आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० | आल्हाखण्ड । १७६ मारे मारे तलवारिन के मचिगा घोर शोर घमसान ६१ ऊदन मारैं ज्यहि क्षत्री को सो मुहभरा तुरत गिरि जाय ॥ पास न जावै कोउ ऊदन के रणमा बढ़ा बनाफरराय ६३ कागति वरणौं तहँ लाखनि कै दूनों हाथ करै तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार ६४ मोती जवाहिर दोनों भाई आँगन खूनकीन मैदान ॥ लड़ै बहादुर भीपमवाला देवा मैनपुरी चौहान ६५ घायल ह्वैकै ग्यारह नेगी आँगन गिरे पछाराखाय ॥ लाखनि ऊदन त्यहि समयमा चालिस क्षत्री दीनगिराय ६६ तबै जवाहिर सम्मुख आवा गरई हाँक देत ललकार ॥ काह सिपाहिन का मारो तुम हमरे साथ करौ तलवार ६७ इतना सुनिकै लाखनि ऊदन सम्मुख चले तुरतही धाय ॥ आगे पीछे चौगिर्दा ते परिगे गाँस फाँसमें आय ६८ लाखनि ऊदन दोऊ ठाकुर मोती कैदलीन करवाय ॥ घैहानेगी जे आँगन में तिनहुन तुरतलीन बँधवाय ६९ लाखनि ऊदन दोउ क्षत्रिनको राजै खंदक दीनडराय ॥ यह सुधिपाई जब मालिनिने कुसुमा पास पहुँची जाय १०० हाल बतायो त्यहि बेटी को मालिनि बार बार समुझाय ॥ ब्याहन तुमका लाखनि आये राजै खन्दक दीन डराय १०१ देश देश में जब फिरि आये टीका लीन कनौजीराय ॥ ऐस मुनासिब नहिं राजाको जोअबदीन्हेनिजझमचाय १०२ गली गली में यह चरचाहै नीकिन कीन बात महराज ॥ रूप उजागर सब गुण आगर खन्दक परे तुम्हारेकाज १०३ इतना सुनिकै कुसुमा बेटी मनमें बारबार पछिताय ॥