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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

६ आल्हाखण्ड । ३७२ गमकैं तबला सब तम्बुन में सावन यथा मेघ गहरायँ ४६ ओढ़े सारी काशमीर की धारी शिरन सोहनी भाय ॥ बनी मोहनी अति मूरति है मूरति वरण नहीं कछु जाय ४७ ऊदन बोले तब रूपन ते ऐपनवारी दे पहुँचाय ॥ रूपनबारी तब बोलत भा दोऊ हाथ जोरि शिरंनाय ४८ ऐपनवारी बारी लैके आपन मूड़ कटावै जाय ॥ आये बारी बहु कनउज के ऐपनवारी देउ पठाय ४६ बातें सुनिकै ये रूपन की बोला फेरि बनाफरराय ॥ बाना राखै रजपूती का बारी कौन बतावै भाय ५० इतना सुनिकै रूपन बोले बेंदुल घोड़ देउ मँगवाय ॥ सुनिकै बातें उदयसिंह ने बेंदुल बाग दीन पकराय ५१ ऐपनवारी बारी लैके बेंदुल उपर भयो असवार ॥ सवापहर के फिरि अर्सा मा पहुँचाजाय नृपति के द्वार ५२ सवैया ॥ देखिकै रूपनि को दरवानि कहा इमि बानि सो बेगि सुनाई। कौनसो देश बसौ क्यहिग्राम औ कौनसोकाज गये तुम आई॥ जायकहाँ नृपसों चलिकै भलिकै निजहाल जो देउ बताई। बानि सुन्यो ललिते जब रूपनि बोलि उठ्यो तब मोदबढ़ाई ५३ ऐपनवारी बारी लावा राजै खबरि सुनावो जाय ॥ हमें पठावा आल्हा ऊंदन ब्याहनअये कन्नौजीराय ५४ इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें द्वारपाल की राजा गये दुआरे आय ५५ द्वारे आगे जब गंगाधर रूपन बोला शीश नवाय ॥

लाखनिका विवाह । ३७३ ७

ब्याहन आये लखनाको अगुआकार बनाफरराय ५६ आल्हा ऊदन के बारीहन रूपन जानो नाम हमार ॥ ऐपनवारी लै आयन है पावैं नेग आपके द्वार ५७ कीरति गावत रूपनबारी जावैं आल्हाके दरबार ॥ इतना सुनिकै राजा बोले चाहिये नेग काह तब द्वार ५८ रूपन बोले महराजाते चाहैं यही आपके द्वार ॥ दुइघंटाभरि चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ५६ कीरति गावत रूपन जावै होवै जगमें नाम तुम्हार ॥ बारी आवा बघऊदन का द्वारे कठिन कीन तलवार ६० इतना सुनिकै गंगाधर ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥ जाय न पावै रूपन बारी आरी होय लोहके घाय ६१ इतना सुनिकै रजपूतन ने अपनी खैंचिलीन तलवार ॥ रूपन बारी बेंदुल परते गरुई हाँक दीन ललकार ६२ प्राणपियारे ज्यहि होवैं ना सोई लड़ै आय सरदार ॥ धावा कीन्ह्यो रजपूतनने बेंदुल भली मचाई रार ६३ टापन मारे रजपूतन का काहू दाँतन लेय चबाय ॥ जब मनपावै सो रूपनका तड़पत उड़ा दूरलगजाय ६४ का गति वरणौं तहँ रूपनकौ दूनों हाथ करै तलवार ॥ बड़े लड़ैया बूँदीवाले तेऊ हनैं अपनी वार ६५ दुइ दश पन्द्रह बीसक तीसक गिरिगे समरभूमि मैदान ॥ देखि तमाशा गंगाधर जी द्वारे बहुत भये हैरान ६६ क्रोधित हैकै महराजा ने आपै खैंचिलीन तलवार ॥ ऐंड़ लगायो तब रूपन ने घोड़ा चला गयो वापार ६७ मारु मारु औ हल्ला करिकै पाछे चले बहुत सरदार ॥

८ आल्हखण्ड । ३७४ उड़ा बेंडुला त्यहि समया मा तम्बुनपास गयो असवार ६८ क्षत्री लौटे बूँदी वाले बैठे आय राज दरबार ॥ रूपन बारी को देखत खन बोला उदयसिंह सरदार ६६ कैसी गुजरी कहु बूँदी में रूपन रङ्ग विरङ्गा ज्वान ॥ इतना सुनिकै रूपन बोले भैया भलो कीन मैदान ७० नामी ठाकुर का बारी है जान्यो सबै राजदरबार ॥ दुइ घण्टा भरि चली सिरोही द्वारे बही रक्तकी धार ७१ मातु शारदा तुम्हरी बशिमा लाला देशराज के लाल ॥ सरबर तुम्हरी का दुनिया मा दूसर नहीं आज नरपाल ७२ सुनो हकीकति अब बूँदी कै भारी लाग राजदरबार ॥ रूपन बारी की चरचा का खरचाहोनलाग त्यहिवार ७३ म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा पास लीन बैठाय ॥ कही हकीकति सब ऊदन की पुत्रन वार वार समुझाय ७४ जाति बनाफर की हीनी है अगुवाकार भये सो आय ॥ कैसे व्याहब हम बेटीका हँसि हैं जातिपांतिकेभाय ७५ लड़िकै जितिबे नहिं ऊदनते यहहू साँच दीन बतलाय ॥ धोखा दैकै लखराना का अब हम कैदलेयँ करवाय ७६ तौ तौ इज्जत हमरी रहिहै नहिं सब जैहै काम नशाय ॥ तुम अब जावो त्यहि तम्बूमा जहँ पर बैठ कनौजीराय ७७ समय आयगा अब भौरिनका इकलो लड़का देउ पठाय ॥ देश हमारे यह रीती है कहियो वारंवार समुझाय ७८ इतना सुनिकै चला जवाहर चारो नेगी संग लिवाय ॥ जहाँ कनौजी का तम्बूथा पहुँचा तहाँ जवाहरआय ७६ कही हकीकति सब राजा सों दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥

लाखनिका विवाह । ३७५

देश हमारे की रीती यह इकलो लड़का देउ पठाय ८० नाई बारी दूनों नेगी इनको लेवें संग लिवाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोउ हाथ जोरि शिरनाय ८१ ग्यारह नेगी औ सहिबाला इतने पठै देउ महराज ॥ इतना सुनिकै राजा बोले भावै करो तौन तुमकाज ८२ जो मन भावै सो करु ऊदन तुमको दीन पूर अधिकार ॥ बनि सहिबाला तब ऊदन गे नेगी बने और सरदार ८३ बैठि पालकी में लखराना अपनी लिये ढालतलवार ॥ संग जवाहर के चलि दीन्हे नेगीबने शूर सरदार ८४ आसा लीन्हे कोउ हाथेमा मुरछल कोऊ डुलावत जाय ॥ झण्डी लीन्हे कोऊ नेगी कोऊ रहे मशाल दिखाय ८५ बूँदी केरे नर नारी सब भारी भीर कीन अधिकाय ॥ रूप देखिकै लखराना का मनमें कामदेव शर्माय ८६ धरी पालकी गै फाटक पर बैठे सबै शूर सरदार ॥ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एकेतलवार ८७ बाहर आये तब गंगाधर औ लाखनिते कह्यो सुनाय ॥ जल्दी चलिये तुम भीतर को भौंरीसमयगयो नगच्याय ८८ इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर नेगी लीन्हे संग लिवाय ॥ भीतर पहुँचा जब मन्दिर के तहँ नहिंखम्भपरादिखराय ८६ लौटन लाग्यो जब बाहर को आये शूरवीर तब धाय ॥ मारु मारु कै हल्ला करिकै ऊदन उपर पहुँचे आय ६० चली सिरोही तब आँगनमा हाहाकार शब्दगा छाय ॥ नेगी बनिकै जे क्षत्री गे तेसब दीन्ह्यो जूझ मचाय ६१ तेरा क्षत्री कनउजवाले बूँदी केर पाँचमै जवान ॥

१० | आल्हाखण्ड । १७६ मारे मारे तलवारिन के मचिगा घोर शोर घमसान ६१ ऊदन मारैं ज्यहि क्षत्री को सो मुहभरा तुरत गिरि जाय ॥ पास न जावै कोउ ऊदन के रणमा बढ़ा बनाफरराय ६३ कागति वरणौं तहँ लाखनि कै दूनों हाथ करै तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार ६४ मोती जवाहिर दोनों भाई आँगन खूनकीन मैदान ॥ लड़ै बहादुर भीपमवाला देवा मैनपुरी चौहान ६५ घायल ह्वैकै ग्यारह नेगी आँगन गिरे पछाराखाय ॥ लाखनि ऊदन त्यहि समयमा चालिस क्षत्री दीनगिराय ६६ तबै जवाहिर सम्मुख आवा गरई हाँक देत ललकार ॥ काह सिपाहिन का मारो तुम हमरे साथ करौ तलवार ६७ इतना सुनिकै लाखनि ऊदन सम्मुख चले तुरतही धाय ॥ आगे पीछे चौगिर्दा ते परिगे गाँस फाँसमें आय ६८ लाखनि ऊदन दोऊ ठाकुर मोती कैदलीन करवाय ॥ घैहानेगी जे आँगन में तिनहुन तुरतलीन बँधवाय ६९ लाखनि ऊदन दोउ क्षत्रिनको राजै खंदक दीनडराय ॥ यह सुधिपाई जब मालिनिने कुसुमा पास पहुँची जाय १०० हाल बतायो त्यहि बेटी को मालिनि बार बार समुझाय ॥ ब्याहन तुमका लाखनि आये राजै खन्दक दीन डराय १०१ देश देश में जब फिरि आये टीका लीन कनौजीराय ॥ ऐस मुनासिब नहिं राजाको जोअबदीन्हेनिजझमचाय १०२ गली गली में यह चरचाहै नीकिन कीन बात महराज ॥ रूप उजागर सब गुण आगर खन्दक परे तुम्हारेकाज १०३ इतना सुनिकै कुसुमा बेटी मनमें बारबार पछिताय ॥

लाखनका विवाह । ३७७ ११- हमें न भाई यह आली है तुमते साँच दीन बतलाय १०४ बयस बराबरीकी मालिनि हौ अब गाढ़े माँ होउ सहाय ॥ राति अँधेरिया की बिरिया है खन्दक मोहिंदेइ दिखराय १०५ मोरे कारण महराजा सुत कैदी भये यहांपर आय ॥ उत्तम शय्या केरि स्ववैया खन्दकदीन बाप डरवाय १०६ मोहिं दिखावै त्यहि क्षत्री को जियरा धीरधरा ना जाय ॥ इतना सुनिकै मालिनि दौरी पलकीलाई तुरतलिआय १०७ बैठि पालकी मा दूनो फिरि खन्दक पास गई नियराय ॥ दीन अशर्फी तहँ चकरन का तिनफिरतहाँदीनपहुँचाय १०८ कुसुमा बोली तहँ लाखनि ते स्वामी बार बार बलिजायँ ॥ मोहिं अभागिनि के कारणसों तुमपरबिपतिपरीअधिकाय१०६ अब तुम निकरो यहि खन्दकते रस्ता देउँ कन्त लटकाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय ११० जो तुम चाहौ लखराना को फौजन खबरि देउ पहुँचाय ॥ चहै सहारा जो नारी को तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय १११ शंका लावो मन अन्तर ना महलन जाउ तड़ाका धाय ॥ खबरि पायकै आल्हा ठाकुर हमरीबिपतिविदरिहैंआय११२ कुसुमा बोली फिरि ऊदन ते क्षत्री भोजन देउँ पठाय ॥ ऊदन बोले तब कुसुमा ते यहनहिंउचितयहाँपरआय११३ चोरी चोरा कछु दैहै ना शाहंशाह कनौजीराय ॥ भोर भवरहरे मुरगा बोलत फौजन खबरिदेउ पठवाय ११४ और न चाहें कछु तुमते ये साँचे हाल दीन बतलाय ॥ इतना सुनिकै कुसुमा बेटी महलनफेरिपहुँची आय ११५ सोचत सोचत राति पारभे प्रातःकाल गयो नगणाय ॥

१२ आल्हखण्ड । ३७८ कहि समुझावा तब मालिनिको फौजन तुरतदीन पठवाय ११६ नाइनि बारिनि तेलि तँबोलिनि मालिनिधोबिनि के समुदाय ॥ साँची दूती रस ग्रन्थन में भाषा चतुरन खूब बनाय ११७ सोई मालिनि चलि बूँदी ते फौजन अटी तड़ाका धाय ॥ पता लगायो तहँ आल्हा को चँकरन तम्बूदीन बताय ११८ बेला चमेलिन के हरवा को मालिनि तुरत दीन पहिराय ॥ कह्यो सँदेशा तहँ ऊदन का मालिनि वारवार सब गाय ११९ जो सुधि पावैं बूँदी वाले हमरो पेट देयँ फरवाय ॥ भुसा भरावैं ते पेटेमा तुमकासाँच दीन बतलाय १२० इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर मुहरें सात दीन पकराय ॥ मालिनि चलिभै तब फौजनते बेटी पास पहुँची आय १२१ खबरिसुनाई सब जयचँद को आल्हा वार वार समुझाय ॥ तब महराजा कनउज वाला डंका तुरतदीन बजवाय १२२ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न मे असवार ॥ झीलमबख्तर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार १२३ तोपैं चढ़ि गईं सब चर्खन मा गोला तुरत दीन छुटवाय ॥ चढ़े जवाहर औ मोती दोउ तोपनआगिदीनलगवाय १२४ तोपैं छूटीं दुहुँ तरफा ते धुवना रहा सरग में छाय ॥ बड़ी दुर्दशा भै तोपन मा तबफिरिमारुवन्द है जाय १२५ गोली ओला सम वर्षत भइँ सननन सन्न सन्न सन्नाय ॥ दुनो गोल आगे का बढ़िगे सम्मुख भये समरमें आय १२६ भाला बलछी तलवारिन की लागी होन भड़ाभड़ मार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १२७ ना मुहँ फेरैं बूँदी वाले ना ई कनउज के सरदार ॥

लाखनिका विवाह। ३७५ १३ शूर सिपाही सम्मुख रहिगे कायरछोड़िभागि हथियार १२८ कटि कटि मूड़ गिरैं धरणीमा उठि उठि रुण्ड करें तलवार ॥ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औरुरुडूनके लाग पहार १२६ सात कोस के तहँ गिर्दा मा कौवा गीध रहे मड़राय ॥ घैहा करहैं समरभूमि मा दैया बापू रहे मचाय १३० हाय रुपैया बैरी द्वैगे हमरे गई प्राणपर आय ॥ सात रुपैया के कारण ते छूटे लोग कुटुम औभाय १३१ तहिले बिरिया मै संध्या कै तब फिरि मारु बन्द है जाय ॥ जीबे लायक जितने घैहा तिनकीलोथिल्रीनउठवाय १३२ दईलाख दल कनउज वाला बूँदी डेढ़लाख सरदार ॥ इतने जूझे दुहुँ तरफा ते करिकरि मारुतहाँपरयार १३३ आल्हा आये जब तम्बू मा आसनअगलगीनबिछवाय ॥ श्वास चढ़ाई फिरि ऊपर का शारदसुमिरिबनाफरराय १३४ बिनती कीन्ही भल शारद की आल्हा बार बार शिरनाय ॥ तव अवलम्बा जगदम्बा है दूसर करिहै कौन सहाय १३५ बिनती करिकै आल्हा ठाकुर सोये सेज आपनी जाय ॥ देबी शारदा महिरवाली निशिमास्वप्न दिखायो आय १३६ मलखे ब्रह्मा को बुलगाओ द्वैहै जीति बनाफरराय ॥ स्वपन देखिकै आल्हा ठाकुर प्रातःकाल उठे हर्षाय १३७ लिखिकै चिट्ठी मलखाने को धावन हाथ दीन पठवाय ॥ चढ़ा साँड़िया मा धावन तब सिरसागढ़ै पहुँवाजाय १३८ चिट्ठी दीन्ही मलखाने को धावन बार बार शिरनाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी मलखेठाकुर औ यहबोले वचनसुनाय १३९ हम समुझावा भल ऊदन का सिरसा बसो बनाफरराय ॥

१४ आल्हाखण्ड । ३८० कहा न माना आल्हा ऊदन खन्दकपरे लहुरवाभाय १४० मनते हमरे यह आवति है की बूँदी का जाय वलाय ॥ जैसो कीन्हेोनि तस फलपायनि दूनोभाय बनाफरराय १४१ करैं तयारी नहिं बूँदी की तवहूं ठीक नहीं ठहराय ॥ इतना कहिकै मलखेठाकुर फौजनहुकुमदीनकरवाय १४२ करो तयारी सब बूँदी की खन्दक परा लहुरवाभाय ॥ इतना कहिकै मलखेठाकुर अपने महल पहुँचेजाय १४३ पढ़िकै चिट्ठी गजमोतिनि को मलखे हाल दीन समुझाय ॥ हम ना जैबै अब बूँदी का प्यारी साँच दीन बतलाय १४४ इतना सुनिकै प्यारी बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आजु साँकरा बघऊदन का स्वामीगाढ़े होउ सहाय १४५ बिना सहायक अब दादा को स्वामीदुःख होय अधिकाय ॥ आजु साँकरा है दादापर यहुदिनपरीरोज ना आय १४६ ब्याना सहिबे घबरानिन का होई पीर रोज अधिकार ॥ धर्म विहीनी हीनी ह्वैकै जीनो जन्मजनमधिकार १४७ धर्म न रहै जब देही मा करि है कौन्दकाहि उपकार ॥ धर्म निशाना मर्दाना है अर्जुनसकदीनोकसरदार १४८ सारथि कीन्ह्यो नारायण जे ध्रुव कृष्ण कहि दीन्ह्यो महराज ॥ बुद्धीद्वारा करि दिखलावा ताकी राखि लई सबके काज १४६ करौं किहानी जो पूरी मैं ताको सिन्ध बड़ा विस्तार ॥ सुनी किहानी जो विप्रन ते सोई कहौ सत्य भतार १५० ह्रवै दवाई दुखदाई यह नींवी हरै अनेकन रोग ॥ जो कोउ पीवै चंगा होवै याको कैस नीक संयोग १५१ धर्म दवाइन के पीने मा स्वामिन सत्य सत्य आरोग ॥

लाखनिका विवाह । ३८१ १५ ताते जावो तुम बूँदी को होवै पूर हमारो भोग १५२ बातैं सुनिकै गजमोतिनि की मलखे धरा पीठिपर हाथ ॥ होय पियारी अस नारी जो तवहीं रहे धर्म की पाथ १५३ बड़ी पियारी निज नारी को मलखे बार बार समुझाय ॥ गये दुवारा फिरि माता घर चलिभेचरणकमलशिरनाय १५४ घोड़ी कबूतरीपर चढ़ि बैठे डंका तुरत दीन बजवाय ॥ लैके लश्कर मोहबे आये जहँ पर रहें चँदेलेराय १५५ आय सिंहासन के लगभग में ठाढ़े भये शीश को नाय ॥ आल्हा ऊदन की गाथा को मलखे गये तहाँ परगाय १५६ भयो बुलौवा हम ब्रह्माका आयसु कहामिलै महराज ॥ परम दयालू चित तुम्हरो है स्वामीपूँछि करौं मैं काज १५७ गुरु पितु भ्राता अरु त्राता तुम हमरे सदा चँदेलेराय ॥ आज्ञापावों महराजा कै तौ ऊदनका लवों छुड़ाय १५८ सुनिकै बातैं मलखाने की आयसु दीन रजापरिमाल ॥ लैके ब्रह्माको जावो तुम दूनों बहू हमारेबाल १५६ माथनाइ कै महराजा को मल्हना महल पहुँचे जाय ॥ चिट्ठी पढ़ि तँह आल्हा की मलखेदीनसकलसमुझाय १६० विपदा सुनिकै बघऊदन कै मल्हना रोयदीन त्यहिबार ॥ हाथ पकरिकै फिरि ब्रह्माको बोली लेउ पूत तलवार १६१ क्षत्री द्वैकै समर सकावै जावै तुरत नरक के द्वार ॥ परम पियारे सुतजावो तुम हमरो पूरहोय उपकार १६२ इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर अपनी लीन ढाल तलवार ॥ बिदा मांगिकै पितु मातासों दोऊ चलत भये सरदार १६३ सजिगा घोड़ा हरनागर जो तापर ब्रह्मा भये सवार ॥

१६ आल्हखण्ड । ३८२ घोड़ी कबूतरी की पीठोपर मलखे सिरसाका सरदार १६४ बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर त्यहि बार ॥ शङ्का फंका करि डंका तहँ बाजे घोर शोर ललकार १६५ रहा कलङ्का नहिं देही माँ ऐसे कहत चलैं सब यार ॥ पंद्रादिनका धावा करिकै बूँदी निकट गये सरदार १६६ झील देखिकै मलखाने ने तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ॥ लाले पीले नीले काले सबरँग ध्वजा रहे फहराय १६७ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण कछु चमकन लागे पक्षी चले बसेरन धाय १६८ परे आलसी खटिया तकि तकि संतन धुनी दीन परचाय ॥ भस्म लगायो सब अंगन में ध्यायो चरित पुरातन गाय १६६ शिवा रमा ब्रह्माणी पति के मनमें चरित रहे सुलगाय ॥ बड़े यशस्वी पितु अपने के दोऊचरणकमलकोध्याय १७० करों तरंग यहां सों पूरण दोऊ गणपतिचरण मनाय ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं लेवैं आपन मोहिं बनाय १७१ इति श्रीलखनऊनिवसि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबू प्रयाग नारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखान बड़ाईवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सवैया ॥ सत्यहैं वेद पुराण सबै मति एक असत्य यहै लखिपावा । मतिही के असत्य असत्य सबै यह सत्यहि २ सत्य बतावा ॥ बेद पुराण भूलनहीं यह भूल असत्य मती ठहरावा । ललिते मति सत्यासत्य निवारण वेद पुराणन ने दर्शावा १

लाखनिका विवाह । ३८३ :१७ सुमिरन ॥ बेदन ध्यावों सामबेद को बिप्रन परशुराम महराज ॥ क्षत्रिन ध्यावों रामकृष्ण को बैश्यन नन्दभये शिरताज १ शूद्रन ध्यावों मैं निषाद को कीशन पवनतनय बलवान ॥ ईशन ध्यावों शिवशङ्कर को शीशनबढ़ा दशानन ज्वान २ ध्याय नदीशनमें बड़वानल पक्षिन बैनतेय महराज ॥ ध्याय गिरीशन में हिमपर्वत नारिन जनकसुता शिरताज ३ कुँवारिन ध्यावैं हम राधाको राखैं सदा हमारी लाज ॥ परम पियारी यदुनन्दन की हमरी माननीय शिरताज ४ सबै पुस्तकन में दुर्गा जी अबहूं बिप्रन की रखवार ॥ खूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब बूँदी हाल सुनो यहिबार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ देखिकै फौजै मलखाने की बोला तुरत कनौजीराय ॥ फौजै आई हैं बूँदी ते आल्हा देखु भीर अधिकाय १ चिट्ठी पठई तुम सिरसा को आये नहीं वीर मलखान ॥ कैसी करिहौ यहि समया में आल्हा समरभूमि मैदान २ सुनिकै बातैं महराजा की आल्हा बोले शीश नवाय ॥ मुर्चा बन्दी अब करवावो चर्खन तोप देउ चढ़वाय ३ तर्बलंग धावन सिरसावाला आल्हा फौज पहुंचा आय ॥ शीश नाय कै सो आल्हा को मलखे आवन दीन बताय ४ दीन इनामै त्यहि धावन को ब्रह्मा मलखे लीन बुलाय ॥ खबरि पाय कै सो आल्हा की दूनों गये तहाँ पर आय ५ बड़ी खातिरी जैचँद कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ खबरि बताई सब बूँदी की जयचँद बार बार पछिताय ६

१८ आल्हाखण्ड । ३८४ मलखे बोले तब राजा ते साँची सुनो कनौजीराय ॥ उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम चारो दिशा लेउ घ्यग्वाय ७ तुमतो लड़ियो उत्तर दिशिको दक्षिण समर करब हम आय ॥ कछुदल पठवो पूरब पश्चिम बूँदी शहर लेउ घिराय ८ इतना कहिकै मलखे ब्रह्मा फोजन फेरि पहूँचे आय ॥ बाजे डंका कनौजिया के हाहाकार शब्दगा छाय ६ बिनही डंका के मलखाने दक्षिण दिशा पहूँचे जाय ॥ म्वती जबाहिर उत्तर दिशिमाँ लै कै फौजगयो फिरिआय १० तोपैं धरिगइँ फिरि चर्खेन में तिनमें बत्तीदई लगाय ॥ छूटे गोला हाहाकारी धुवनारहा सरगमें छाय ११ लागे गोला ज्यहि क्षत्री के मानो गिरह कबूतरखाय ॥ गोला लागै ज्यहि घोड़ाके आधे सरगलिहे मड़राय १२ लागै गोला ज्यहि हाथी के झुप्पे देवै भूमि बिछाय ॥ जौने ऊंटके गोला लागै सो मुहभरा तुरतगिरिजाय १३ अरर अरर गोला छूटैं जैसे प्रलय मेघ घहराय ॥ जौने रथमाँ गोला लागै पहियाधुरीसहितउड़िजाय १४ बड़ी दुईशा भै तोपन में तब फिरि मारुबन्द द्वैजाय ॥ दुनो गोल आगे का बढ़िगे मुर्चा परा बरोबरि आय १५ कल्ला भिड़िगे असवारन के घोड़न भिड़ी रानमें रान ॥ सूंडि लपेटा हाथी भिड़िगे लाग्यो होन घोर घमसान १६ कउँधालपकनिविजुलीचमकनि रणमाँ चमाचम्म तलवार ॥ झल् झल् झल् झल् छुरी झलकैं भारी ढालनकी ठनकार १७ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥ न् सन् सन् सन् गोली सनकैं तेगा मन्न मन्न मन्नाय १८

लाखनिका विवाह। ३८५ मारु मारु करि मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥ बड़ी लड़ाई भै बूँदीमाँ जूझे बड़े बड़े नरपाल १६ पैदल पैदल कै बरणी मै औ असवार साथ असवार ॥ कोताखानी चलैं कटारी ऊनाचलै बिलाइति क्यार २० कटिकटि कल्ला गिरैं खेतमाँ उठि उठि फेरि करैं तलवार ॥ ना मुहँ फेरैं कनउज वाले ना ई बूँदी के सरदार २१ ब्रह्मा मलखे दक्षिण दिशिसों पहुँचे बीच शहरमें आय ॥ बड़ा कुलाहल भा बूँदी माँ काहू धीर धरा ना जाय २२ लीन्हे फौजै मलखाने फिरि फाटक उपर पहुँवा जाय ॥ औ कहि पठवा गंगाधर को सबकी कैद देउ छुटवाय २३ नाहीं बचिहौ ना महलन माँ बूँदी शहर देउँ फुँकवाय ॥ सुना सँदेशा महराजा जब मनमाँ बार बार पछिताय २४ पै जब सूझी कछु मनमाँ ना सबकी कैद दीन छुटवाय ॥ घायल करहति ऊदन लाखनि मलखे पास पहुँचे आय २५ मिला भेंट करि सब आपस में उत्तर दिशा चले हर्षाय ॥ एक तरफ सों जयचंद राजा दूसरी तरफ बनाफरराय २६ मोती जवाहरि परे बीचमाँ सबके गयी प्राणपर आय ॥ बड़ी लड़ाई भै बूँदी मा अद्भुत समर कहा ना जाय २७ मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौड़ा भै औ रुण्डन के लगे पहार २८ घोड़मनोहर की पीठी सों देवा गरू देय ललकार ॥ चढ़ा कबूतरी पर मलखाने ऊदन बेंदुलपर असवार २९ भयो जवाहरि फिरि सम्मुख माँ लीन्हे तीनिलाख असवार ॥ का गति बरणों मैं मोती कै दूनों हाथ करै तलवार ३०

२० आलहखण्ड । ३८६ मीराताल्हन बनरस वाला सिर्गा घोड़े पर असवार ॥ अल्ला अल्ला औ बिसमिल्ला करिकै खूब मचाई रार ३१ झुके सिपाही बूँदी वाले दोऊ हाथ करैं तलवार ॥ बड़े लड़ैया मुहबेवाले एकते एक शूर सरदार ३२ येऊ मारैं औ ललकारैं हारैं नहीं तहाँ पर ज्वान ॥ छोड़ि आसरा जिंदगानी का क्षत्रिन खून कीन मैदान ३३ दूनों दिशि की तहँ मारुन माँ क्षत्री बूँदी के हैरान ॥ तीनि लाख बूँदीके ठाकुर ह्वैगै समर भूमि वैरान ३४ मती जवाहर त्यहिसमया माँ दूनों भाय गये घबड़ाय ॥ मलखे ठाकुर त्यहि औसर माँ तिनका कैदलीन करवाय ३५ भागि सिपाही अरझ्वारातब अपने अपने लिहे परान ॥ जीति के डंका तब बजवाये नाहर समरधनी मलखान ३६ राजा जयचँद के तम्बू माँ पहुँचे सबै शूर सरदार ॥ को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी लाग राजदरबार ३७ जितने घायल अपनी दिशिके सबको तुरतलीन उठवाय ॥ मलहम पट्टी तिन क्षत्रिन के घायन ऊपर दीन कराय ३८ सुनी हकीकति जब गंगाधर मनमाँ बारबार पछिताय ॥ मेलछाँड़िकै त्यहि औसर माँ और न कछू ठीक ठहराय ३६ लिखिकै चिट्ठी त्यहि समयामाँ जयचँद पास दीनपठवाय ॥ कैदी छोड़ो दोउ पुत्रनको भाँवरि तुरत लेउ करवाय ४० जहँना तम्बू महराजा का धावन तहाँ पहुँचा आय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो महराजाको दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४१ पढ़िकै चिट्ठी जयचँदराजा तुरतै सबका दीनसुननाय ॥ सम्मत सबके तब याही भै कैदी देउ पुत्र छुड़वाय ४२

लाखनिका विवाह । ३८७ २१ म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा तुरत लीन बुलवाय ॥ लिखी हकीकति जो गंगाधर तिनको तुरतदीन बतलाय ४३ गंगा कैलेउ तुम तम्बुन माँ तुम्हरी कैद देइँ छुड़वाय ॥ सुनिकै बातें ये जयचंदकी दोऊ गंगा लीन उठाय ४४ तब छुड़वायो जयचंद राजा पहुँचे धाम आपने जाय ॥ सम्मत कीन्ह्यो फिरि गंगाधर मड़ये मूड़ लेब कटवाय ४५ अकसर लड़काको लै आवो जावो पूत जवाहरलाल ॥ सुनिकै तुरतै सो गमनत भा आयो जहाँ बैठ नरपाल ४६ कहि समुझायो सब राजा को दोऊ चरणन शीश नवाय ॥ अकसर लड़का को पठवावो सबियाँ शंका देउ भुलाय ४७ इतना सुनिकै मलखे बोले राजन हुकुम देउ फरमाय ॥ पांच सात मिलि हमअब जैबे भौंरी तुरत देब करवाय ४८ सुनिकै बातें मलखाने की आयसु दीन कनौजीराय ॥ बैठि पालकी में लखराना देबी फूलमती को ध्याय ४६ आल्हा ऊदन मलखे ब्रह्मा देवा बनरस का सरदार ॥ गंगा मामा लखराना का सोऊ बांधि लीन हथियार ५० सवैया ॥ ते सरदार सबै चलिकै फिरि भीतर भौन के जाय सिधाये । सुन्दर आसन डारितहाँ नृप आदर भाव किये अधिकाये ॥ पण्डित आयकै बैठि गयो गठिबन्धन हेतु सुता बुलवाये । सातसुहागिल आय तहाँ ललिते मन मोदन गीत सुनाये ५१ पहिली भाँवरिके परतै खन क्षत्री आये आध हजार ॥ आल्हा ऊदन मलखे ब्रह्मा इनहुन खैंचि लीन तलवार ५२

२२ आल्हखण्ड । ३८८ आधे आँगन भाँवरि होवैं आधे होय भड़ाभड़ मार ॥ मारे मारे तलवारिन के आँगन वही रक्त की धार ५३° काटिकै कल्ला दुइ पल्ला करि लल्ला बच्छराज के लाल ॥ लड़ै इकल्ला अति हल्लाकरि अल्हो खैर करैं त्यहिकाल ५४ भा खलभल्ला औ हल्ला अति बल्लन क्यार मनो त्यवहार ॥ काटि बजुल्ला सोने छल्ला लल्ला उदयसिंह सरदार ५५ हनि हनि मारै औ ललकारै देवा मैनपुरी चौहान ॥ म्वती जवाहर दूनों भाई लीन्हे तहाँ अनेकन ज्वान ५६ बड़ी लड़ाई करिहारे तहँ पै नहिं विजय परी दिखराय ॥ तब पछितान्यो फिरि गंगाधर दीन्ह्यो मारु बन्द करवाय ५७ कन्या दान दीन आनँद सों नेगिन नेग दीन हर्षाय ॥ सातो भाँवरि पूरी करिकै पूरा ब्याह दीन करवाय ५८ बिदा न करिबे हम ब्याहे में लीन्ह्यो गवन सालमें आय ॥ इतना कहिकै गंगाधर जी दायज खूबदीन अधिकाय ५६ बात मानिकै चन्देले फिरि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ विदा मांगिकै मलखे ब्रह्मा पहुँचे नगर मोहोबे आय ६० बाजत डंका अह्तंका के कनउज गये कनौजी आय ॥ अनँद बधैया घर घर बाजीं मंगल गीतरही सब गाय ६१ रानी तिलका त्यहिअवसर में बिप्रन दान दीन अधिकाय ॥ ध्रुबी शारदा के बरदानी दूनों भाय बनाफरराय ६२ सवैया ॥ गावत गीत सबै तिनको जिनको कछु ज्ञान बलै अधिकाई । १-( अल्हा ) देवी का नाम है ॥

लाखनिका विवाह। ३८६ २३ ते मनमाँझ विचारकरै औ धरै मनमें प्रभुकी प्रभुताई ॥ त्यागत झूठ प्रपञ्च सबै औ जबै मन भासत हैं रघुराई । नाशत पाप सबै ललिते फलिते जगधर्म कि बेलि सदाई ६३ सोई मन्तर मन अन्तर धरि यन्तर धर्म बनाफरराय ॥ बड़ी बड़ाई कनउज पायो कीरति रही आजलों छाय ६४ बिपदा सहिकै यहि दुनियामा त्यागा धर्म नहीं कहुँभाय ॥ तासों बेली यह फैली अति सुन्दर धर्म रूप जलपाय ६५ अधरम बेली दुरयोधन की छैलिकै लीन जगतकोछाय ॥ तैसे - रावण कंसासुरहू बाढ़यो धनै बलै अधिकाय ६६ रीछ बँदरवा ग्वालन बालन दूनन दीन्यो तुरत नशाय ॥ तासों चाहिये यहि दुनियामाँ नितप्रतिनवत नवन नैजाय६७ धन बल बाढ़ै त्यहि दुनियामाँ कीरति जाय धरामें छाय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाकोआय ६८ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ परे आलसी खटिया तकितकि घोंघों करठ रहे घरांय ६६ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललिते कहतकथाकस गाय७० रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ७१ माथ नवावों पितु अपने को जिनबल गाथ भई यह पार ॥ जैसे सेयो बालापन में तैसे सदा होउ रखवार ७२ जल थल जन्मों चहु पहाड़ में स्वामी होयँ राम भगवान ॥ यह बर पावैं ललिते पण्डित खण्डित होय न हमरी बान ७३

२४ आल्हखण्ड । ३६० पूर विवाह भयो लाखनि को हँाते करों. तरंगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानी कन्त ७४ इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्र वंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत लाखनि पाणिग्रहणवर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥ लाखनिरानाजीका विवाह सम्पूर्ण ॥ इति ॥

अथ आल्हखण्ड ॥ गाँजर की लड़ाईका प्रारम्भ ॥ सवैया ॥ दानिन में बलि औ हरिचन्द शिबी दधि कर्ण इन्ही यश पाये । बीरन में गिनती रघुबीर औ धीरन कृष्ण युधिष्ठिर गाये ॥ पापिन औ परितापिन में जग कंस दशानन बीर सुनाये । जापिन योग उदार अपार सदाशिवही ललिते मन आये १ सुमिरन ॥ प्रथमै ध्यावों श्री गणेश को लीन्हे सुभग पुस्तकी हाथ ॥ करों बन्दना शिवशंकर की दूनों धरों चरणपर माथ १ देवि दुर्गा को ध्यावों फिरि लैके रामचन्द्र को नाम ॥ कीरति गावों मैं ऊदन कै पूरणकरो हमारो काम २ देवि शारदा मइहरवाली मनियादेव महोबे केर ॥ ध्यावों ललिता नैमिषार की माता मोरि दीनता हेर ३ नहीं बीरता कछु मोमें है तव बल धरी धीरता हीय ॥