भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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सिरसाकासमर । ४१५ ५ बंजर धरती जब देखी हम तबफिर किलालीन बनवाय ३६ जैसे मालिक परिमालिक हैं तैसे आप पिथौराशय ॥ अदब तुम्हारो हम मानत हैं राजन कूच देउ करवाय ३७ इतना सुनिकै पिरथी बोले अभीं किला देउ गिरवाय ॥ सिरसा मुहवा नतु दूनों हम मलखे लेव आज लुटवाय ३८ इतना सुनिकै मलखे बोले ओ महराज पिथौराशय ॥ हथ्थी पछारा तब द्वारे मा आपन बूत दीन दिखलाय ३९ काह बतावैं महराजा ते सबियां देश रहा थर्याय ॥ किला गिरावो जो सिरसा का दिल्लीशहर देउँ फुँकवाय ४० कौने धोखे तुम भूले हौ मारौं राज भंग है जाय ॥ इतना सुनिकै पृथीराज ने तोपन आगिदीन लगवाय ४१ हाहाकारी तब बीतति भै मानो प्रलयगई नगच्याय ॥ बड़ी लड़ाई भै तोपन कै औ दल गिरा बहुत महराय ४२ चारकोस लौं गोला जावै गोली पांचखेत लौं जाय ॥ धुँवा उड़ाना अति तोपन का चहुँदिशि अंधकारगा छाय ४३ बन्द लड़ाई भै तोपन कै औ फिरि चलन लागि तलवार ॥ जितने कायर दूनों दल मा ते सब भागि डारि हथियार ४४ शूर सिपाही रणमण्डल मा मारैं फेरि फेरि ललकार ॥ कटि कटि मूड़ गिरैं धरती मा उठि उठि रुण्डकरैं तलवार ४५ मूँड़न केरे मुड़चौरा भै औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार ४६ छुरी कटारी तिहि नदिया मा मछली सरिस पैरैं दिखलाय ॥ ढालै कछुवा त्यहि नदिया मा गोहैं सरिस भुजा उतरायँ ४७ को गति वर्णै त्यहि समया कै नदिया खूब बहै विकराल ॥