आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
सिरसाकासमर । ४१५ ५ बंजर धरती जब देखी हम तबफिर किलालीन बनवाय ३६ जैसे मालिक परिमालिक हैं तैसे आप पिथौराशय ॥ अदब तुम्हारो हम मानत हैं राजन कूच देउ करवाय ३७ इतना सुनिकै पिरथी बोले अभीं किला देउ गिरवाय ॥ सिरसा मुहवा नतु दूनों हम मलखे लेव आज लुटवाय ३८ इतना सुनिकै मलखे बोले ओ महराज पिथौराशय ॥ हथ्थी पछारा तब द्वारे मा आपन बूत दीन दिखलाय ३९ काह बतावैं महराजा ते सबियां देश रहा थर्याय ॥ किला गिरावो जो सिरसा का दिल्लीशहर देउँ फुँकवाय ४० कौने धोखे तुम भूले हौ मारौं राज भंग है जाय ॥ इतना सुनिकै पृथीराज ने तोपन आगिदीन लगवाय ४१ हाहाकारी तब बीतति भै मानो प्रलयगई नगच्याय ॥ बड़ी लड़ाई भै तोपन कै औ दल गिरा बहुत महराय ४२ चारकोस लौं गोला जावै गोली पांचखेत लौं जाय ॥ धुँवा उड़ाना अति तोपन का चहुँदिशि अंधकारगा छाय ४३ बन्द लड़ाई भै तोपन कै औ फिरि चलन लागि तलवार ॥ जितने कायर दूनों दल मा ते सब भागि डारि हथियार ४४ शूर सिपाही रणमण्डल मा मारैं फेरि फेरि ललकार ॥ कटि कटि मूड़ गिरैं धरती मा उठि उठि रुण्डकरैं तलवार ४५ मूँड़न केरे मुड़चौरा भै औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार ४६ छुरी कटारी तिहि नदिया मा मछली सरिस पैरैं दिखलाय ॥ ढालै कछुवा त्यहि नदिया मा गोहैं सरिस भुजा उतरायँ ४७ को गति वर्णै त्यहि समया कै नदिया खूब बहै विकराल ॥
६ आल्हाखण्ड । ४१६ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे मज्जैं भूत प्रेत वैताल ४८ घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया नाहर समरधनी मलखान ॥ सुमिरन करिकै शिवशंकर का मारिकै कीन खून खरिहान ४६ औ ललकारा रजपूतन का हमरे सुनो शूर सरदार ॥ जो कोउ पैदाहै दुनिया मा आखिर मरण होय इकवार ५० परे खटोलिन में मरिहैहौ आखिर ह्वैहौ भूत परेत ॥ सम्मुख जूझै तलवारी के त्यहि बैकुण्ठ धाम हरि देत ५१ दिह्यो बढ़ावा बहु क्षत्रिनको नाहर सिरसा के सरदार ॥ पैदल पैदल इकमिल ह्वैगे औ असवार साथ असवार ५२ विकट लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो नदिया बही रक्तकी धार ॥ सूरति राजा हाड़ावाला मलखे सिरसा के सरदार ५३ दूनों अभिरे समरभूमि मा दूनों खूब करैं तलवार ॥ भाला बलछी दूनों मारैं दूनों लेयँ ढालपर वार ५४ सूरति गिरिगा जब संगर में अंगद शूर पहुँचा आय ॥ औ ललकारा मलखाने को तुम भगि जाउ बनाफरराय ५५ इतना कहिकै अंगद ठाकुर तुरतै मारा साँँग चलाय ॥ घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया तुरतै लीन्ह्यो वार बचाय ५६ खैंचिकै मारा तलवारी का औ शिर दीन्ह्यो भूमि गिराय ॥ तीनि शूर पिरथी के जूझे हाहाकार शब्द गा छाय ५७ मुर्चा फिरिगे रजपूतन के काहू धीर धरा न जाय ॥ मलखे मारै दश पंद्राको घोड़ी देवै बीस गिराय ५८ दाँतन काटै टापन मारै अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ हटा पिथौरा तब पाछे का आगे बढ़े बनाफरराय ५६ मलखे ताहर का मुर्चा भा मारैं एक एक को धाय ॥
सिरसाकासमर । ४१७ ७ सात कोसलों मलखे ठाकुर मारत मारत गये हटाय ६० रंग बिरंगी पृथ्बी ह्वैगैं मज्जा चर्बिपरै दिखराय ॥ बड़ा लड़ैया बिरमा वाला ज्यहिका कही बनाफरराय ६१ त्यहि के संगर धरती काँपै थर थर आसमान थर्राय ॥ काह हकीकति है ताहर कै जो संगरते देयँ हटाय ६२ पाँउ पछारी को डारे ना यहु रणबाघु बीर मलखान ॥ कोऊ क्षत्री अस दूसर ना मलखे साथ करै मैदान ६३ मुर्चा फिरिगा पृथीराज का लौटा तबै बीर मलखान ॥ बाजे डंका अहंतंका के लौटे सबै सिपाही ज्वान ६४ पहुंचे पिरथी तब दिल्ली में सिरसा सिरसा का सरदार ॥ माता बिरमा त्यहि औसरमा द्वारे आरति लीन उतार ६५ एक समैया की बातें हैं आये उरई के सरदार ॥ आवो आवो बैठो बैठो बिरमा कीन बड़ा सतकार ६६ माहिल बैठा तब महलन मा करिकै रामचन्द्र को ध्यान ॥ बोला माहिल फिरि बिरमा ते तुम्हरौ पूत बड़ा बलवान ६७ बड़े लड़ैया दिल्ली वाले ते सब हारिगये चौहान ॥ कौनि तपस्या तुम कैराखी पैदा भये बीर मलखान ६८ सरबर मलखे की दुनियामा दूसर नहीं लीन औतार ॥ यहै मनावैं परमेश्वर ते इनका भलाकरौ कर्तार ६९ नाम हमारो है दुनिया मा भैने माहिल के बरियार ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे इनते हारि गई तलवार ७० यहै मनावैं जगदम्बा ते अंजलि जोरिज़ोरि शिरनाय॥ मलखे सुलखे आल्हा ऊदन नीके रहें बनाफरराय ७१ सुनि सुनि बातें ये माहिलकी नारी बुद्धिहीन जगजान ॥ २७
८ आल्हखण्ड । ४१९ पदुम पैर है मलखाने के यहवरदीन रहे भगवान ७२, दुनिया बैरी है मलखे के भैया काह दनाई आय ॥ पदुम न फटि है जो तरवाका तौ नहिं मरी बनाफरराय ७३ लिखी बिधाता के मेटैको माता हाल दीन बतलाय ॥ बिदा माँगिकै फिरि जल्दी सों माहिल कूच दीन करवाय ७४ राह छोड़िकै फिरि उरई कै दिल्ली चला तड़ाका जाय ॥ लिल्ही घोड़ी का चढ़वैया दिल्लीपहुंचिगयोफिरआय ७५ हाल बतायो सब पिरथी को माहिल बार बार समुझाय ॥ भाला वलछी औ साँगनको खन्दक आप देउ गड़वाय ७६ पदुम न रैहै जब तरवा मा तब ना रही बनाफरराय ॥ मीचु आयगै मलखाने के माता हाल दीन बतलाय ७७ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा कुँवर लीन बुलवाय ॥ इइसै खन्दक तुम खुदवावो आधे देउ जाय पटवाय ७८ एक छाँड़िकै इक पटवावो या विधि दीन खूब समुझाय ॥ अधीराति के फिरि अमला मा कुँवरनकीन तहाँ तसजाय ७६ पाँच रातिमें यह रचनाकरि दिल्ली फेरि पहुँचे आय ॥ हाल बतायो सब पिरथी को कुँवरन बार बार समुझाय ८० माहिल चलिभे फिरि उरई का राजा फौज कीन तैयार ॥ झीलमबखतरपहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ८१ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दूसरे फाँदि घोड़ असवार ॥ तिसर नगोड़ा के वाजत खन चलिभे सबै शूर सरदार ८२ जायकै पहुँचे फिरि संगर में तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ॥ उलिखीहकीकति फिरिमलखेको अवहूं किला देउ गिरवाय-८३ लिखिकै चिट्ठी दी धावन को धावन तुरत पहूँचा जाय ॥
सिरसाकासमर। ४१६ द्वारे ठाढ़े मलखाने थे चिट्ठी तुरत दीन पकराय ८४ चढ़ा पिथौराहै सँभराभरि औ यह कहा बनाफरराय ॥ किला गिरावैं जो सिरसा का तौ सब रारि शान्तहैजाय ८५ नहीं तो बचिहैं न संगरमा जो बिधि आपु बचावैं आय ॥ लौटि पिथौरा अब जैहै ना सिरसा ताल देय करवाय ८६ मृत्यु आयगै मलखाने कै जो नहिं किला देयँ गिरवाय॥ लौटि पिथौरा अब जैहै ना नेका टका लेय निकराय ८७ चौंड़ा बकशी पृथीराज का सोऊ कहा सँदेशा आय ॥ बने जानना मलखाने अब घरमा बैठि रहैं शर्माय ८८ कौने राजा की गिनती मा जो नहिं किला देयँ गिरवाय॥ कह्यो सँदेशा यह ताहर है सो सुनिलेउ बनाफरराय ८९ मलखे चाकर परिमालिक का सो कस रारि मचावै आय ॥ दीन बड़ाई हम चाकरको पहिले फौज लीन हटवाय ९० जियति न जाई अब संगर ते जो बिधि आपु बचाई आय ॥ कह्यो सँदेशा सब लोगन को धावन बार बार समुझाय ९१ सुनिकै बातैं ये धावन की क्रोधित भयो बनाफरराय ॥ हुकुम लगायो फिरि सिरसामें बांजन सबै रहे हहराय ९२ बोले मलखे फिरि धावन ते यह तुम कह्यो पिथौरै जाय ॥ मारे मारे मुख धावन के धावन द्याव तहाँ समुझाय ९३ यहै बतायो तुम पिरथी ते आवत समरधनी मलखान ॥ कसरि न राखैं चौंड़ा ताहर संगर करैं दूनहू ज्वान ९४ कीन जनाना हम दोउन का उनके साथ कौन मैदान ॥ हमरो संगर पृथीराज को जावैं सँभरि आज चौहान ९५ इतना सुनिकै धावन चलि कै राजै खबरि बतावा आय ॥
१० आल्हखण्ड। ४२० हाल पायकै सिरसागढ़का क्रोधित भयो पिथौराराय ६६ बाजे डंका इत पिरथी के वैसी सिरसा के महराज ॥ सूरज वंशी औ यदुवंशी तोमर वंश केर शिरताज ६७ ये सब सजिसजि सिरसा गढ़में अपनी लीन ढाल तलवार ॥ नीले काले सब्जे सुर्खे सब रंग घोड़ भये तय्यार ६८ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ हाड़ा बूंदी गहिलवारके तिनपर बैठि शूर शिरताज ६६ सुमिरन करिकै शिवशंकरका मातै शीश नवावा जाय ॥ पीठि ठोंकि कै बिरमा माता आशिर्वाद दीन हर्षाय १०० चलिभा मलखे माताढिग ते रानी महल पहुंचा आय ॥ दीन दिलासा गजमोतिनिका ठाकुर चला खूब समुझाय १०१ बेटी बोली गजराजा की स्वामिन चेरी बोल बनाव ॥ पाँव पछारी का डारोना नाहीं हँसी देश औ गाँव १०२ होय हँसौंवा ज्यहि दुनिया मा त्यहिका मरण नीकही आय ॥ सुनी किहानी हम विप्रन ते स्वामी साँचदीनबतलाय १०३ इतना सुनिकै मलखे चुप्पै फौजन फेरि पहुंचे आय ॥ बाजे डंका अहलंका के मलखे कूच दीन करवाय १०४ सवैया ॥ चर्खनमों सब तोप चढ़ाय औ फौज अपारलिये मलखाना। बाजत डंक निशंक तहाँ औ यथा घन सावनको गहराना ॥ बिज्जु छटासों कटा करिवे कहँ चमकत खङ्ग तहाँ मर्दाना। मौहर बाजत हावकिये ललिते यह भाव न जात बखाना १०५ चढ़ा कबुतरी पर मलखाने मुर्चा सबै कीन तैयार ॥
सिरसाकासमर । ४२१ ११ पाग बैजनी शिरपर बाँधे हाथ म लये ढाल तलवार १०६ फिरिफिरि ध्यावै शिवशंकरको गावै सुन्दर भजन बनाय ॥ चील्ह औ गीध उड़ैं खपरिनपर कुत्ता स्यार रहे चिल्लाय १०७ मरण काल के जो अशकुन हैं मलखे दीख तहाँपर आय ॥ पै भयलायो मन अन्तर ना यहु निशंक बनाफरराय १०८ इकडिशि तोपनको छुटवावा इकडिशि धावा दीन कराय ॥ जैसे भेड़िन भिड़हा पहुँचै जैसे अहिर बिडारै गाय १०६ तैसे मारै रजपूतन को यहु रणबाधु बनाफरराय ॥ ताहर चौड़ा औ चन्दन का मोर्चा मलखे दीन हटाय ११० जौनै हौदा मलखे ताकैं घोड़ी तहाँ देय पहुँचाय ॥ जाय महावत का हनिडारैं औ असवारै देयं गिराय १११ दहिने बाँये टापन मारै सम्मुख दाँतन लेय चबाय ॥ मलखे ठाकुर के मारुनमा बहुदल परा तहाँभहराय ११२ जहँना हाथी पृथीराज का मलखे तहाँ पहुंचे आय ॥ पतरी लकड़िन खन्दक पाटे ताके पार पिथौराराय ११३ खाली खन्दक एक बीच में ताको दीख बनाफरराय ॥ गर्दन ठोंकी तहँ घोड़ी की दूनों ऐँड़ा दीन लगाय ११४ चूकि कबुतरी धरती जाना खन्दक परी तड़ाकाजाय ॥ मलखे घोड़ी दोउ खन्दकमा भालन उपर गिरे भहराय ११५ बलछी भालनकी नोकन सों घायल भये बनाफरराय ॥ बड़ा सोचभा तहँ घोड़ी का रोवैं बारबार पछिताय ११६ घोड़ी तड़पी फिरि खन्दकते मलखे सहित पारगै आय ॥ पदुम फाटिगा तहँ तरवा का औ मरिगये बनाफरराय ११७ गा हरिकारा तब सिरसामा बिरमै खबरि बतावा जाय ॥
१२ आल्हखण्ड । ४२२ सुनिकै बातें हरिकारा की विरमा गिरी मूच्छाखाय ११८ खबरि पायकै गजमोतिनि तहँ फिरिउठिबैठिफिरि गिरिजायाँ ॥ सासु पतोहू बैली ह्वैकै शिरधुनिबारबार पछितायँ ११९ सुयश बखानैं मलखाने का महलन गई उदासी छाय ॥ सात पांच दश जुरीं सहिलरी सम्मत देन लगींसो आय १२० तब गजमोतिनि विरमा दूनों पलकी लीन तहाँ मँगवाय ॥ सुमिरि गजानन लम्बोदर को गौरा पारवती पद ध्याय १२१ चढ़ी पालकी सासु पतोहू पहुंचीं समरभूमि में आय ॥ गदहन पृथ्वी को जुतवावै यहु महराज पिथौराराय १२२ तब गजमोतिनि ने ललकारा यह सुनि लेउ वीर चौहान ॥ यह ना जान्यो अपने मनते की मरिगये वीर मलखान १२३ सुनी पतिव्रतकी महिमा ना ताते चढ़ी तुम्होरे शान ॥ हम जबलेबे तलवारी को तब नहिं रही तुम्हारोमान १२४ बातें सुनिकै गजमोतिनि की पृथ्वी कूच दीन करवाय ॥ कैयो दिन का धावा करिकै दिल्ली शहर पहुंचे आय १२५ लाश देखिकै मलखाने कै माता तुरत गई लपटाय ॥ उठै औ बैठै गिरि गिरि जावै रानीदशा कही ना जाय १२६ विपदा बरणौं गजमोतिनिकै तौ फिरिएकसाल लगिजाय ॥ सखी सहिलरी तहँ समुझावैं विरमा धीरज रही कराय १२७ तेज पतिव्रत का जाहिर है जाते सत्त चढ़ा अधिकाय ॥ चिता लगावा गा चन्दन सों रानी बैठि सरापर जाय १२८ सुमिरि भवानी महरानी को पतिशिर धरा जाँघपर आय ॥ हवा खैंचिकै सब देहीकै शिरपरदीनतुरतपहुंचाय १२६ संध्या वाले यह गति जानैं प्राणायाम करें जे भाय ॥
सिरसाकासमर । ४२३ १६
नाक चपावैं ते अँगूठा ते ऊपरश्वासचढ़ावत जायें १३० तैसे करिकै गजमोतिन ह्याँ ऊपर हवा दीन पहुँचाय ॥ जब फुफकारयो पति शव लैकै हाहाकार अग्निगै आय १३१ भम्भम्भम्भम् चन्दन लकड़ा सुलगनलागि तहाँपर भाय ॥ हाय पियारे बघऊदन के मारे गये बनाफरराय १३२ भाय पियारो ऊदन होते दिल्ली शहर देत फुँकवाय ॥ हाय विधाता यह गति कीन्ही न्यारे भये बनाफरराय १३३ कौन दुसरिया जग दादा को इन्दल पूत बड़ा बरियार ॥ मरत न देखा यहि समया मा देवर उदयसिंह सरदार १३४ जो हम जानति यह गतिहोई तुमका लेति तुरत बुलवाय ॥ दगा न करते दिल्ली वाले तौकसमरतिप्राणपतिआय १३५ कड़कै धड़कै फड़कै छाती ऐसो देखि शूर सरदार ॥ यहै मनाऊं औ ध्याऊं नित स्वामी दीनबन्धुकर्त्तार १३६ जहाँ जहाँ जन्मैं ये स्वामी मम तहँ तहँ होयँ मोरि भर्त्तार ॥ अग्नि प्रज्वलित त्यहिसमयाभै लागे जरन सबै श्रृंगार १३७ गमकै ढोलक त्यहि समया माँ धमकै थाप नगारे भाय ॥ चम्चम् चमकै गजमोतिनितहँ दमकैजरनहेमअधिकायं १३८ माता बिरमा मोती मूंगा सुवरण बस्त्रदीन छिरकाय ॥ रही न आशा धन लेबे की मलखेसोचतहूँअधिकाय १३६ ऐस प्रतापी नित होवैं ना ज्ञानी पुरुष विचारैं भाय ॥ दानी ध्यानी अभिमानी सब शोचैं सीयराम शिरनाय १४० घरी न बीती ह्याँ महरानी पहुँची स्वर्गलोक में जाय ॥ तहँहूँ सोचै सुख मल्हना को जाविधिदीनरहैअधिकाय १४१ सबियाँ रैयाति मलखाने की दर दर रोय रही अधिकाय ॥
१४ आल्हाखण्ड । ४२४ घर घर चर्चा मलखाने की पुर पुर रहे नारि नर गाय १४२ सवैया ॥ कौन कहै विपदा पुरकी अति श्वान श्रृगालन शोर मचायो । शान न मान न आन कहूं मलखान विना विपदा पुर छायो ॥ घोर मशान समान तहाँ मलखान जहाँ नित सेज लगायो । मानगयो अरमानगयो ललिते मलखान महायश पायो १४३ समर पूर मैं सिरसागढ़ का गायो सुमिरि शारदा माय ॥ आशिर्वाद देउं मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय १४४ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १४५ खेत छूटिगा दिननायक सों झएडा गेड़ा निशाको आय ॥ परे आलसीखटिया ताकि ताकि संतन धुनी दीन परचाय १४६ माथ नवावों मैं माता को जो प्रत्यक्ष अबौ संसार ॥ पाणिकमल धरि सो पीढ़ी मा हमरो करैं अबौ निस्तार १४७ माथ नवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १४८ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत सिरसासमर वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सिरसा समर सम्पूर्ण ॥ इति ॥
अथ आल्हखण्ड ॥ कीरतिसागरकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ कीरति सिंधु शिवा शिव पै हम अक्षत चन्दन फूल चढ़ावैं । मानस ऐसो चहै हमरो पर आलस सों अस होन न पावै ॥ धावैं सबै दिशि पापसमूह औ हूह मचावत हूलत आवैं । सार यही ललिते जगको मुदसों नित शम्भु शिवा मन ध्यावैं १ सुमिरन ॥ सुमिरन करिकै शिवशङ्कर को रणमें चढ़े राम महराज ॥ एकरूप सों हनुमत ह्वैकै कीन्हे सकल रामके काज १ मुख्य स्वरूपी शिवशङ्कर के डमरू एक हाथ में राज ॥ लिहे त्रिशूलौ दुसरे हाथे मुण्डनमाल गरे में भ्राज २ भस्म रमाये सब अंगन में खाये भंग धतूरा ईश ॥ कण्ठ हलाहल अतिसोहत है सोहैं श्वेतवरण जगदीश ३ नग्न अमंगल मंगलकारी हारी तीनि ताप वागीश ॥४
२ आल्हाखण्ड । ४२६ शिवा विहारी सब सुखकारी धारी सदा गंग को शीश ४ तिनके भुजबल बल ललितेको फलिते करैं याहि गौरीश ॥ कीरति सागर की गाथा को ललिते कहैं नायकर शीश ५ अथ कथाप्रसंग ॥ सवन सुहावन जब आवत भा तब सब चले विदेशी ज्वान ॥ कीन चढ़ाई पृथीराज ने जब मरिगये वीर मलखान १ कीरतिसागर मदनताल पर सब रँग ध्वजा रहे फहराय ॥ परा पिथौरा दिल्ली वाला आला रूप शील समुदाय २ हाल पायकै परिमालिक ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥ बन्धन छूटैं ना गौवन के ना कउ त्रिया सेजपर जायँ ३ मारे डरके पिंडुरी काँपै मोहबा थहर थहर थर्राय ॥ बिना इकेले बघऊदन के फाटक कौन खुलावै आय ४ ऐसी बातें घर घर होवैं दर दर नारिकुण्ड अधिकाय ॥ मस्तक पीटैं कर अपने सों औ यह कथा रहीं तहँ गाय ५ होत बनाफर जो सिरसा का फाटक आज देत खुलवाय ॥ पवनी आई है मूड़ेपर लूटन अवा पिथौराराय ६ कुशल न देखें हम मुहबे मा संकट परा आज दिनआय ॥ बिना इकेले अब आल्हा के फाटक कौन खुलावै धाय ७ देवा सुलखे की मारुन मा ठहरत कौन यहांपर माय ॥ हाय गुसैयाँ की मरजी अस पवनी गई मूड़पर आय ८ कौन बचाई पृथीराज सों झंडा मदन ताल फहराय ॥ सात कोस के चौगिर्दा में तम्बू तम्बू परैं दिखाय ६ पति औ देवर भोजन करते घरमा कहैं हमारे माय ॥ तब तो बुढ़िया तिरिया बोली मन में श्रीगणेशको ध्याय १०
[Header] कीरतिसागरकामैदान । ४२७ ३
धीरज राखो अपने मनमा करिहै काह पिथौरा आय ॥ मनियादेवन की शरणागत जावो हाथ जोरि शिरनाय ११ त्यई सहायी सुखदायी अब फाटक तुरत देयँ खुलवाय ॥ घर घर सुमिरैं नरनारी सब साँचे देव परैं दिखराय १२ घट घट ब्यापी अरि परितापी जापी चले जायँ तिनधाम ॥ आला देवन में देवता हैं मनियादेव मोहोबे ग्राम १३ भा खलभल्ला औ हल्लाअति घर घर गई उदासीछाय ॥ टोला टोला में हल्लाभा लल्ला नहीं बनाफरराय १४ बिना इकेले बघऊदन के फाटक कौन खुलावै आय ॥ ऐसे घर घर पुरवासी सब दरदर कहैं नारिनर धाय १५ भा खलभल्ला रनिवासे माँ मोहबा गँसा पिथौराआय ॥ द्यवी शारदा त्यहि सगया मा मल्हना ध्यायरही शिरनाय १६ तुम्हरे बूते बघऊदन ने जीता देश देश सब जाय ॥ तुम लैआवो उदयसिंह को ईजति राखु शारदामाय १७ सदा सहायी तुम मायी हौ गायी तीनि लोक गुणगाथ ॥ मोहिं अनाथिनिकी मातातुम तुम्हरे चरण हमारो माथ १८ दैकेँ सुपना बघऊदन को माता लावो यहाँ बुलाय ॥ नितप्रति पूजा हम मोहबे मा चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय १६ चढ़ा पिथौरा है सँभरा भर हमरे प्राण रहे घबड़ाय ॥ कऊ सहायी ना दुनिया माँ ईजति राखु शारदा माय २० बैठि कुशासन रानी मल्हना सारी दीन्ही रैनि गँवाय ॥ स्वपना देखा ताही निशिमाँ औ जगि परा बनाफरराय २१ हाल बतावा सब देवा का ठाकुर उदयसिंह समझाय ॥ इतना सुनिकैं देवा बोला साँची सुनो बनाफरराय २२
४ आल्हाखण्ड । ४२८ - जैसो स्वपना तुम देखा है तैसो दीख हमौं है भाय ॥ विपदा आई है मल्हना पर साँचो साँच बनाफरराय २३ होत भुरहरे के स्वपना सब साँचे उदयसिंह सरदार ॥ करो बहाना अब गाँजर को औ मोहवे को होउ तयार २४ कुँवा विवाहन की विरिया मा दीन्ह्यो प्राण नेग तुम भाय ॥ चढ़ा पिथौरा है दिल्ली का साँचोस्वपनपरादिखलाय २५ चलिये जल्दी अब मोहवे को लाखनिराना संगलिवाय ॥ इतना सुनिकै द्यावलि वाला लाखनि पास पहुँचा जाय २६ बड़ी नम्रता ते बोलत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ जाहिर पवनी है मोहवे की साँची सुनो कनौजीराय २७ मोरि लालसा यह डोलति है पवनी करें मोहोवे जाय ॥ करैं बहाना हम गाँजर को तुमको मोहवा लैवैं दिखाय २८ इतना सुनिकै लाखनि बोले चलिये वेगि बनाफरराय ॥ चरचा करिये नहिं मोहवे की नहिं सब जैहैं काम नशाय २६ करो तयारी अब गाँजर की पहुँचैं नगर मोहोवे जाय ॥ जैसी दवाई रोगी माँगै तैसी वैद देय बतलाय ३० तैसि खुशहाली भै ऊदन के डंका तुरत दीन बजवाय ॥ हुकुमलगायो फिरि लश्करमा सजिगे सबै शूर समुदाय ३१ जहाँ कचहरी चंदेले की ऊदन तहाँ पहुँचे जाय ॥ हाल बतायो महराजा को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३२ लाखनिरानाकी मंशा है गाँजर खेलैं खूब शिकार ॥ म्वारिव लालसा यह डोलतिहै राजा कनउज के सरदार ३३ सुनिकैं बातें बघऊदन की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ तहँते चलिकै ऊदन देवा आल्हा पास पहुँचे आय ३४
कीरतिसागरकामैदान । ४२६ ५ कही हकीकति सब आल्हासों ऊदन बार बार समुझाय ॥ जानिकै इच्छा लखराना की आल्हा ठाकुर रहे चुपाय ३५ माथ नायकै फिरि आल्हा को माता पास पहुँचे आय ॥ कह्यो हकीकति महतारी सों दोऊ चरणन शीशनवाय ३६ बिदा माँगिकै महतारी सों भाभी पास पहुँचे जाय ॥ हाल बतायो सब सुनवाँ को साँचो साँच बनाफरराय ३७ बड़ी खुशाली सों भाभी ने आशिरवाद दीन हर्षाय ॥ माथ नायकै उदयसिंह फिर फौजन तुरत पहुँचे आय ३८ लाखनि देवा ऊदन तीनों लश्कर कूच दीन करवाय ॥ बाजत डंका अह्तंका के यमुनापार पहुँचे जाय ३६ नदी बेतवा को उतरत भे भाबर डेरा दीन डराय ॥ योगिहा बस्तर सब क्षत्रिन को ऊदन तहाँ दीन पहिराय ४० लाखनि ऊदन देवा सय्यद सम्मत कीन तहाँ त्यहिवार ॥ सिरसा केरे फिरि फाटकमाँ आये सबै शूर सरदार ४१ सवैया ॥ फाटक हाटक नाटक दीख बिना मलखान नहीं गुलजारा । श्वान शृगालन जाति जमाति औ भांति सबै विपरीत निहारा ॥ ऊदन नैनन नीरन धार अपार बही सो सही त्यहि बारा । शोचत मोचत नैनन को ललिते लखि ऐनन नैननद्वारा ४२ एक वरादिया लखि बोलतभा योगी काह शोच यहिवार ॥ एक इकेले मलखाने बिन पृथ्वी डारा नगर उजार ४३ दगा ते मारे मलखानेगे अब ह्याँ रोवैं श्वान शृगाल ॥ इतना सुनिकै देवा ऊदन नैनन ढाँपि लीन रूमाल ४४
होश उड़ाने दोउ क्षत्रिन के दोऊ हैगे हाल बिहाल ॥ कह्यो बरदिया ते धीरज धरि बेटा देशराज के लाल ४५ का खागा घाङ डा आदिक हमहूँ पढ़ा एकही साथ ॥ हाय ! पियारे गुरु भाई को कैसे निधन कीन जगनाथ ४६ बोला बरदिया तब ऊदन ते साँची सुनो गुरू महराज ॥ जो महरानी गजमोतिनि थी सत्ती भई धर्म के काज ४७ परम पियारे बघऊदन का लै लै बार बार सो नाम ॥ धरिकै जंघापर प्रीतम शिर पहुँची तुरत विष्णुके धाम ४८ सुनी बरदिया की बातें ये बोला देशराज का लाल ॥ सरा दिखावो मलखाने का कहँ पर जरी सती सो बाल ४६ सुनिकै बातें बघऊदन की तुरतै साथ भयो तय्यार ॥ बना चबूतरा तहँ सत्ती का देखत भये सबै सरदार ५० बहु रन बोले त्यहि समयामाँ साफै शब्द परा सो कान ॥ आज साँकरा परिमालिक का जावो तहाँ सबै तुम ज्वान ५१ इतना सुनिकै ऊदन बोले साफै साफ देयँ बतलाय ॥ जियत मोहोबे हम जावैं ना कौवा मरे हाड़ लै जायँ ५२ नाता टूट्यो अब मोहबे का जादिन मरे बीर मलखान ॥ को अस ठाकुर अब दुनियामा दादा मलखे के अनुमान ५३ इतना कहिकै ऊदन देवा दोऊ छांड़ि दीन डिंडकार ॥ फिरि रन बोले त्यहि समयामा ऊदन जीवेका धिक्कार ५४ आजु साँकरा है मल्हना पर यहु दिन परी न बारम्बार ॥ ताते जावो तुम मोहबे को ठाकुर उदयसिंह सरदार ५५ इतना सुनिकै सब योगिन ने सुमिरा हृदय भवानीनाथ ॥ बड़ा मोह करि तेहि समया मा चौरै फेरि नवायो माथ ५६
कीरतिसागरकामैदान । ४३१ ७ चारो योगी चलि तहँना ते मोहबे फेरि पहुँचे आय॥ मोहबा केरे फिरि फाटक पर योगिनअलखजगायोजाय ५७ बजी बाँसुरी तहँ ऊदन की खँझड़ी मैनपुरी चौहान॥ बाजै डमरू भल लाखनि का तोड़ैं गजल पर्ज पर तान ५८ को गति बरखै तहँ सय्यद के सो इकत्तारा रहा बजाय॥ ऊदन बोले दरवानी ते फाटक तुरत देउ खुलवाय ५६ सुनी हकीकति हम काशीमाँ मोहबा बसैं रजा परिमाल॥ पारस पत्थर इन के घरमा इनसम नहीं और महिपाल ६० भिक्षा माँगब हम ड्योढ़ी माँ साँचै साँच दीन बतलाय॥ हैं हम योगी बङ्गाले के आयन द्रव्य हेतु है भाय ६१ तुम्हें मुनासिब अब याही है फाटक तुरत देउ खुलवाय॥ सुनिकै बातें बैरागिन की बोला तुरत बचन शिरनाय ६२ खुलि है फाटक बैरागी ना तुम ते साँच दीन बतलाय॥ आफति आई परिमालिक पर गाँसा नगर पिथौरा आय ६३ बन्धन छूटैं ना गौवन के ना कउ त्रिया सेजपर जाय॥ आज मोहोबा पर बिपदा है घर घर रही उदासी छाय ६४ झुलै हिंडोला ह्याँ कोऊ ना ना कउ गावै मेघ मलार॥ आज मोहोबा लङ्का हैगा शङ्का घूमि रही सब द्वार ६५ बङ्गा ठाकुर सिरसावाला जब ते मरा वीर मलखान॥ आल्हा ऊदन गे कनउज को तबते छूटिगई सब शान ६६ इतना कहिकै दरवानिन ने योगिन पुरै दीन पहुँचाय॥ ता ता थेई ता ता थेई ऊदन ठाकुर दीन मचाय ६७ धुरपद सरंगीत तिल्लाना गावै खूब कनउजीराय॥ बाजै खँझड़ी भल देवा के सय्यददशा वरणिनाजाय ६८
८ आल्हखण्ड । ४३२ साँचे योगी जनु पैदा भे पूरण योग परे दिखराय ॥ माथा चमकै भल ऊदन का नैननगई अरुणता छाय ६६ घढ़ा उतारू भुजदण्डै हैं सब विधि सुघर लहुरवाभाय ॥ नगर मोहोबा की गलियन में योगिन दीन्ह्यो धूममचाय ७० रय्यति मोही परिमालिक की दीन्हेनि खानपान बिसराय ॥ भये बावला सँग योगिन के घूमन लागि नारिनर धाय ७१ रूप देखिकै लखराना का मोहीं युवा बाल तहँ आय ॥ अलख लाड़िला रतीभान का लाखनि शूरवीर अधिकाय ७२ नयन मिलावै नहिं नारिनसों नीचे शीशलेय औंधाय ॥ राग हिंडोला ऊदन गावै अँगुरिनभाव बतावत जाय ७३ मीरा ताल्हन बनरस वाला सो इकतारा रहा बजाय ॥ ताल स्वरन सों देवा ठाकुर खँझरी खूब रहा गमकाय ७४ खबरि पायकै मल्हना रानी योगिन महललीन बुलवाय ॥ चन्दन चौकिन माँ योगी सब बैठे रामचन्द्र को ध्याय ७५ मल्हना बोली तहँ योगिन ते साँचे हाल देउ बतलाय ॥ पूत पिथौरा के चारो तुम यह हम मनै लीन ठहराय ७६ लूटन आयो है महलन को सो यह मनै देउ बिसराय ॥ जियत न जैहौ तुम महलनते ब्रह्मारंजित लेउँ बुलाय ७७ मारि सिरोहिन ते हनिडरि हैं यमपुर अबै द्यहैं दिखलाय ॥ हाय ! बेंदुला का चढ़वैया नाहिंन आजु लहुरवाभाय ७८ सून पायकै पृथीराज ने गाँस्यो नगर मोहोबा आय ॥ पै अस खाली है मोहबा ना जस तुम मनैलीन ठहराय ७६ तिरिया लरि हैं रजपूतन की भाला बलछी साँग उठाय ॥ कुशल पिथौरा की हैहै ना तुम ते साँच दीन बतलाय ८०
कीरतिसागरकामैदान । ४३३ ६ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हम नहिं लरिका पृथीराज के माता काह गई बौराय ८१ हमतो योगी बंगाले के मोहबा शहर मँझावा आय ॥ कुटी हमारी है गोरखपुर जावैं हरद्वार को माय ८२ मोहिं बखेड़ा ते मतलब ना भिक्षा आप देयँ मँगवाय ॥ पारस पत्थर तुम्हरे घरमा लोहा छुवत स्वान हैजाय ८३ सुनी बड़ाई हम कनउज मा राजा जयचँद के दरबार ॥ साल दुसाला मोहनमाला दीन्ह्यो उदयसिंह सरदार ८४ आला राजा कनउज वाला गुदरी तुरत दीन बनवाय ॥ मुँदरी दीन्ह्यो इन्दल ठाकुर लाखनि कड़ादीन पहिराय ८५ जो कछु पावैं हम महलन ते लै कै कूच देयँ करवाय ॥ भजनानन्दी सब योगी हैं कहुकछुदेवैं भजनसुनाय ८६ शोक छाँड़िकै आनँद होवो करिहैं कुशल जानकीमाय ॥ एक पिथौरा कै गिनती ना लाखन चढ़ैं पिथौरा आय ८७ पुण्य तुम्हारी ते मिटि जैहैं माता साँच देयँ बतलाय ॥ काहे रोवो तुम महलन मा माता बार बार घबड़ाय ८८ सुनिकै बातें ये योगिन की मल्हना छाँड़िदीन डिंडकार ॥ काह बतावैं हम योगिन ते नाहिंन उदयसिंह सरदार ८६ कुँवाँ विवाहन उदयसिंह गे तब मैं पैर दीन लटकाय ॥ प्राणनेग तहँ हमका दीन्ह्यो आल्हा केर लहुरवाभाय ६० बात ब्यगरिगै महाराजा ते आल्हा ऊदन गये रिसाय ॥ मरिगा ठाकुर सिरसावाला बिपदा गई मोहोबे आय ६१ खान पान अब कछु सूझै ना बूझै नहीं कछू दिनरात ॥ को अब जूझै पृथीराज ते सूझै नहीं मनै यह बात ६२
१० आल्हखण्ड । ४३४ पर्व भुजरियन के मूड़ेपर पृथ्वी गाँसि मोहोबा लीन ॥ कैसे जैबे हम सागर पर पवनी खोंटि विधातै कीन ६३ प्यारी बेटी चन्द्रावलि घर ऊदन लाये बिदाकराय ॥ सो नहिं जैहै जो सागर पर हमरी जियत मौत है जाय ६४ बेटी ठाढ़ी चन्द्रावलि तहँ नैनन आँस रही ढरकाय ॥ जैसो योगी यहु ठाढ़ो है ऐसो मोर लहुरवा भाय ६५ हाय ! अकेले बिन ऊदन के गड़बड़ परा नगर में आय ॥ ऊदन मलखे की समता का तीसर भयो कौन जगमाय ६६ मोहिं अभागिनि के कर्मन ते दूनों भाई गये हिराय ॥ कह्यो संस्कृत मा ऊदन ते लाखनिराना बचन सुनाय ६७ नाम बताओ तुम मल्हना ते काहे धरी निठुरता भाय ॥ कह्यो संस्कृत मा ऊदन तब तुम सुनिलेउ कनौजीराय ६८ नाम बतावैं जो मल्हना ते हमरी जियत मृत्यु है जाय ॥ इतना कहिकै लखराना ते मल्हनै बोले वचन सुनाय ६६ शोच न राखो कछु मन अन्तर रानी साँच देयँ बतलाय ॥ पर्व तुम्हारी हम करवैहैं अपनो योग दिहैं दिखलाय १०० काह हकीकति है पिरथी कै गड़बड़ करै परव में आय ॥ हैं अनगिनती योगी सँगमा झावर डेरादीन गड़ाय १०१ करी लबरई पिरथी राजा दिल्ली ताल देव करवाय ॥ कीन इशारा फिरि लाखनि तन आपन गुरूदीन बतलाय १०२ गुरु जानिकै लखराना को चन्द्रावलि ने कहा सुनाय ॥ होय सनीनो अब सागर माँ जो गुरुबाबा करो सहाय १०३ नहीं सनीनो अब मोहवे माँ साँचो नहीं परै दिखलाय ॥ लाखनि बोले चन्द्रावलि ते बहिनी साँच देयँ बतलाय १०४