आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
होश उड़ाने दोउ क्षत्रिन के दोऊ हैगे हाल बिहाल ॥ कह्यो बरदिया ते धीरज धरि बेटा देशराज के लाल ४५ का खागा घाङ डा आदिक हमहूँ पढ़ा एकही साथ ॥ हाय ! पियारे गुरु भाई को कैसे निधन कीन जगनाथ ४६ बोला बरदिया तब ऊदन ते साँची सुनो गुरू महराज ॥ जो महरानी गजमोतिनि थी सत्ती भई धर्म के काज ४७ परम पियारे बघऊदन का लै लै बार बार सो नाम ॥ धरिकै जंघापर प्रीतम शिर पहुँची तुरत विष्णुके धाम ४८ सुनी बरदिया की बातें ये बोला देशराज का लाल ॥ सरा दिखावो मलखाने का कहँ पर जरी सती सो बाल ४६ सुनिकै बातें बघऊदन की तुरतै साथ भयो तय्यार ॥ बना चबूतरा तहँ सत्ती का देखत भये सबै सरदार ५० बहु रन बोले त्यहि समयामाँ साफै शब्द परा सो कान ॥ आज साँकरा परिमालिक का जावो तहाँ सबै तुम ज्वान ५१ इतना सुनिकै ऊदन बोले साफै साफ देयँ बतलाय ॥ जियत मोहोबे हम जावैं ना कौवा मरे हाड़ लै जायँ ५२ नाता टूट्यो अब मोहबे का जादिन मरे बीर मलखान ॥ को अस ठाकुर अब दुनियामा दादा मलखे के अनुमान ५३ इतना कहिकै ऊदन देवा दोऊ छांड़ि दीन डिंडकार ॥ फिरि रन बोले त्यहि समयामा ऊदन जीवेका धिक्कार ५४ आजु साँकरा है मल्हना पर यहु दिन परी न बारम्बार ॥ ताते जावो तुम मोहबे को ठाकुर उदयसिंह सरदार ५५ इतना सुनिकै सब योगिन ने सुमिरा हृदय भवानीनाथ ॥ बड़ा मोह करि तेहि समया मा चौरै फेरि नवायो माथ ५६
कीरतिसागरकामैदान । ४३१ ७ चारो योगी चलि तहँना ते मोहबे फेरि पहुँचे आय॥ मोहबा केरे फिरि फाटक पर योगिनअलखजगायोजाय ५७ बजी बाँसुरी तहँ ऊदन की खँझड़ी मैनपुरी चौहान॥ बाजै डमरू भल लाखनि का तोड़ैं गजल पर्ज पर तान ५८ को गति बरखै तहँ सय्यद के सो इकत्तारा रहा बजाय॥ ऊदन बोले दरवानी ते फाटक तुरत देउ खुलवाय ५६ सुनी हकीकति हम काशीमाँ मोहबा बसैं रजा परिमाल॥ पारस पत्थर इन के घरमा इनसम नहीं और महिपाल ६० भिक्षा माँगब हम ड्योढ़ी माँ साँचै साँच दीन बतलाय॥ हैं हम योगी बङ्गाले के आयन द्रव्य हेतु है भाय ६१ तुम्हें मुनासिब अब याही है फाटक तुरत देउ खुलवाय॥ सुनिकै बातें बैरागिन की बोला तुरत बचन शिरनाय ६२ खुलि है फाटक बैरागी ना तुम ते साँच दीन बतलाय॥ आफति आई परिमालिक पर गाँसा नगर पिथौरा आय ६३ बन्धन छूटैं ना गौवन के ना कउ त्रिया सेजपर जाय॥ आज मोहोबा पर बिपदा है घर घर रही उदासी छाय ६४ झुलै हिंडोला ह्याँ कोऊ ना ना कउ गावै मेघ मलार॥ आज मोहोबा लङ्का हैगा शङ्का घूमि रही सब द्वार ६५ बङ्गा ठाकुर सिरसावाला जब ते मरा वीर मलखान॥ आल्हा ऊदन गे कनउज को तबते छूटिगई सब शान ६६ इतना कहिकै दरवानिन ने योगिन पुरै दीन पहुँचाय॥ ता ता थेई ता ता थेई ऊदन ठाकुर दीन मचाय ६७ धुरपद सरंगीत तिल्लाना गावै खूब कनउजीराय॥ बाजै खँझड़ी भल देवा के सय्यददशा वरणिनाजाय ६८
८ आल्हखण्ड । ४३२ साँचे योगी जनु पैदा भे पूरण योग परे दिखराय ॥ माथा चमकै भल ऊदन का नैननगई अरुणता छाय ६६ घढ़ा उतारू भुजदण्डै हैं सब विधि सुघर लहुरवाभाय ॥ नगर मोहोबा की गलियन में योगिन दीन्ह्यो धूममचाय ७० रय्यति मोही परिमालिक की दीन्हेनि खानपान बिसराय ॥ भये बावला सँग योगिन के घूमन लागि नारिनर धाय ७१ रूप देखिकै लखराना का मोहीं युवा बाल तहँ आय ॥ अलख लाड़िला रतीभान का लाखनि शूरवीर अधिकाय ७२ नयन मिलावै नहिं नारिनसों नीचे शीशलेय औंधाय ॥ राग हिंडोला ऊदन गावै अँगुरिनभाव बतावत जाय ७३ मीरा ताल्हन बनरस वाला सो इकतारा रहा बजाय ॥ ताल स्वरन सों देवा ठाकुर खँझरी खूब रहा गमकाय ७४ खबरि पायकै मल्हना रानी योगिन महललीन बुलवाय ॥ चन्दन चौकिन माँ योगी सब बैठे रामचन्द्र को ध्याय ७५ मल्हना बोली तहँ योगिन ते साँचे हाल देउ बतलाय ॥ पूत पिथौरा के चारो तुम यह हम मनै लीन ठहराय ७६ लूटन आयो है महलन को सो यह मनै देउ बिसराय ॥ जियत न जैहौ तुम महलनते ब्रह्मारंजित लेउँ बुलाय ७७ मारि सिरोहिन ते हनिडरि हैं यमपुर अबै द्यहैं दिखलाय ॥ हाय ! बेंदुला का चढ़वैया नाहिंन आजु लहुरवाभाय ७८ सून पायकै पृथीराज ने गाँस्यो नगर मोहोबा आय ॥ पै अस खाली है मोहबा ना जस तुम मनैलीन ठहराय ७६ तिरिया लरि हैं रजपूतन की भाला बलछी साँग उठाय ॥ कुशल पिथौरा की हैहै ना तुम ते साँच दीन बतलाय ८०
कीरतिसागरकामैदान । ४३३ ६ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हम नहिं लरिका पृथीराज के माता काह गई बौराय ८१ हमतो योगी बंगाले के मोहबा शहर मँझावा आय ॥ कुटी हमारी है गोरखपुर जावैं हरद्वार को माय ८२ मोहिं बखेड़ा ते मतलब ना भिक्षा आप देयँ मँगवाय ॥ पारस पत्थर तुम्हरे घरमा लोहा छुवत स्वान हैजाय ८३ सुनी बड़ाई हम कनउज मा राजा जयचँद के दरबार ॥ साल दुसाला मोहनमाला दीन्ह्यो उदयसिंह सरदार ८४ आला राजा कनउज वाला गुदरी तुरत दीन बनवाय ॥ मुँदरी दीन्ह्यो इन्दल ठाकुर लाखनि कड़ादीन पहिराय ८५ जो कछु पावैं हम महलन ते लै कै कूच देयँ करवाय ॥ भजनानन्दी सब योगी हैं कहुकछुदेवैं भजनसुनाय ८६ शोक छाँड़िकै आनँद होवो करिहैं कुशल जानकीमाय ॥ एक पिथौरा कै गिनती ना लाखन चढ़ैं पिथौरा आय ८७ पुण्य तुम्हारी ते मिटि जैहैं माता साँच देयँ बतलाय ॥ काहे रोवो तुम महलन मा माता बार बार घबड़ाय ८८ सुनिकै बातें ये योगिन की मल्हना छाँड़िदीन डिंडकार ॥ काह बतावैं हम योगिन ते नाहिंन उदयसिंह सरदार ८६ कुँवाँ विवाहन उदयसिंह गे तब मैं पैर दीन लटकाय ॥ प्राणनेग तहँ हमका दीन्ह्यो आल्हा केर लहुरवाभाय ६० बात ब्यगरिगै महाराजा ते आल्हा ऊदन गये रिसाय ॥ मरिगा ठाकुर सिरसावाला बिपदा गई मोहोबे आय ६१ खान पान अब कछु सूझै ना बूझै नहीं कछू दिनरात ॥ को अब जूझै पृथीराज ते सूझै नहीं मनै यह बात ६२
१० आल्हखण्ड । ४३४ पर्व भुजरियन के मूड़ेपर पृथ्वी गाँसि मोहोबा लीन ॥ कैसे जैबे हम सागर पर पवनी खोंटि विधातै कीन ६३ प्यारी बेटी चन्द्रावलि घर ऊदन लाये बिदाकराय ॥ सो नहिं जैहै जो सागर पर हमरी जियत मौत है जाय ६४ बेटी ठाढ़ी चन्द्रावलि तहँ नैनन आँस रही ढरकाय ॥ जैसो योगी यहु ठाढ़ो है ऐसो मोर लहुरवा भाय ६५ हाय ! अकेले बिन ऊदन के गड़बड़ परा नगर में आय ॥ ऊदन मलखे की समता का तीसर भयो कौन जगमाय ६६ मोहिं अभागिनि के कर्मन ते दूनों भाई गये हिराय ॥ कह्यो संस्कृत मा ऊदन ते लाखनिराना बचन सुनाय ६७ नाम बताओ तुम मल्हना ते काहे धरी निठुरता भाय ॥ कह्यो संस्कृत मा ऊदन तब तुम सुनिलेउ कनौजीराय ६८ नाम बतावैं जो मल्हना ते हमरी जियत मृत्यु है जाय ॥ इतना कहिकै लखराना ते मल्हनै बोले वचन सुनाय ६६ शोच न राखो कछु मन अन्तर रानी साँच देयँ बतलाय ॥ पर्व तुम्हारी हम करवैहैं अपनो योग दिहैं दिखलाय १०० काह हकीकति है पिरथी कै गड़बड़ करै परव में आय ॥ हैं अनगिनती योगी सँगमा झावर डेरादीन गड़ाय १०१ करी लबरई पिरथी राजा दिल्ली ताल देव करवाय ॥ कीन इशारा फिरि लाखनि तन आपन गुरूदीन बतलाय १०२ गुरु जानिकै लखराना को चन्द्रावलि ने कहा सुनाय ॥ होय सनीनो अब सागर माँ जो गुरुबाबा करो सहाय १०३ नहीं सनीनो अब मोहवे माँ साँचो नहीं परै दिखलाय ॥ लाखनि बोले चन्द्रावलि ते बहिनी साँच देयँ बतलाय १०४
कीरतिसागरका मैदान । ४३५ ११ योग दिखावब हम सागर पर खेतम लड़ब बरोबरि आय ॥ देखि सनीनो हम मोहबे का पाछे धरब अगाड़ी पायँ १०५ पंद्रादिन लौं रहि मोहवे मा तुम्हरी परब देब करवाय ॥ नहिं मुख देखें हम पिरथी का गड़बड़ तहाँ मचावैं आय १०६ अड़वड़ योगी हमरे सँग मा लड़बड़ गड़बड़ देयँ हटाय ॥ बड़बड़ राजनकी गिनती ना सड़वड़ करें हमारी आय १०७ काह हकीकति है पिरथी कै जो तहँ चेंय करें मुख माय ॥ मान न रैहैं तहँ काहू के योगी योग देयँ दिखलाय १०८ काल्हि सबेरे तुम सागर मा पवनी करो अपनी जाय ॥ दूत पठावो तुम झाबर का योगी फौज देयँ दिखलाय १०६ मारि गिरावैं हम भोगिन का माता साँच दीन बतलाय ॥ भयो आसरा तब मल्हना के योगी चलिभे शीश नवाय ११० सुनी बतकही यह माहिल जब टाहिल चुगुलन मा सरदार ॥ चला उताइल सो सागर को राजा पिरथी के दरबार १११ बड़ी खातिरी करि माहिल कै राजा पास लीन बैठाय ॥ कही हकीकति तहँ योगिन कै माहिल बार बार सब गाय ११२ योगी आये अनगिनती हैं झाबर डेरा दिह्यनि डराय ॥ शपथ खायकै ते मल्हना ते अबहीं गये पिथौराराय ११३ मारि गिरावब हम सागर मा गड़बड़ जौन मचाई आय ॥ काह हकीकति पृथ्वीराज कै आपनयोग देब दिखलाय ११४ साँचे योगी सो अड़बड़ हैं हमहूँ देखि गयेन सकुचाय ॥ पहिले खेदो तुम योगिनका पाछे मोहबा लेउ लुटाय ११५ काह हकीकति है योगिन कै सरबीर करें नृपति कै आय ॥ चौंड़ा धांधू को पठवावो योगी कूच देयँ करवाय ११६
१२ आल्हखण्ड । ४३६ इतना सुनिकै पृथीराज ने चौंड़ा धांधू लीन बुलाय ॥ भल समुझावा तिन दोउनका यहु महराज पिथौराराय ११७ दोऊ चढ़िकै तहँ हाथिन मा तहँते कूच दीन करवाय ॥ जायकै पहुँचे फिरि झाबर मा जहाँपर योगिनकासमुदाय ११८ चौंड़ा बोला तहँ ऊदन ते योगी हाल देउ बतलाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ काहे डेरा दीन गड़ाय ११९ ऊदन बोले तब चौंड़ा ते ठाकुर हाथी के असवार ॥ हम तो आये बंगाले ते जावैं हरद्वार यहिवार १२० पै हम रहिबे ह्याँ पंद्रादिन तुमते साँच दीन बतलाय ॥ मल्हनारानी इक मोहबे मा ताकी परख देब करवाय १२१ है खलभल्ला औ हल्लाअति की चढ़ि अवा पिथौराराय ॥ कीन प्रतिज्ञा हम मोहबे मा तुम्हरी परख देब करवाय १२२ साँची करिबे हम वानी का ताते टिकैब यहाँ पर भाय ॥ कहाँ के ठाकुर तुम दोऊ हौ हमते साफ देउ बतलाय १२३ फौज देखिकै वैरागिन कै दोऊ लागि मनै पछिताय ॥ कौन हटाई वैरागिन का सम्मुख समरभूमिमें जाय १२४ जौन बनावा महराजा ने योगिन सबई दीन बतलाय ॥ कैसे टरिहैं ये झाबर ते यह नहिं चित्तठीकठहराय १२५ चौंड़ा धांधू फिरि बोलत भे योगिन बार बार समुझाय ॥ करें बखेड़ा कहुँ योगी ना ताते कूच देउ करवाय १२६ कह्यो पिथौरा यह हमते है योगिन जाय देउ समुझाय ॥ कूच करावैं उइ झाबर ते नाहक रारि मचावैं आय १२७ लड़ना मरना रजपूतन का युग युग धर्म यहै है भाय ॥ युद्ध न चहिये वैरागिन को ताते कूच देउ करवाय १२८
कीरतिसागरकामैदान । ४३७ १३
फौज तुम्हारी ह्याँ जितनी है सबको भोजन देयँ पठाय ॥ खावो पीवो हरिको ध्यावो जावो हरद्वार को भाय १२६ इतना सुनिकै ऊदन तड़पे चौंड़ा चला तुरत भयखाय ॥ आय कै पहुँचा त्यहि तम्बू मा जहँ पर बैठ पिथौराराय १३० कही हक़ीकति सब योगिन कै चौंड़ा बार बार समुझाय ॥ सुनी ढिठाई जब योगिन कै माहिलबोले शीशनवाय १३१ अब हम जावत हैं मोहबे को तुम्हरे काज पिथौराराय ॥ इतनी कहिकै माहिल चलिभे पहुँचे फेरि मोहोवे आय १३२ रानी मल्हना ह्याँ महलन मा मनमा बार बार पछिताय ॥ त्यही समइया त्यहि औसरमा माहिलभाय पहुँचाजाय १३३ मल्हना बोली तहँ माहिल ते नीके गयो यहाँपर आय ॥ हाल बतावो अब सागर का चाहत काह पिथौराराय १३४ सुनिकै बातें ये बहिनी की बोला उरई का सरदार ॥ बैठक मांगत है खजुहा की माँगै राजग्वालियरक्यार १३५ उड़न बछेड़ा पाँचो माँगै औरो चहै नौलखाहार ॥ डोलामाँगै चन्द्रावलि का राजा दिल्ली का सरदार १३६ तुम्हरी दिशितें हम पिरथी ते बोल्यन बहुतभांति समुझाय ॥ लाख रुपैया लग लैहैं तुम ह्याँते कूचदेउ करवाय १३७ यह मनभाई नहिं पिरथी के चौंड़ा ताहर उठे रिसाय ॥ जो कछु माँगत महराजा हैं सोई देउ आप मँगवाय १३८ कुशल न मानो तुम मोहोवे कै तिलतिल भूमिलैं खुदवाय ॥ पारस पत्थर पिरथी माँगें बहिनीसाँचदीनबतलाय १३६ ये सब चीजें अब लीन्हे बिन जावें नहीं पिथौराराय ॥ ताहर चौंड़ा की मरजी अस सबियांमोहवालेयँ लुटाय १४०
१४ आल्हाखण्ड । ५३= इतनो कहिकै माहिल चलिभे मल्हना रोय उठी अकुलाय ॥ त्यही समैया त्यहि अवसरमा ब्रह्मानन्द पहुँचे आय १४१ मूड़ सूंघिकै रानी मल्हना अपने पास लीन बैठाय ॥ बहिनी ठाढ़ी चन्द्रावलि तहँ नैनन आँसूरही गिराय १४२ रोय कै बोली फिरि मल्हनाते माता साँच देयँ बतलाय ॥ सुजी सिराउब हम सागर मा योगी गये भरोस कराय १४३ साँची वाणी के योगी हैं निश्चय पर्व द्यहैं करवाय ॥ मोहिं भरोसा है योगिन का जो कछु करें सहारा आय १४४ मल्हना बोली चन्द्रावलि तें बिटिया साँच देउँ बतलाय ॥ सुजी सिरावो तुम कुँवनापर दीनौं धर्म दूऊ रहिजाय १४५ इतना सुनिकै बेटी बोली ऐसे कहौ वचन का माय ॥ समरथ भैया हैं ब्रह्मानँद हमरी पर्व द्यहें करवाय १४६ इतना सुनिकै ब्रह्मा बोले साँची साँच देयँ बतलाय ॥ रहौ भरोसे तुम योगिन के जानौं नहीं हमारे भाय १४७ पै हम जावैं जो सागर को आपन मूड़ कटावैं जाय ॥ चढ़ा पिथौरा है सँभरा भर बहिनी काह गई बौराय १४८ जानि बूझिकै को आगी मा आपन हाथ जरावै जाय ॥ बिना बेंड़लाके चढ़वैया मुर्चा देवै कौन हटाय १४६ आल्हा इन्दल लग होते जो तुम्हरी पर्व देत करवाय ॥ मरिगा ठाकुर सिरसावाला सब विधिशूर बनाफरराय १५० इकले दादा मलखाने बिन यहु दुख परा जानपर आय ॥ होत जो ठाकुर सिरसावालो तौका चढ़त पिथौराराय १५१ शूर न देखा हम दुनिया मा जैसो रहै वीर मलखान ॥ हाथी पटका पिरथी दारे काँपे तहाँ सबै चौहान १५२
कीरतिसागरकामैदान । ४३६ १५ इतना सुनिकै रानी मल्हना तुरतै छाँड़ि दीन डिंडकार ॥ रंजित बोला तब माता ते गरुई हांक देत ललकार १५३ छाँड़ि भरोसा अब योगिनका हमरे साथ चलो तुम हाल ॥ काह हकीकति है पिरथी कै जबलग रहै हाथ करवाल १५४ मारे मारे तलवारिन के नदिया बहै रक्त की धार ॥ मूड़ न रहै जब देही माँ तबहूँ चली मोरि तलवार १५५ लड़ना मरना रजपूतन का युग युग यही धर्म व्यवहार ॥ प्राण न रहैं जब देही माँ तबहीं मिटी म्वार व्यवहार १५६ साँची साँची हम बोलत हैं माता शपथ तुम्हारी खाय ॥ कीरतिसागर मदनताल पर बहिनीसाथचलौतुममाय १५७ जो नहिंजैहौ तुम सागर को रंजित मरी जहर को खाय ॥ मर्द मर्दई ते चूका जो तौफिरजियत मृत्युहैजाय १५८ देही रहै नहिं दुनिया माँ कीरति बनी रहै सब काल ॥ मोहिं पियारी सबइ कीरति है साँचीशपथखाउँमहिपाल १५६ सुनि सुनि बातें ये बेटा की मल्हना हैगै हाल बिहाल ॥ बेटा अभई माहिल वाला बोला बचन सांचत्यहिकाल १६० हमहूँ चलिबे तुम्हरे सँग मा साँचे बचन बतावैं भाय ॥ आजु मोहोबा खाली लखिकै गांसा आय पिथौराराय १६१ आल्हा ऊदन हैं कनउज मा ह्यां मरिगये बीरमलखान ॥ अब हम लूटैं खूब मोहबे को सोची भली वीर चौहान १६२ पै नहिं जानत हैं अभई का जबलग रही हाथ तलवार ॥ तवलग मारब हम क्षत्रिनका नदिया बही रक्तकी धार १६३ करो तयारी अब सागर की फूफ़ू सांच देयँ बतलाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै गड़बड़ करै परबमें आय १६४
१६ आल्हखण्ड । ४४० रंजित अभई की बातें सुनि मल्हना गई तुरत बौराय ॥ बोलि न आवा महरानी ते मुँहकापान गयोकुम्हिलाय १६५ धीरज धरिकै अपने मनमा औ फिरिसुमिरि शारदामाय ॥ देव मनावै मनियादेवन मल्हना बारवार शिरनाय १६६ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ देंवता मोहबे के भगवान ॥ रंजित अभई दोउ बेटन की कीन्ह्यो आपनवंशकल्यान १६७ हम जो बरजैं अब रंजित का कहि हैं पूत नहीं कछु कान ॥ शपथ खायकै महराजा कै हमरीशपथकीनफिरि आन १६८ अब समुझाये ते मानी ना मनमा ठीक लीन ठहराय ॥ कीन तयारी फिरि सागर कै गौरा पारवती को ध्याय १६६ माहिल बोले ह्याँ अभई ते बेटा काह गयो बौराय ॥ तुम नहिं जावो सँग रंजित के मोहवा भलेउजरिसबजाय १७० रंजित ब्रह्मा दोउ मरिजावैं तुम्हरी जूझे पूत बलाय ॥ इतना सुनिकै अभई बोले दाऊ सांच देयँ बतलाय १७१ कहा नपलटबहमकौनिउविधि चहु तन रहै चहौ नशिजाय ॥ पांय लागिकै फिरि माहिल के डङ्का तुरत दीन बजवाय १७२ बाजे डङ्का अहतङ्का के शङ्का छोड़ि दीन सरदार ॥ शूर अशङ्का भट बङ्का जे ते सब गही हाथ तलवार १७३ सजा रिसाला घोड़नवाला आलाँ एक लाख अनुमान ॥ संजि इकदन्ता दुइदन्ता गे हाथी छोटे मेरु समान १७४ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरी अँवारी तिन हाथिन पर बहुत न हौदा रहे विराज १७५ घण्टा बांधे गल हाथिन के भारी देत चलैं ठनकार ॥ सजे सिपाही पैदल वाले लीन्हे हाथ ढाल तलवार १७६
कीरतिसागरकामैदान । ४४१ ९७ बारह रानी परिमालिक की सोऊ भईं बेगि तय्यार ॥ जहर बुझाई छूरी लै कै नलकी पलकी भईं सवार १७७ मल्हना बोली चन्द्रावलि ते बेटी करो बचन परमान ॥ डोला तुम्हरो गहै पिथौरा तौ दैदियो आपनो प्रान १७८ पै तुम जायो नहिं दिल्ली को पेट म मार्यो काढ़ि कटार ॥ इतना कहिकै रानी मल्हना आपो होत भई असवार १७६ आगे पीछे फौजैं कैकै बीच म डोला लीन कराय ॥ मनियादेवनको सुमिरन करि रंजित कूचदीन करवाय १८० छींक तड़ाका भै सम्मुख मा मल्हना रोय उठी ततकाल ॥ तुम नहिं जावो अब सागरको बेटा करो बचन प्रतिपाल १८१ अशकुन पहिलेते ह्वैगा है कैसी करी तहाँ करतार ॥ लेउँ बलैया मैं रंजित कै बेटा लौटिचलो यहिबार १८२ इतना सुनिकै रंजित बोले माता करो बचन बिश्वाश ॥ शकुन औ अशकुनकोमानैना ना हमकरैं जीवकी आश १८३ कीरतिसागर मदनताल पर तुम्हरी पर्ब द्यहैं करवाय ॥ जो मरिहैं हम सागर में कीरति रही जगतमेंछाय १८४ पाउँ पिछारी को धरिबेना चहुँतन धजीधजी उड़िजाय ॥ स्याबसि स्याबसि अभई बोले मल्हनाचुप्पसाधिरहिजाय १८५ चलिभा लश्कर फिरि आगेका फाटक उपर पहुँचा जाय ॥ जहँना तम्बू पृथीराज का माहिल तहाँ पहुँचाधाय १८६ खबरि सुनाई सब पिरथी को माहिल बार बार समुझाय ॥ हुकुम पायकै तहँ पिरथी का चौंड़ा कूच दीन करवाय १८७ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सन्तनधुनी दीनपरचाय १८८
१८ : आल्हखण्ड । ४४२ करों वन्दना पितु माता को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मातु भवानी पितु परमेश्वर वन्दनकिहे स्वर्गकाजाय १६८ निश्चयजिनका पितु मातापर देवी देव सरिस अधिकाय ॥ तिनका जगमा कछुदुर्लभ ना साँचीकहतललितयहगाय १६० करों वन्दना अब शंकर की ह्याँते करों तरंगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवै इच्छा यही भवानीकन्त १६१ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरआत्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलाँनिवासि मिश्र वंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत रंजित युद्धागमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ दीनदयाल गुपाल कृपाल सुरासुरपाल सुनो महराजा । सोवत जागत बैठ जो होहु सुनो विनती तुमहूँ रघुबलामा । गाजिरह्यो खल कामबली औ छलीदल मोहके बाजतबाजा । राम औ कृष्णभजै ललिते तबहूँ यह जीततहै कलिराजा १ सुमिरन ॥ रक्षा जगकी जो करते ना तौ कस होत नाम जगदीश ॥ ईश्वर होते रघुनन्दन ना कैसे हनत समर दशशीश १ बड़े प्रतापी अंजनि वाले अबहूँ अमर जगत हनुमान ॥ ऐसे अनुचर ज्यहि स्वामी के पूरण ब्रह्म ताहि अनुमान २ रीछ औ बाँदर को सँगमालै जीता बली शत्रु को जाय ॥ शत्रु प्रतापी के भाई को को नर लेय जगत अपनाय ३ को फल खावत घर शबरी के कोधौं तजत आपनी राज ॥ कोधौं तारत तिय गौतम की प्यारी माननीय शिरताज ४
कीरतिसागरकोमैदान । ४४३ १६ कोधों तोरत शिवके धनुको जो नहिं होत राम महराज ॥ कछु नहिं शंका मन हमरे में पूरणब्रह्म राम रघुराज ५ माथ नवावों रघुनन्दन को हमपर कृपा करो भगवान ॥ चौंड़ा रंजित का मुर्चा मैं करिहौं सकल अगाड़ी गान ६ अथ कथाप्रसंग ॥ अटा चौंडिया फिरि फाटक पर गरुई हाँक दीन ललकार ॥ पाँव अगाड़ी का डाखो ना ठाकुर मोहबे के सरदार १ डोलादैके चन्द्रावलि को पाछे धरूयो अगाड़ी पाँय ॥ हुकुम पिथौरा का याही है तुमते साँच दीन बतलाय २ इतना सुनिकै अभई बोल्यो चौंड़ा काह गयो बौराय ॥ अस गति नाहीं पृथीराज-कै डोला लेयँ आज मँगवाय ३ खाली मोहबा तुम जान्यो ना मान्यो साँच बचन विश्वास ॥ शूर सराहें त्यहि ठाकुर को जो अब जाय पालकी पास ४ इतना गुनिकै चौंड़ा तुरतै अपनी खैंचिलीन तलवार ॥ पाँव अगाड़ी का डाख्यो ना ठाकुर उरई के सरदार ५ इतना सुनिकै रंजित ठाकुर फौजन हुकुम दीन फरमाय ॥ जान न पावैं दिल्लीवाले इनके देवो मूड़ गिराय ६ हुकुमपायकै यह रंजित का क्षत्रिन खैंचिलीन तलवार ॥ पैदल के सँग पैदल अभिरे औ असवार साथ असवार ७ सूंदि लपेटा हाथी भिड़िगे मारन लागि शूर सरदार ॥ भाला बलछी तीर तमंचा कोताखानी चलै कटार ८ विकट लड़ाई भै फाटक पर नदिया बही रक्तकी धार ॥ ना मुहँ फेरैं दिल्लीवाले ना ई मुहवे के सरदार ६ रंजित अभई की मारुन मा सब दल होनलाग खरिहान ॥
२० आल्हाखण्ड । ४१४ रही न आशा क्यहु लड़िवेकी आरी भये समरमें ज्वान १० सवैया ॥ मारत औ ललकारत संगर लंगर भे क्यहु बुद्धि चलैना । शूर शिरोमणि रंजित ज्वान सो मान किये रण पैर टरैना ॥ होत जहाँ घमसान महाँ तहँ बीर कोऊ अभिमान करैना । माहिल पूत सुपुत जहाँ सो तहाँ ललिते कोउ देखि परैना ११ बड़ा लड़ैया माहिल वाला आला उरई का सरदार ॥ हनि हनि मारे राजपूतन का भारी हाँक देय ललकार १२ चौंड़ा बकशी पृथीराज का सोऊ खूब करै तलवार ॥ चौंड़ा सोहत है हाथी पर अभई घोड़े पर असवार १३ सेल चौंड़िया हनिकै मारा अभई लीन्ह्यो वार बचाय ॥ ऐँड़ लगावा फिरि घोड़े के हाथी उपर पहुँचा जाय १४ ढालकि औझड़ अभई मारा चौंड़ा गयो मूर्छा खाय ॥ भागि सिपाही दिल्लीवाले रंजित दीन्ह्यो फौज बढ़ाय १५ कीरतिसागर मदनताल पर पहुँचा फेरि चँदेला आय ॥ गा हरिकारा ह्वाँ फौजन ते राजै खबरि सुनाई जाय १६ हाल पायकै पृथीराज ने सूरज पूत दीन पठवाय ॥ सूरज आयो जब सागरपै बोल्यो दोऊ भुजा उठाय १७ डोला दैकै चन्द्रावलि का रंजित कूच देउ करवाय ॥ नहीं तो बचिहौ ना संगर मा जो विधि आपु बचावैं आय १८ इतना सुनिकै रंजित बोले सूरज काह गये बौराय ॥ मर्द सराहौं त्यहि ठाकुर का डोला पास जाय नगण्वाय १६ जितनी बिल्ली दिल्लीवाली तिनको देवों समर सुवाय ॥
कीरतिसागरकामैदान । ४४५ ३१ तौ तौ लौरिका परिमालिक का नहिंई मुच्छ डरों मुड़वाय २० इतना सुनिकै सूरज जरिगे अपने कहा सिपाहिन टेर ॥ जान न पावैं मोहबेवाले मारो एक एक को घेर २१ सुनिकै बातें ये सूरज की क्षत्रिन खैंचि लीन तलवार ॥ कीरतिसागर मदनताल पर लाग्यो होन भड़ाभड़मार २२ पैग पैग पर पैदल गिरिगे दुइ दुइ पैग गिरे असवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार २३ को गति वरणै तहँ अझई कै मारे ढूँढ़ि ढूँढ़ि सरदार ॥ रंजित लड़का परिमालिकका दूनों हाथ करै तलवार २४ सूरज ठाकुर दिल्लीवाला आला समरधनी चौहान ॥ गनि गनि मारै रजपूतन का कीरतिसागर के मैदान २५ रंजित सूरज द्वउ ठकुरन का मुर्चा परा बरोबरि आय ॥ दोऊ सोहैं भल घोड़न पै दोऊ रूपशील अधिकाय २६ सूरज मारै जब रंजित का दाहिन बाँउ खेलि तब जाय ॥ रंजित मारै जब सूरज का सोऊ लेवै वार बचाय २७ उसरिन उसरिन दोऊ खेलैं पानी भरै यथा पनिहार ॥ कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ लड़ैं तहाँ सरदार २८ सवैया ॥ सिंह समान सो रंजित वीर औ सूरजहू बल घाटि कछूना । मार अपार भई ललिते पै उदारन के मन शङ्क कछूना ॥ शक्ति औ शूल चलै तलवार सो मार कही कहिजात कछूना । रक्त कि धार अपार बही पर हार औ जीत लखात कछूना २९ सब्जा घोड़े पर रंजितहैं सूरज सुरखा पर असवार ॥
२२ आल्हाखण्ड । ४४६ दोऊ मारैं तलवारिन सों दोऊ लेयँ ढाल पर वार ३० कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ रण परा बरोबरि आय ॥ वार चलाई रंजित ठाकुर सूरज लैगा चोट बचाय ३१ सूरज मारा तलवारी का रंजित लीन ढाल पर-वार ॥ रंजित मारा तलवारी का चेहरा काटि निकरिगै पार ३२ सूरज जूझे जब मुर्चा में पहुँचा टंक तुर्तही आय ॥ टंक सामने अभई आये खेलन लागि जूझके दायँ ३३ यहु रणनाहर माहिलवाला गरुई हाँक देय ललकार ॥ टंक शंक तजि त्यहि औसरमा दूनों हाथ करै तलवार ३४ साँँग चलाई नृपति टंक ने अभई लीन्ही वार बचाय ॥ भाला मारा जब अभई ने तोंदी परा घाव सो जाय ३५ टंक औ सूरज दोऊ मरिगे हाहाकार फौज मा छाय ॥ गा हरिकारा फिरि फौजन ते राजै खबरि जनाई जाय ३६ हाल पायकै पृथीराज ने ताहर बेटा लीन बुलाय ॥ मर्दनि सर्दनि को बुलवावा तिनते हालकहा समुझाय ३७ टंक और सूरज दोऊ जूझे कीरतिसागर के मैदान ॥ लाश लयआवो दुउ वीरन की भावी जानि सदा बलवान ३८ हुकुम पायकै महाराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ तीन लाखलों लश्कर लैके तुरतै कूच दीन करवाय ३६ कीरतिसागर मदनपालपर ताहर अटा तुरतही धाय ॥ लाश देखिकै दुउ वीरन कै सो पलकी म दीन रखवाय ४० निकट जायकै दल रंजितके गरुई हाँक कहा गुहराय । कौन बहादुर है मोहवे का सूरज टंकै दीन गिराय ४१ डोला दैके चन्द्रावलि का अबहीं कूच देउ करवाय ॥
कीरतिसागरकामैदान । ४४७ २३ 'नहीं सुहागिल कोउ वचिहै ना मोहवा रंडन सों भरिजाय ४२ इतना सुनिकै अभई बोले रण माँ दोऊ भुजा उठाय ॥ हम नहिं देखें गति काहूकै डोला पासजाय नगच्याय ४३ पर्व आपनी पूरी करिकै अबहीं कूच देव करवाय ॥ रारि मचाये कछु पैहौ ना साँची बात दीन बतलाय ४४ अबै मोहोवा अस सूना ना जैसा समझि लीन सरदार ॥ मूड़ न रहैं जब देही मा तवहूं रुण्ड करैं तलवार ४५ इतना सुनिकै ताहर ठाकुर लाशौ फौज दीन पठवाय ॥ हुकुम लगावा रजपूतन का इनके देवो मूड़ गिराय ४६ हुकुम पाय कै यह ताहर का लागे लड़न शूर सरदार ॥ पैदल पैदल कै बरणी मै औ असवार साथ असवार ४७ भाला वलंछी छूटन लागे पागे मोद शूर त्यहि बार ॥ अपन परावा कछु सूझै ना आमाझोर चलै तलवार ४८ कटि कटि कल्ला गिरैं खेत माँ उठि उठि रुण्ड मचावैं मार ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै नदिया बही रक्तकी धार ४९ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ यहु रणनाहर मल्हनावाला आल्हा मोहबे का सरदार ५० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे सिंह बिडारै गाय ॥ तैसे मारै रजपूतन का छप्पन दीन्हे मूड़ गिराय ५१ बड़ा प्रतापी रण नाहर यहु यहिके बाँट परी तलवार ॥ यहिके मारे हाथी गिरिगे मरिगे सूरजसे सरदार ५२ रंजित नामी यहु ठाकुर जो रणमाँ भली मचाई रार ॥ पटा बनेठी बाना फेंकें टेकें दऊ हाथ तलवार ५३ लोह कि टोपी शिर में धारे सब्जा घोड़ेपर असवार ॥
२४ आल्हखण्ड । १४८ झीलम बखतर दोऊ पहिरे रंजित मोहवे का सरदार ५४ ताहर बेटा पृथीराज का सोऊ आयगयो त्यहिबार ॥ गरुई हाँकन ते ललकारा ठाकुर मोहवे के सरदार ५५ कीन ढिठाई तुम अब लग है अब हम साँच देत बतलाय ॥ डोला दैकै चन्द्रावलि का अबहीं कूच देउ करवाय ५६ नहीं तो आशा तजु जीवनकी यमपुर देत आज दिखलाय ॥ दीखि लड़ाई नहिं ताहर की नाहर खबरदार है जाय ५७ इतना कहिकै ताहर ठाकुर रंजित पास पहुँचा जाय ॥ रंजित मारी तलवारी को ताहर लैगा चोट बचाय ५८ ताहर मारा तलवारी का रंजित लीन ढाल पर वार ॥ खैंचि सिरोही रंजित मारी ताहर रोंकिलीन त्यहिबार ५६ जैसे रसरी गगरी लैके पानी खैंचि रही 'पनिहार ॥ तैसे रंजित ताहर दोऊ रणमाँ भली मचाई रार ६० सवैया ॥ मार अपार भई त्यहि बार सो यार सँभार रह्यो कछु नाँहीं। जूझिगये बहु पैदल स्वार तजे हथियार कबों रण नाहीं ॥ जातभये सुरलोक तबै औ जबै तजि प्राण दिये रणमाहीं। कीरति लोक रहै ललिते परलोक बनै क्षण एकहि माहीं ६१ दोऊ प्यारे रघुनन्दन के बन्दन करैं हृदय कत्तार ॥ दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढालपर वार ६२ रंजित चूके तलवारी ते कटिकै मूड़ गिरा त्यहिबार ॥ पूत सपूत माहिलवाला आला उरई का सरदार ६३ सम्मुख ताहर के आवा सो सुर्खा घोड़ेपर असवार ॥
कीरतिसागरकामैदान । ४४६ २५ ओ ललकारा फिरि ताहर को सँभरो दिल्ली के सरदार ६४ इतना सुनिकै ताहर बोले अभई बार बार धिकार॥ लिल्लीघोड़ी के चढ़वैया माहिल बाप तुम्हारे यार ६५ तिनके लरिका तुम तलवरिहा कबते भयो कहौ सरदार ॥ इतना सुनिकै अभई ठाकुर अपनी खैंचि लीन तलवार ६६ ताहर अभई दोउ बीरन का परिगा समर बरोबरि आय ॥ रञ्जित जूझे हैं संगर में धावन खबरि सुनाई जाय ६७ खबरि पायकै मल्हना रानी तुरतै गिरी तहाँ कुम्हिलाय ॥ बारह रानी परिमालिक की गिरि गिरि परैं पछाराखाय ६८ रञ्जित रञ्जित कै गुहरावैं छाती धड़कि धड़कि रहिजाय ॥ मारे डरके पिंडुरी काँपैं थर थर देह रही थर्राय ६६ कोगति बरौ चन्द्रावलि कै भलिकैविपत्ति कही ना जाय ॥ सावधान भै मल्हनारानी तुरतै दीन्ह्यो दूत पठाय ७० बोलन लागी चन्द्रावलि ते मनमा बार बार पछिताय ॥ खप्पर भरिगा धिक् बेटी त्वहिं सागर पूत गँवावा आय ७१ इतना कहिकै मल्हना रानी तुरतै गिरी पछाराखाय ॥ गा हरिकारा हाँ मोहबे मा ब्रह्म खबरि जनाई जाय ७२ रञ्जित जूझे हैं सागर पर तिनकी लाश लेहु उठवाय ॥ इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ७३ सजि हरनागर तहँ ठाढ़ो थो तापर कूदि भये असवार ॥ पाँचलाख लौं फौजैं लैंकै सागर चलन हेतु तय्यार ७४ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ७५ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथमें लई ढाल तलवार ॥ १९