आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४४१ ९७ बारह रानी परिमालिक की सोऊ भईं बेगि तय्यार ॥ जहर बुझाई छूरी लै कै नलकी पलकी भईं सवार १७७ मल्हना बोली चन्द्रावलि ते बेटी करो बचन परमान ॥ डोला तुम्हरो गहै पिथौरा तौ दैदियो आपनो प्रान १७८ पै तुम जायो नहिं दिल्ली को पेट म मार्यो काढ़ि कटार ॥ इतना कहिकै रानी मल्हना आपो होत भई असवार १७६ आगे पीछे फौजैं कैकै बीच म डोला लीन कराय ॥ मनियादेवनको सुमिरन करि रंजित कूचदीन करवाय १८० छींक तड़ाका भै सम्मुख मा मल्हना रोय उठी ततकाल ॥ तुम नहिं जावो अब सागरको बेटा करो बचन प्रतिपाल १८१ अशकुन पहिलेते ह्वैगा है कैसी करी तहाँ करतार ॥ लेउँ बलैया मैं रंजित कै बेटा लौटिचलो यहिबार १८२ इतना सुनिकै रंजित बोले माता करो बचन बिश्वाश ॥ शकुन औ अशकुनकोमानैना ना हमकरैं जीवकी आश १८३ कीरतिसागर मदनताल पर तुम्हरी पर्ब द्यहैं करवाय ॥ जो मरिहैं हम सागर में कीरति रही जगतमेंछाय १८४ पाउँ पिछारी को धरिबेना चहुँतन धजीधजी उड़िजाय ॥ स्याबसि स्याबसि अभई बोले मल्हनाचुप्पसाधिरहिजाय १८५ चलिभा लश्कर फिरि आगेका फाटक उपर पहुँचा जाय ॥ जहँना तम्बू पृथीराज का माहिल तहाँ पहुँचाधाय १८६ खबरि सुनाई सब पिरथी को माहिल बार बार समुझाय ॥ हुकुम पायकै तहँ पिरथी का चौंड़ा कूच दीन करवाय १८७ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सन्तनधुनी दीनपरचाय १८८