भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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लाखनिका बिवाह । ३७१ ५ भई तयारी ह्‍वाँ ब्याहे की फागुन मास पहूँचा आय ३४ न्यवत पठावा सब राजन को राजा कनउज के सरदार ॥ पावत चिट्ठी के राजा सब कनउज आयगये त्यहिबार ३५ तेल औ मायन नहखुरआदिक ब्याहन कुँवाँक्यार व्यवहार ॥ नेग चार सब पूरन ह्वैगे लागे सजन शूर सरदार ३६ झीलमबखतर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥ सुमिरि भवानीसुत गणेश को राजा जयचंद भये तयार ३७ आल्हा बैठे पचशब्दापर ऊदन बेंदुल पर असवार ॥ गंगापाँवर कुड़हरि दाला मामा लाखनि का सरदार ३८ सूरज राजा परहुल वाला सोऊ बेगि भयो तय्यार ॥ सिर्गी घोड़े की पीठि पर सय्यद बनरस का सरदार ३६ पूंजि गोबर्द्धनि संदोहिनि अरु लाखनि फूलमती त्यहिबार ॥ सुमिरि भवानीसुत गणेश को पलकी ऊपर भये असवार ४० बाजे डङ्का अहतक के बारालाख फौज तैयार ॥ आगे हलका भा हाथिन का पाछे चलन लागि असवार ४१ चले सिपाही त्यहि पीछेसों रब्बाचले पवन की चाल ॥ मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ४२ गर्द उड़ानी अति मारग में लोपे अन्धकार सों भान ॥ हाथी चिघरैं घोड़ा हींसैं घूमत जावैं लाल निशान ४३ भयो कलाहल अति मारग में जंगल जीव गये थर्राय ॥ उनइस दिन के फिरि अर्सा में बूँदी पास गये नगच्याय ४४ चार कोस जब बूँदी रहिगै जयचंद तम्बू दीन गड़ाय ॥ गड़िगे तम्बू सब राजन के सब रंग ध्वजा रहे फहराय ४५ अपने अपने सब तम्बुन में राजा नृत्य रहे करवाय ॥