भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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गाँजरकीलड़ाई। ४०१ ११ पैदल पैदल के बरणी मे औ असवार साथ असवार ॥ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुशभिड़े महौतनक्यार १०६ इतसों आगे पट्टी वाला उतसों उदयसिंह सरदार ॥ गज के हौदापर महराजा ऊदन बेंदुल पर असवार १०७ गर्दन ठोंकी जब बेंदुल की हौदा उपर पहुंचा जाय ॥ कलँगी पगड़ी महराजा की ऊदन दीन्ह्यो भूमिगिराय १०८ औ ललकारा महराजा को पैसा आजदेउ मँगवाय ॥ मारि सिरोहिन ते हनिडरिहौं नेका टकालेउँ निकराय १०६ धोखे जयचँद के भूलेना हमरो नाम बनाफरराय ॥ 'उदयसिंह दुनिया मा जाहिर सातनिसाँच दीनबतलाय ११० बारह बरसन की बाकी जो सो तू आज देय समुझाय ॥ नहीं तो बचिहै ना संगरमा जो विधि आपुनचावैआय १११ इतना सुनिकै सातनिराजा हौदा उपर ठाढ़ ह्वैजाय ॥ औ ललकारा बघऊदन का क्षत्री काह गये बौराय ११२ बतियाँ आहिन ना कुम्हड़ा की तर्जनि देखिजायँ कुम्हिलाय ॥ एक बनाफरकै गिन्ती ना लाखन चढ़ें बनाफरआय ११३ जबलग हडिन मा जी रैहै जबलग रही हाथ तलवार ॥ कौड़ी पैसन की बातैं ना देउँ न एक देहैं का बार ११४ जीना चाहै जो दुनियामा तौफिरि लौटिजाय सरदार ॥ नहिं शिरकटिहौं मैं संगर में ऊदन देखु मोरि तलवार ११५ इतना कहिकै सातनिराजा अपने शूरन कहा सुनाय ॥ जाय न पावैं कनउजवाले इनके देवो मूड़ गिराय ११६ सुनिकै बातैं महराजाकी क्षत्रिन कीन घोरघमसान ॥ भाला बलछी तलवारिन सों मारन लागि खूबतहूँज्वान ११७