आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४२६ ५ कही हकीकति सब आल्हासों ऊदन बार बार समुझाय ॥ जानिकै इच्छा लखराना की आल्हा ठाकुर रहे चुपाय ३५ माथ नायकै फिरि आल्हा को माता पास पहुँचे आय ॥ कह्यो हकीकति महतारी सों दोऊ चरणन शीशनवाय ३६ बिदा माँगिकै महतारी सों भाभी पास पहुँचे जाय ॥ हाल बतायो सब सुनवाँ को साँचो साँच बनाफरराय ३७ बड़ी खुशाली सों भाभी ने आशिरवाद दीन हर्षाय ॥ माथ नायकै उदयसिंह फिर फौजन तुरत पहुँचे आय ३८ लाखनि देवा ऊदन तीनों लश्कर कूच दीन करवाय ॥ बाजत डंका अह्तंका के यमुनापार पहुँचे जाय ३६ नदी बेतवा को उतरत भे भाबर डेरा दीन डराय ॥ योगिहा बस्तर सब क्षत्रिन को ऊदन तहाँ दीन पहिराय ४० लाखनि ऊदन देवा सय्यद सम्मत कीन तहाँ त्यहिवार ॥ सिरसा केरे फिरि फाटकमाँ आये सबै शूर सरदार ४१ सवैया ॥ फाटक हाटक नाटक दीख बिना मलखान नहीं गुलजारा । श्वान शृगालन जाति जमाति औ भांति सबै विपरीत निहारा ॥ ऊदन नैनन नीरन धार अपार बही सो सही त्यहि बारा । शोचत मोचत नैनन को ललिते लखि ऐनन नैननद्वारा ४२ एक वरादिया लखि बोलतभा योगी काह शोच यहिवार ॥ एक इकेले मलखाने बिन पृथ्वी डारा नगर उजार ४३ दगा ते मारे मलखानेगे अब ह्याँ रोवैं श्वान शृगाल ॥ इतना सुनिकै देवा ऊदन नैनन ढाँपि लीन रूमाल ४४