भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 403

१२ आल्हाखण्ड । ४०२ बहे पनारा नरदेहिन सों नदिया बही रक्त की धार ॥ लंबी धोतिन के पहिरैया क्षत्री जूझे तीनि हजार ११८ साल दुसाला मोहनमाला आला परे गले में हार ॥ ऐसे सुन्दर राजपूतन को नोचनलागे श्वानसियार ११९ गीधन केरी खूब बनिआई चील्हन भीर भई अधिकाय ॥ लगीं बजारैं तहँ कौवनकी कालीभूमि परै दिखलाय १२० लगी अथाई तहँ भूतन की प्रेतन कथा कही ना जाय ॥ यहु अलबेला आल्हा वाला गर्जा समर भूमिमाआय १२१ इन्दल ठाकुर के सम्मुख मा कोऊ शूर नहीं समुहाय ॥ चढ़ि पचशब्दा हाथी ऊपर आल्हागये समरमें आय १२२ यहु महराजा पट्टी वाला मारत फिरै शूर समुदाय ॥ आल्हा ठाकुर औ सातनि का परिगासमर बरोबरिआय १२३ सातनि बोला तब आल्हाते मानो कही बनाफरराय ॥ दीन न पैसा हम जयचंद को कैयो बार लड़ेते आय १२४ टका न पैहौ आल्हा ठाकुर याते कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले सातनि काहगयो बौराय १२५ बहुती बातें हम जानैं ना पैसा आज देउ मँगवाय ॥ नहिं दिखलावै अब संगर में जोकछुकीन बूततबजाय १२६ सुनिकै बातें ये आल्हा की सातनि खैंचि लीन तलवार ॥ हनिकै मारा सो आल्हा के आल्हालीन ढालपरवार १२७ भालामारा फिरि आल्हा के सोऊ लीन्ही वार बचाय ॥ गदा करावा सातनि राजा सो शिरपरी महाउतआय १२८ गिरा महाउत जब आल्हा का इन्दल दीन्ह्यो घोड़ उड़ाय ॥ पहुंचा घोड़ा जब हौदापर इन्दलमार्यो ढालघुमाय १२६