भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

१४ | आल्हाखण्ड । ४०४ छोटे भाई हम आल्हाके राजन साँच दीन बतलाय ॥ बाकी दैदो तुम जयचँद कै हम सब कूचदेयँ करवाय १४२ इतनी सुनिकै राजा बोले मानो कही बनाफरराय ॥ झंपी कौड़ी तुम पैहौ ना टेटुवा टायेर लेयँ लुटाय १४३ कहाँ मंसई तुम करिआये ऊदन नाम सुनावै भाय ॥ तुम अस ऊदन बहुतैरन को रणमा मारा खेत खिलाय १४४ सवैया ॥ सुनिकै यह वानि कहा बघऊदन साँचसुनै नृप बात हमारी । सेतु बँधा जहँ पय रघुनन्दन बेंदुल टाप तहाँलग धारी ॥ जयपुर जीति लुटाय लियों दतिया औ उरैछा भये सब आरी । पृथिराजकी शानकमान बढ़ी ललिते तिनद्वार गयंद पछारी १४५ झन्ना पन्ना को जीता हम जीता काश्मीर सुल्तान ॥ थहर थहर सब बूँदी काँपै झंडा अटकपार फहरान १४६ देश देश सब हम मथिडारे मारे हेरि हेरि नरपाल ॥ पैसा लेवैं जब संगर में तबहीं देशराज के लाल १४७ इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतै हुकुम दीन फर्माय ॥ जान कामरू के पावै ना इनके देवो मूड़ गिराय १४८ भा खलभल्ला औ हल्ला अति लागी चलन तहाँ तलवार ॥ पैदल पैदल कै बरणी मै औअसवार साथ असवार १४६ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन केर ॥ हौदा हौदा यकमिल द्वैगे मारैं एक एक को हेर १५० गाफिलदेख्यो कमलापतिको ऊदन कैद लीन करवाय ॥ बांधिकै मुशकें महराजा की कनउज तुरत दीन पठवाय १५१