भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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२० आलहखण्ड । ३८६ मीराताल्हन बनरस वाला सिर्गा घोड़े पर असवार ॥ अल्ला अल्ला औ बिसमिल्ला करिकै खूब मचाई रार ३१ झुके सिपाही बूँदी वाले दोऊ हाथ करैं तलवार ॥ बड़े लड़ैया मुहबेवाले एकते एक शूर सरदार ३२ येऊ मारैं औ ललकारैं हारैं नहीं तहाँ पर ज्वान ॥ छोड़ि आसरा जिंदगानी का क्षत्रिन खून कीन मैदान ३३ दूनों दिशि की तहँ मारुन माँ क्षत्री बूँदी के हैरान ॥ तीनि लाख बूँदीके ठाकुर ह्वैगै समर भूमि वैरान ३४ मती जवाहर त्यहिसमया माँ दूनों भाय गये घबड़ाय ॥ मलखे ठाकुर त्यहि औसर माँ तिनका कैदलीन करवाय ३५ भागि सिपाही अरझ्वारातब अपने अपने लिहे परान ॥ जीति के डंका तब बजवाये नाहर समरधनी मलखान ३६ राजा जयचँद के तम्बू माँ पहुँचे सबै शूर सरदार ॥ को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी लाग राजदरबार ३७ जितने घायल अपनी दिशिके सबको तुरतलीन उठवाय ॥ मलहम पट्टी तिन क्षत्रिन के घायन ऊपर दीन कराय ३८ सुनी हकीकति जब गंगाधर मनमाँ बारबार पछिताय ॥ मेलछाँड़िकै त्यहि औसर माँ और न कछू ठीक ठहराय ३६ लिखिकै चिट्ठी त्यहि समयामाँ जयचँद पास दीनपठवाय ॥ कैदी छोड़ो दोउ पुत्रनको भाँवरि तुरत लेउ करवाय ४० जहँना तम्बू महराजा का धावन तहाँ पहुँचा आय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो महराजाको दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४१ पढ़िकै चिट्ठी जयचँदराजा तुरतै सबका दीनसुननाय ॥ सम्मत सबके तब याही भै कैदी देउ पुत्र छुड़वाय ४२