भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 618 में से

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कीरतिसागरकामैदान । ४३६ १५ इतना सुनिकै रानी मल्हना तुरतै छाँड़ि दीन डिंडकार ॥ रंजित बोला तब माता ते गरुई हांक देत ललकार १५३ छाँड़ि भरोसा अब योगिनका हमरे साथ चलो तुम हाल ॥ काह हकीकति है पिरथी कै जबलग रहै हाथ करवाल १५४ मारे मारे तलवारिन के नदिया बहै रक्त की धार ॥ मूड़ न रहै जब देही माँ तबहूँ चली मोरि तलवार १५५ लड़ना मरना रजपूतन का युग युग यही धर्म व्यवहार ॥ प्राण न रहैं जब देही माँ तबहीं मिटी म्वार व्यवहार १५६ साँची साँची हम बोलत हैं माता शपथ तुम्हारी खाय ॥ कीरतिसागर मदनताल पर बहिनीसाथचलौतुममाय १५७ जो नहिंजैहौ तुम सागर को रंजित मरी जहर को खाय ॥ मर्द मर्दई ते चूका जो तौफिरजियत मृत्युहैजाय १५८ देही रहै नहिं दुनिया माँ कीरति बनी रहै सब काल ॥ मोहिं पियारी सबइ कीरति है साँचीशपथखाउँमहिपाल १५६ सुनि सुनि बातें ये बेटा की मल्हना हैगै हाल बिहाल ॥ बेटा अभई माहिल वाला बोला बचन सांचत्यहिकाल १६० हमहूँ चलिबे तुम्हरे सँग मा साँचे बचन बतावैं भाय ॥ आजु मोहोबा खाली लखिकै गांसा आय पिथौराराय १६१ आल्हा ऊदन हैं कनउज मा ह्यां मरिगये बीरमलखान ॥ अब हम लूटैं खूब मोहबे को सोची भली वीर चौहान १६२ पै नहिं जानत हैं अभई का जबलग रही हाथ तलवार ॥ तवलग मारब हम क्षत्रिनका नदिया बही रक्तकी धार १६३ करो तयारी अब सागर की फूफ़ू सांच देयँ बतलाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै गड़बड़ करै परबमें आय १६४

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