गहरायँ ४६ ओढ़े सारी काशमीर की धारी शिरन सोहनी भाय ॥ बनी मोहनी अति मूरति है मूरति वरण नहीं कछु जाय ४७ ऊदन बोले तब रूपन ते ऐपनवारी दे पहुँचाय ॥ रूपनबारी तब बोलत भा दोऊ हाथ जोरि शिरंनाय ४८ ऐपनवारी बारी लैके आपन मूड़ कटावै जाय ॥ आये बारी बहु कनउज के ऐपनवारी देउ पठाय ४६ बातें सुनिकै ये रूपन की बोला फेरि बनाफरराय ॥ बाना राखै रजपूती का बारी कौन बतावै भाय ५० इतना सुनिकै रूपन बोले बेंदुल घोड़ देउ मँगवाय ॥ सुनिकै बातें उदयसिंह ने बेंदुल बाग दीन पकराय ५१ ऐपनवारी बारी लैके बेंदुल उपर भयो असवार ॥ सवापहर के फिरि अर्सा मा पहुँचाजाय नृपति के द्वार ५२ सवैया ॥ देखिकै रूपनि को दरवानि कहा इमि बानि सो बेगि सुनाई। कौनसो देश बसौ क्यहिग्राम औ कौनसोकाज गये तुम आई॥ जायकहाँ नृपसों चलिकै भलिकै निजहाल जो देउ बताई। बानि सुन्यो ललिते जब रूपनि बोलि उठ्यो तब मोदबढ़ाई ५३ ऐपनवारी बारी लावा राजै खबरि सुनावो जाय ॥ हमें पठावा आल्हा ऊंदन ब्याहनअये कन्नौजीराय ५४ इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें द्वारपाल की राजा गये दुआरे आय ५५ द्वारे आगे जब गंगाधर रूपन बोला शीश नवाय ॥