आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहाला आवैं जब हाथिन के तब बिन मरे मौत है जाय॥ कोउ कोउ रोवैं महतारिन का. कोउ२दुलहिनिकालुलुआयँ ८२ कायर बिनवैं यह सुर्य्यन सों बाबा आजु अस्त हइजाउ॥ राति अँधेरिया जो कै पाउँ भागिकैतीसकोसघरजाउँ ८३ माठा रोटी घरमाँ खावैं आपनि भैंसि चरावन जायँ॥ ऐसि नौकरी हम करिहैं ना करडा बेंच शहरमाखायँ ८४ त्यही समय्या त्यहि अवसर माँ हिरसिंह बोल्यो भुजाउठाय॥ बनते कन्या धरि आईती त्यहिके अहिउ बनाफरराय ८५ अहिउ टुकरहा परिमालिक के औ चंदेले केर गुलाम॥ जाति गुलामन की हीनी है तुम्हरो नहीं लड़ैको काम ८६ यह कहिभाला नागदवनिको दूनो अँगुरिन लीनउठाय॥ दूनो अँगुरिन भाला तौले काली नाग ऐस मन्नाय ८७ तारा टूटै आसमान ते औ हिरगास भुई ना जायँ॥ छूटिग भाला जो हाथे ते कम्मर मचा ठनाका आय ८८ तेरते कटिगा यह मछरीबँद ऊपर कटिगा कुत्ताकबार॥ बचा दुलरुआ द्यावलि वाला ज्यहिका राखिलीन कर्त्तार ८९ औ ललकारा फिरि हिरसिंहको ठाकुर खबरदार हैजाउ॥ दूधु लरिकई मा पायो ना तुम्हरे मरे चढ़ै ना घाउ ६० वार हमारी सों बचिजायो घरमाँ छठी धरायो जाय॥ गर्दन ठोंक्यौ फिरि बेंदुल के हौदा उपर पहूंचो धाय ६१ ढालकी औफरिसों हनिमारा हिरसिंह गिरयो मूर्च्छाखाय॥ तब फिरि विरसिंह ने ललकारा ऊदन खबरदार है जाय ६२ भाला बरछिन को बहुमारा ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय॥ वाकिकै मारा फिर विरसिंह को सोऊ गिरा मूर्च्छा खाय ६३