आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ आल्हाखण्ड । ३८० कहा न माना आल्हा ऊदन खन्दकपरे लहुरवाभाय १४० मनते हमरे यह आवति है की बूँदी का जाय वलाय ॥ जैसो कीन्हेोनि तस फलपायनि दूनोभाय बनाफरराय १४१ करैं तयारी नहिं बूँदी की तवहूं ठीक नहीं ठहराय ॥ इतना कहिकै मलखेठाकुर फौजनहुकुमदीनकरवाय १४२ करो तयारी सब बूँदी की खन्दक परा लहुरवाभाय ॥ इतना कहिकै मलखेठाकुर अपने महल पहुँचेजाय १४३ पढ़िकै चिट्ठी गजमोतिनि को मलखे हाल दीन समुझाय ॥ हम ना जैबै अब बूँदी का प्यारी साँच दीन बतलाय १४४ इतना सुनिकै प्यारी बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आजु साँकरा बघऊदन का स्वामीगाढ़े होउ सहाय १४५ बिना सहायक अब दादा को स्वामीदुःख होय अधिकाय ॥ आजु साँकरा है दादापर यहुदिनपरीरोज ना आय १४६ ब्याना सहिबे घबरानिन का होई पीर रोज अधिकार ॥ धर्म विहीनी हीनी ह्वैकै जीनो जन्मजनमधिकार १४७ धर्म न रहै जब देही मा करि है कौन्दकाहि उपकार ॥ धर्म निशाना मर्दाना है अर्जुनसकदीनोकसरदार १४८ सारथि कीन्ह्यो नारायण जे ध्रुव कृष्ण कहि दीन्ह्यो महराज ॥ बुद्धीद्वारा करि दिखलावा ताकी राखि लई सबके काज १४६ करौं किहानी जो पूरी मैं ताको सिन्ध बड़ा विस्तार ॥ सुनी किहानी जो विप्रन ते सोई कहौ सत्य भतार १५० ह्रवै दवाई दुखदाई यह नींवी हरै अनेकन रोग ॥ जो कोउ पीवै चंगा होवै याको कैस नीक संयोग १५१ धर्म दवाइन के पीने मा स्वामिन सत्य सत्य आरोग ॥