भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 431

होश उड़ाने दोउ क्षत्रिन के दोऊ हैगे हाल बिहाल ॥ कह्यो बरदिया ते धीरज धरि बेटा देशराज के लाल ४५ का खागा घाङ डा आदिक हमहूँ पढ़ा एकही साथ ॥ हाय ! पियारे गुरु भाई को कैसे निधन कीन जगनाथ ४६ बोला बरदिया तब ऊदन ते साँची सुनो गुरू महराज ॥ जो महरानी गजमोतिनि थी सत्ती भई धर्म के काज ४७ परम पियारे बघऊदन का लै लै बार बार सो नाम ॥ धरिकै जंघापर प्रीतम शिर पहुँची तुरत विष्णुके धाम ४८ सुनी बरदिया की बातें ये बोला देशराज का लाल ॥ सरा दिखावो मलखाने का कहँ पर जरी सती सो बाल ४६ सुनिकै बातें बघऊदन की तुरतै साथ भयो तय्यार ॥ बना चबूतरा तहँ सत्ती का देखत भये सबै सरदार ५० बहु रन बोले त्यहि समयामाँ साफै शब्द परा सो कान ॥ आज साँकरा परिमालिक का जावो तहाँ सबै तुम ज्वान ५१ इतना सुनिकै ऊदन बोले साफै साफ देयँ बतलाय ॥ जियत मोहोबे हम जावैं ना कौवा मरे हाड़ लै जायँ ५२ नाता टूट्यो अब मोहबे का जादिन मरे बीर मलखान ॥ को अस ठाकुर अब दुनियामा दादा मलखे के अनुमान ५३ इतना कहिकै ऊदन देवा दोऊ छांड़ि दीन डिंडकार ॥ फिरि रन बोले त्यहि समयामा ऊदन जीवेका धिक्कार ५४ आजु साँकरा है मल्हना पर यहु दिन परी न बारम्बार ॥ ताते जावो तुम मोहबे को ठाकुर उदयसिंह सरदार ५५ इतना सुनिकै सब योगिन ने सुमिरा हृदय भवानीनाथ ॥ बड़ा मोह करि तेहि समया मा चौरै फेरि नवायो माथ ५६