आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलाखनका विवाह । ३७७ ११- हमें न भाई यह आली है तुमते साँच दीन बतलाय १०४ बयस बराबरीकी मालिनि हौ अब गाढ़े माँ होउ सहाय ॥ राति अँधेरिया की बिरिया है खन्दक मोहिंदेइ दिखराय १०५ मोरे कारण महराजा सुत कैदी भये यहांपर आय ॥ उत्तम शय्या केरि स्ववैया खन्दकदीन बाप डरवाय १०६ मोहिं दिखावै त्यहि क्षत्री को जियरा धीरधरा ना जाय ॥ इतना सुनिकै मालिनि दौरी पलकीलाई तुरतलिआय १०७ बैठि पालकी मा दूनो फिरि खन्दक पास गई नियराय ॥ दीन अशर्फी तहँ चकरन का तिनफिरतहाँदीनपहुँचाय १०८ कुसुमा बोली तहँ लाखनि ते स्वामी बार बार बलिजायँ ॥ मोहिं अभागिनि के कारणसों तुमपरबिपतिपरीअधिकाय१०६ अब तुम निकरो यहि खन्दकते रस्ता देउँ कन्त लटकाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय ११० जो तुम चाहौ लखराना को फौजन खबरि देउ पहुँचाय ॥ चहै सहारा जो नारी को तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय १११ शंका लावो मन अन्तर ना महलन जाउ तड़ाका धाय ॥ खबरि पायकै आल्हा ठाकुर हमरीबिपतिविदरिहैंआय११२ कुसुमा बोली फिरि ऊदन ते क्षत्री भोजन देउँ पठाय ॥ ऊदन बोले तब कुसुमा ते यहनहिंउचितयहाँपरआय११३ चोरी चोरा कछु दैहै ना शाहंशाह कनौजीराय ॥ भोर भवरहरे मुरगा बोलत फौजन खबरिदेउ पठवाय ११४ और न चाहें कछु तुमते ये साँचे हाल दीन बतलाय ॥ इतना सुनिकै कुसुमा बेटी महलनफेरिपहुँची आय ११५ सोचत सोचत राति पारभे प्रातःकाल गयो नगणाय ॥