आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ : आल्हखण्ड । ४४२ करों वन्दना पितु माता को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मातु भवानी पितु परमेश्वर वन्दनकिहे स्वर्गकाजाय १६८ निश्चयजिनका पितु मातापर देवी देव सरिस अधिकाय ॥ तिनका जगमा कछुदुर्लभ ना साँचीकहतललितयहगाय १६० करों वन्दना अब शंकर की ह्याँते करों तरंगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवै इच्छा यही भवानीकन्त १६१ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरआत्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलाँनिवासि मिश्र वंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत रंजित युद्धागमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ दीनदयाल गुपाल कृपाल सुरासुरपाल सुनो महराजा । सोवत जागत बैठ जो होहु सुनो विनती तुमहूँ रघुबलामा । गाजिरह्यो खल कामबली औ छलीदल मोहके बाजतबाजा । राम औ कृष्णभजै ललिते तबहूँ यह जीततहै कलिराजा १ सुमिरन ॥ रक्षा जगकी जो करते ना तौ कस होत नाम जगदीश ॥ ईश्वर होते रघुनन्दन ना कैसे हनत समर दशशीश १ बड़े प्रतापी अंजनि वाले अबहूँ अमर जगत हनुमान ॥ ऐसे अनुचर ज्यहि स्वामी के पूरण ब्रह्म ताहि अनुमान २ रीछ औ बाँदर को सँगमालै जीता बली शत्रु को जाय ॥ शत्रु प्रतापी के भाई को को नर लेय जगत अपनाय ३ को फल खावत घर शबरी के कोधौं तजत आपनी राज ॥ कोधौं तारत तिय गौतम की प्यारी माननीय शिरताज ४