भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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लाखनिका विवाह। ३८६ २३ ते मनमाँझ विचारकरै औ धरै मनमें प्रभुकी प्रभुताई ॥ त्यागत झूठ प्रपञ्च सबै औ जबै मन भासत हैं रघुराई । नाशत पाप सबै ललिते फलिते जगधर्म कि बेलि सदाई ६३ सोई मन्तर मन अन्तर धरि यन्तर धर्म बनाफरराय ॥ बड़ी बड़ाई कनउज पायो कीरति रही आजलों छाय ६४ बिपदा सहिकै यहि दुनियामा त्यागा धर्म नहीं कहुँभाय ॥ तासों बेली यह फैली अति सुन्दर धर्म रूप जलपाय ६५ अधरम बेली दुरयोधन की छैलिकै लीन जगतकोछाय ॥ तैसे - रावण कंसासुरहू बाढ़यो धनै बलै अधिकाय ६६ रीछ बँदरवा ग्वालन बालन दूनन दीन्यो तुरत नशाय ॥ तासों चाहिये यहि दुनियामाँ नितप्रतिनवत नवन नैजाय६७ धन बल बाढ़ै त्यहि दुनियामाँ कीरति जाय धरामें छाय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाकोआय ६८ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ परे आलसी खटिया तकितकि घोंघों करठ रहे घरांय ६६ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललिते कहतकथाकस गाय७० रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ७१ माथ नवावों पितु अपने को जिनबल गाथ भई यह पार ॥ जैसे सेयो बालापन में तैसे सदा होउ रखवार ७२ जल थल जन्मों चहु पहाड़ में स्वामी होयँ राम भगवान ॥ यह बर पावैं ललिते पण्डित खण्डित होय न हमरी बान ७३