आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलाखनिका विवाह । ३७५
देश हमारे की रीती यह इकलो लड़का देउ पठाय ८० नाई बारी दूनों नेगी इनको लेवें संग लिवाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोउ हाथ जोरि शिरनाय ८१ ग्यारह नेगी औ सहिबाला इतने पठै देउ महराज ॥ इतना सुनिकै राजा बोले भावै करो तौन तुमकाज ८२ जो मन भावै सो करु ऊदन तुमको दीन पूर अधिकार ॥ बनि सहिबाला तब ऊदन गे नेगी बने और सरदार ८३ बैठि पालकी में लखराना अपनी लिये ढालतलवार ॥ संग जवाहर के चलि दीन्हे नेगीबने शूर सरदार ८४ आसा लीन्हे कोउ हाथेमा मुरछल कोऊ डुलावत जाय ॥ झण्डी लीन्हे कोऊ नेगी कोऊ रहे मशाल दिखाय ८५ बूँदी केरे नर नारी सब भारी भीर कीन अधिकाय ॥ रूप देखिकै लखराना का मनमें कामदेव शर्माय ८६ धरी पालकी गै फाटक पर बैठे सबै शूर सरदार ॥ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एकेतलवार ८७ बाहर आये तब गंगाधर औ लाखनिते कह्यो सुनाय ॥ जल्दी चलिये तुम भीतर को भौंरीसमयगयो नगच्याय ८८ इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर नेगी लीन्हे संग लिवाय ॥ भीतर पहुँचा जब मन्दिर के तहँ नहिंखम्भपरादिखराय ८६ लौटन लाग्यो जब बाहर को आये शूरवीर तब धाय ॥ मारु मारु कै हल्ला करिकै ऊदन उपर पहुँचे आय ६० चली सिरोही तब आँगनमा हाहाकार शब्दगा छाय ॥ नेगी बनिकै जे क्षत्री गे तेसब दीन्ह्यो जूझ मचाय ६१ तेरा क्षत्री कनउजवाले बूँदी केर पाँचमै जवान ॥