भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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४ आल्हाखण्ड । ४१४ इतना सुनिकै मलखे बोले चौंड़ा भली कही यहि वार २४ इतना कहिकै मलखे ठाकुर चौंड़ा पास पहुँचे जाय ॥ साँग चलाई तब चौंड़ा ने मलखे लीन्ह्यो वार बचाय २५ ऐंड़ लगाई फिरि घोड़ी के हौदा उपर पहुँचे जाय ॥ ढाल कि औझड़ मलखे मारा चौंड़ा गयो मूर्च्छा खाय २६ बांधिकै मुशकें तब चौंड़ाकी अपनी फौज पहुँचा आय ॥ कड़ा छड़ा औबिछिया अँगुठा चौंडै दीन तहाँ पहिराय २७ अगे अगेला पिछे पछेला तिन बिच चुरियाँ दीनडराय ॥ जोशन पट्टी और वज़ुल्ला कानन करनफूल पहिराय २८ बेंदीभाल नयन बिच काजर पीछे चुनरि दीन उड़ाय ॥ तुरत घाँघरा को पहिरावा मलखे पलकी लीनमँगाय २६ रूप जनाना करि चौंड़ा को पलकी उपर दीन बैठाय ॥ फिरि बुलवावा हरकारा को ताको हाल दीन समुझाय ३० कह्यो जबानी पृथीराज ते चौंडै मुहवा लीन लुटाय ॥ बेटी प्यारी परिमालिक की लैके कूच देउ करवाय ३१ चली पालकी फिरि चौंड़ा की लश्कर तुरत पहुँची आय ॥ दौरति धावन महराजा ते सबियो हाल बतावा जाय ३२ बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सके समाय ॥ जल्दी आये फिरि पलकी ढिग देखन लागि पिथौराराय ३३ दीख जनाना तहँ चौंड़ा को पिरथी गये बहुत शर्माय ॥ बँधा चौंड़िया जो बैठा था बंधन तुरत दीन खुलवाय ३४ क्रोधित ह्वैकै महराजा फिरि आपै गये समर में आय ॥ औ ललकारा मलखाने को अबहीं किला देउ गिरवाय ३५ इतना सुनिकै मलखे बोले राजन साँच देयँ बतलाय ॥