भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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लाखनिका विवाह। ३८५ मारु मारु करि मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥ बड़ी लड़ाई भै बूँदीमाँ जूझे बड़े बड़े नरपाल १६ पैदल पैदल कै बरणी मै औ असवार साथ असवार ॥ कोताखानी चलैं कटारी ऊनाचलै बिलाइति क्यार २० कटिकटि कल्ला गिरैं खेतमाँ उठि उठि फेरि करैं तलवार ॥ ना मुहँ फेरैं कनउज वाले ना ई बूँदी के सरदार २१ ब्रह्मा मलखे दक्षिण दिशिसों पहुँचे बीच शहरमें आय ॥ बड़ा कुलाहल भा बूँदी माँ काहू धीर धरा ना जाय २२ लीन्हे फौजै मलखाने फिरि फाटक उपर पहुँवा जाय ॥ औ कहि पठवा गंगाधर को सबकी कैद देउ छुटवाय २३ नाहीं बचिहौ ना महलन माँ बूँदी शहर देउँ फुँकवाय ॥ सुना सँदेशा महराजा जब मनमाँ बार बार पछिताय २४ पै जब सूझी कछु मनमाँ ना सबकी कैद दीन छुटवाय ॥ घायल करहति ऊदन लाखनि मलखे पास पहुँचे आय २५ मिला भेंट करि सब आपस में उत्तर दिशा चले हर्षाय ॥ एक तरफ सों जयचंद राजा दूसरी तरफ बनाफरराय २६ मोती जवाहरि परे बीचमाँ सबके गयी प्राणपर आय ॥ बड़ी लड़ाई भै बूँदी मा अद्भुत समर कहा ना जाय २७ मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौड़ा भै औ रुण्डन के लगे पहार २८ घोड़मनोहर की पीठी सों देवा गरू देय ललकार ॥ चढ़ा कबूतरी पर मलखाने ऊदन बेंदुलपर असवार २९ भयो जवाहरि फिरि सम्मुख माँ लीन्हे तीनिलाख असवार ॥ का गति बरणों मैं मोती कै दूनों हाथ करै तलवार ३०