भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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कीरतिसागरकामैदान । ४३१ ७ चारो योगी चलि तहँना ते मोहबे फेरि पहुँचे आय॥ मोहबा केरे फिरि फाटक पर योगिनअलखजगायोजाय ५७ बजी बाँसुरी तहँ ऊदन की खँझड़ी मैनपुरी चौहान॥ बाजै डमरू भल लाखनि का तोड़ैं गजल पर्ज पर तान ५८ को गति बरखै तहँ सय्यद के सो इकत्तारा रहा बजाय॥ ऊदन बोले दरवानी ते फाटक तुरत देउ खुलवाय ५६ सुनी हकीकति हम काशीमाँ मोहबा बसैं रजा परिमाल॥ पारस पत्थर इन के घरमा इनसम नहीं और महिपाल ६० भिक्षा माँगब हम ड्योढ़ी माँ साँचै साँच दीन बतलाय॥ हैं हम योगी बङ्गाले के आयन द्रव्य हेतु है भाय ६१ तुम्हें मुनासिब अब याही है फाटक तुरत देउ खुलवाय॥ सुनिकै बातें बैरागिन की बोला तुरत बचन शिरनाय ६२ खुलि है फाटक बैरागी ना तुम ते साँच दीन बतलाय॥ आफति आई परिमालिक पर गाँसा नगर पिथौरा आय ६३ बन्धन छूटैं ना गौवन के ना कउ त्रिया सेजपर जाय॥ आज मोहोबा पर बिपदा है घर घर रही उदासी छाय ६४ झुलै हिंडोला ह्याँ कोऊ ना ना कउ गावै मेघ मलार॥ आज मोहोबा लङ्का हैगा शङ्का घूमि रही सब द्वार ६५ बङ्गा ठाकुर सिरसावाला जब ते मरा वीर मलखान॥ आल्हा ऊदन गे कनउज को तबते छूटिगई सब शान ६६ इतना कहिकै दरवानिन ने योगिन पुरै दीन पहुँचाय॥ ता ता थेई ता ता थेई ऊदन ठाकुर दीन मचाय ६७ धुरपद सरंगीत तिल्लाना गावै खूब कनउजीराय॥ बाजै खँझड़ी भल देवा के सय्यददशा वरणिनाजाय ६८