आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ आल्हखण्ड । ३८२ घोड़ी कबूतरी की पीठोपर मलखे सिरसाका सरदार १६४ बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर त्यहि बार ॥ शङ्का फंका करि डंका तहँ बाजे घोर शोर ललकार १६५ रहा कलङ्का नहिं देही माँ ऐसे कहत चलैं सब यार ॥ पंद्रादिनका धावा करिकै बूँदी निकट गये सरदार १६६ झील देखिकै मलखाने ने तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ॥ लाले पीले नीले काले सबरँग ध्वजा रहे फहराय १६७ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण कछु चमकन लागे पक्षी चले बसेरन धाय १६८ परे आलसी खटिया तकि तकि संतन धुनी दीन परचाय ॥ भस्म लगायो सब अंगन में ध्यायो चरित पुरातन गाय १६६ शिवा रमा ब्रह्माणी पति के मनमें चरित रहे सुलगाय ॥ बड़े यशस्वी पितु अपने के दोऊचरणकमलकोध्याय १७० करों तरंग यहां सों पूरण दोऊ गणपतिचरण मनाय ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं लेवैं आपन मोहिं बनाय १७१ इति श्रीलखनऊनिवसि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबू प्रयाग नारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखान बड़ाईवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सवैया ॥ सत्यहैं वेद पुराण सबै मति एक असत्य यहै लखिपावा । मतिही के असत्य असत्य सबै यह सत्यहि २ सत्य बतावा ॥ बेद पुराण भूलनहीं यह भूल असत्य मती ठहरावा । ललिते मति सत्यासत्य निवारण वेद पुराणन ने दर्शावा १