आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ आल्हखण्ड । ४३२ साँचे योगी जनु पैदा भे पूरण योग परे दिखराय ॥ माथा चमकै भल ऊदन का नैननगई अरुणता छाय ६६ घढ़ा उतारू भुजदण्डै हैं सब विधि सुघर लहुरवाभाय ॥ नगर मोहोबा की गलियन में योगिन दीन्ह्यो धूममचाय ७० रय्यति मोही परिमालिक की दीन्हेनि खानपान बिसराय ॥ भये बावला सँग योगिन के घूमन लागि नारिनर धाय ७१ रूप देखिकै लखराना का मोहीं युवा बाल तहँ आय ॥ अलख लाड़िला रतीभान का लाखनि शूरवीर अधिकाय ७२ नयन मिलावै नहिं नारिनसों नीचे शीशलेय औंधाय ॥ राग हिंडोला ऊदन गावै अँगुरिनभाव बतावत जाय ७३ मीरा ताल्हन बनरस वाला सो इकतारा रहा बजाय ॥ ताल स्वरन सों देवा ठाकुर खँझरी खूब रहा गमकाय ७४ खबरि पायकै मल्हना रानी योगिन महललीन बुलवाय ॥ चन्दन चौकिन माँ योगी सब बैठे रामचन्द्र को ध्याय ७५ मल्हना बोली तहँ योगिन ते साँचे हाल देउ बतलाय ॥ पूत पिथौरा के चारो तुम यह हम मनै लीन ठहराय ७६ लूटन आयो है महलन को सो यह मनै देउ बिसराय ॥ जियत न जैहौ तुम महलनते ब्रह्मारंजित लेउँ बुलाय ७७ मारि सिरोहिन ते हनिडरि हैं यमपुर अबै द्यहैं दिखलाय ॥ हाय ! बेंदुला का चढ़वैया नाहिंन आजु लहुरवाभाय ७८ सून पायकै पृथीराज ने गाँस्यो नगर मोहोबा आय ॥ पै अस खाली है मोहबा ना जस तुम मनैलीन ठहराय ७६ तिरिया लरि हैं रजपूतन की भाला बलछी साँग उठाय ॥ कुशल पिथौरा की हैहै ना तुम ते साँच दीन बतलाय ८०