भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

४ आल्हखण्ड । ३७० चौक पुराई गजमोतिन सों चन्दन पीढ़ा दीन डराय २१ तापर बैठे लखराना जब गावन लगीं सुहागिल आय ॥ द्यो जवाहिर गंगाधर का तहँ पर टीका दीन चढ़ाय २३ बीरा दीन्ह्यो जब लाखनि को सम्मुख छींक भई तब आय ॥ रानी तिलका त्यहि समया में बोली राजै वचन सुनाय २४ ब्याह न करिबे हम बूँदी मा टीका आप देयँ लौटाय ॥ परम पियारे लखराना के बीरा लेत छींकमै आय २५ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ जो कछु होवै इनके जीका हमरो लीन्ह्यो मूडकटाय २६ टीका फेरयो महरानी ना जान्यो शकुन छींककामाय ॥ सो सवरमा यहि मानुष का पौवन नाक गिगवतजाय २७ यहिकी छींकनका अशकुन ना माता भरम देउ बिसराय ॥ राजा बोले फिरि रानी ते साँची कहै बनाफरराय २८ जो अस हालत सबहोती ना टीका तुरत देत लौटाय ॥ इतना सुनिकै तिलका रानी अपनो भरमदीन विसराय २६ फेरि जवाहिर सब नेगिन को सुवरण कड़ा दीन पहिराय ॥ जितनी सामारह टीका की सो आँगनमा दीन धराय ३० राजाजयचंद उन नेगिन का सुवरण कड़ा दीन पहिराय । साल दुसाला मोहनमाला इनहून दीन तहाँपर आय ३१ बड़ी खुशानी दुहुँ तरफाके नेगिन मनै भई अधिकाय । विदामँगिकै चला जवाहिर बूँदी शहर पहूँचा जाय ३२ हाल बतायो महराजा का जाविधि टीका भयो चढ़ाय ॥ भई खुशहाली गंगाधर के फूले अंग न सके समाय ३३ नामी राजा कनउज वाले बेटा कीनकाज खुबजाय ॥