आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हाखण्ड । ४०० बाँधिकै मुंशकै फिरि दोउनकी कनउज तुरत दीन पहुँचाया ॥ किला जीतिकैफिरि विरियाको आगे चला बनाफरराय ६४ चारिकोस जब पट्टी रहिगै ऊदन डेरा दीन गड़ाय ॥ सात निराजा पट्टी वालो ताको डाँड़ दवायो जाय ६५ तब हरिकारा पट्टी वाला सातनि खबरि सुनावाआय ॥ गाफिल बैठे तुम महाराजा डांड़े फौज परी अधिकाय ६६ इतना सुनिकै सातनि राजा गुसी धावन दीन पठाय ॥ हाल पायकै सो फौजन का राजै फेरि सुनावा आय ६७ सुनी हकीकति जब सातनिने डंका तुरतदीन बजवाय ॥ सजे सिपाही पट्टी वाले मनमें श्रीगणेशको ध्याय ६८ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बांके घोड़न भे असवार ॥ झीलमबखतरपहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ६६ चढ़िगा हाथीपर महाराजा करिकै रामचन्द्र को ध्यान ॥ कूच कराय दयो पट्टी सों घूमतआवैं लाल निशान १०० घरी अढ़ाई के अरसा माँ सम्मुख गयो फौजके आय ॥ आवत दीख्यो जब फौजनको तुरतै उठा बनाफरराय १०१ भुजा उठाये ऊदन बोल्यो गरई हाँक देत ललकार ॥ सँभरो सँभरो ओ रजपूतो अपने बांधि लेउ हथियार १०२ इतना सुनिकै सब राजपूतन अपनी लई ढाल तलवार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार १०३ सजा बेंदुला का चढ़वैया लाला देशराज का लाल ॥ मारु मारु करि मौहरिबाजीं बाजीं हाउ हाउ करनाल १०४ बजे नगारा औ तुरही फिरि ढोलन शब्दकीन विकराल ॥ शूर सिपाही दुहुँ तरफा के लागेयुद्धकरनत्यहिकाल १०५