आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ आल्हखण्ड । ३८८ आधे आँगन भाँवरि होवैं आधे होय भड़ाभड़ मार ॥ मारे मारे तलवारिन के आँगन वही रक्त की धार ५३° काटिकै कल्ला दुइ पल्ला करि लल्ला बच्छराज के लाल ॥ लड़ै इकल्ला अति हल्लाकरि अल्हो खैर करैं त्यहिकाल ५४ भा खलभल्ला औ हल्ला अति बल्लन क्यार मनो त्यवहार ॥ काटि बजुल्ला सोने छल्ला लल्ला उदयसिंह सरदार ५५ हनि हनि मारै औ ललकारै देवा मैनपुरी चौहान ॥ म्वती जवाहर दूनों भाई लीन्हे तहाँ अनेकन ज्वान ५६ बड़ी लड़ाई करिहारे तहँ पै नहिं विजय परी दिखराय ॥ तब पछितान्यो फिरि गंगाधर दीन्ह्यो मारु बन्द करवाय ५७ कन्या दान दीन आनँद सों नेगिन नेग दीन हर्षाय ॥ सातो भाँवरि पूरी करिकै पूरा ब्याह दीन करवाय ५८ बिदा न करिबे हम ब्याहे में लीन्ह्यो गवन सालमें आय ॥ इतना कहिकै गंगाधर जी दायज खूबदीन अधिकाय ५६ बात मानिकै चन्देले फिरि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ विदा मांगिकै मलखे ब्रह्मा पहुँचे नगर मोहोबे आय ६० बाजत डंका अह्तंका के कनउज गये कनौजी आय ॥ अनँद बधैया घर घर बाजीं मंगल गीतरही सब गाय ६१ रानी तिलका त्यहिअवसर में बिप्रन दान दीन अधिकाय ॥ ध्रुबी शारदा के बरदानी दूनों भाय बनाफरराय ६२ सवैया ॥ गावत गीत सबै तिनको जिनको कछु ज्ञान बलै अधिकाई । १-( अल्हा ) देवी का नाम है ॥