भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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कीरतिसागरकामैदान । ४३३ ६ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हम नहिं लरिका पृथीराज के माता काह गई बौराय ८१ हमतो योगी बंगाले के मोहबा शहर मँझावा आय ॥ कुटी हमारी है गोरखपुर जावैं हरद्वार को माय ८२ मोहिं बखेड़ा ते मतलब ना भिक्षा आप देयँ मँगवाय ॥ पारस पत्थर तुम्हरे घरमा लोहा छुवत स्वान हैजाय ८३ सुनी बड़ाई हम कनउज मा राजा जयचँद के दरबार ॥ साल दुसाला मोहनमाला दीन्ह्यो उदयसिंह सरदार ८४ आला राजा कनउज वाला गुदरी तुरत दीन बनवाय ॥ मुँदरी दीन्ह्यो इन्दल ठाकुर लाखनि कड़ादीन पहिराय ८५ जो कछु पावैं हम महलन ते लै कै कूच देयँ करवाय ॥ भजनानन्दी सब योगी हैं कहुकछुदेवैं भजनसुनाय ८६ शोक छाँड़िकै आनँद होवो करिहैं कुशल जानकीमाय ॥ एक पिथौरा कै गिनती ना लाखन चढ़ैं पिथौरा आय ८७ पुण्य तुम्हारी ते मिटि जैहैं माता साँच देयँ बतलाय ॥ काहे रोवो तुम महलन मा माता बार बार घबड़ाय ८८ सुनिकै बातें ये योगिन की मल्हना छाँड़िदीन डिंडकार ॥ काह बतावैं हम योगिन ते नाहिंन उदयसिंह सरदार ८६ कुँवाँ विवाहन उदयसिंह गे तब मैं पैर दीन लटकाय ॥ प्राणनेग तहँ हमका दीन्ह्यो आल्हा केर लहुरवाभाय ६० बात ब्यगरिगै महाराजा ते आल्हा ऊदन गये रिसाय ॥ मरिगा ठाकुर सिरसावाला बिपदा गई मोहोबे आय ६१ खान पान अब कछु सूझै ना बूझै नहीं कछू दिनरात ॥ को अब जूझै पृथीराज ते सूझै नहीं मनै यह बात ६२