भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१६ आल्हखण्ड । ४४० रंजित अभई की बातें सुनि मल्हना गई तुरत बौराय ॥ बोलि न आवा महरानी ते मुँहकापान गयोकुम्हिलाय १६५ धीरज धरिकै अपने मनमा औ फिरिसुमिरि शारदामाय ॥ देव मनावै मनियादेवन मल्हना बारवार शिरनाय १६६ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ देंवता मोहबे के भगवान ॥ रंजित अभई दोउ बेटन की कीन्ह्यो आपनवंशकल्यान १६७ हम जो बरजैं अब रंजित का कहि हैं पूत नहीं कछु कान ॥ शपथ खायकै महराजा कै हमरीशपथकीनफिरि आन १६८ अब समुझाये ते मानी ना मनमा ठीक लीन ठहराय ॥ कीन तयारी फिरि सागर कै गौरा पारवती को ध्याय १६६ माहिल बोले ह्याँ अभई ते बेटा काह गयो बौराय ॥ तुम नहिं जावो सँग रंजित के मोहवा भलेउजरिसबजाय १७० रंजित ब्रह्मा दोउ मरिजावैं तुम्हरी जूझे पूत बलाय ॥ इतना सुनिकै अभई बोले दाऊ सांच देयँ बतलाय १७१ कहा नपलटबहमकौनिउविधि चहु तन रहै चहौ नशिजाय ॥ पांय लागिकै फिरि माहिल के डङ्का तुरत दीन बजवाय १७२ बाजे डङ्का अहतङ्का के शङ्का छोड़ि दीन सरदार ॥ शूर अशङ्का भट बङ्का जे ते सब गही हाथ तलवार १७३ सजा रिसाला घोड़नवाला आलाँ एक लाख अनुमान ॥ संजि इकदन्ता दुइदन्ता गे हाथी छोटे मेरु समान १७४ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरी अँवारी तिन हाथिन पर बहुत न हौदा रहे विराज १७५ घण्टा बांधे गल हाथिन के भारी देत चलैं ठनकार ॥ सजे सिपाही पैदल वाले लीन्हे हाथ ढाल तलवार १७६