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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

१८ : आल्हखण्ड । ४४२ करों वन्दना पितु माता को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मातु भवानी पितु परमेश्वर वन्दनकिहे स्वर्गकाजाय १६८ निश्चयजिनका पितु मातापर देवी देव सरिस अधिकाय ॥ तिनका जगमा कछुदुर्लभ ना साँचीकहतललितयहगाय १६० करों वन्दना अब शंकर की ह्याँते करों तरंगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवै इच्छा यही भवानीकन्त १६१ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरआत्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलाँनिवासि मिश्र वंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत रंजित युद्धागमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ दीनदयाल गुपाल कृपाल सुरासुरपाल सुनो महराजा । सोवत जागत बैठ जो होहु सुनो विनती तुमहूँ रघुबलामा । गाजिरह्यो खल कामबली औ छलीदल मोहके बाजतबाजा । राम औ कृष्णभजै ललिते तबहूँ यह जीततहै कलिराजा १ सुमिरन ॥ रक्षा जगकी जो करते ना तौ कस होत नाम जगदीश ॥ ईश्वर होते रघुनन्दन ना कैसे हनत समर दशशीश १ बड़े प्रतापी अंजनि वाले अबहूँ अमर जगत हनुमान ॥ ऐसे अनुचर ज्यहि स्वामी के पूरण ब्रह्म ताहि अनुमान २ रीछ औ बाँदर को सँगमालै जीता बली शत्रु को जाय ॥ शत्रु प्रतापी के भाई को को नर लेय जगत अपनाय ३ को फल खावत घर शबरी के कोधौं तजत आपनी राज ॥ कोधौं तारत तिय गौतम की प्यारी माननीय शिरताज ४

कीरतिसागरकोमैदान । ४४३ १६ कोधों तोरत शिवके धनुको जो नहिं होत राम महराज ॥ कछु नहिं शंका मन हमरे में पूरणब्रह्म राम रघुराज ५ माथ नवावों रघुनन्दन को हमपर कृपा करो भगवान ॥ चौंड़ा रंजित का मुर्चा मैं करिहौं सकल अगाड़ी गान ६ अथ कथाप्रसंग ॥ अटा चौंडिया फिरि फाटक पर गरुई हाँक दीन ललकार ॥ पाँव अगाड़ी का डाखो ना ठाकुर मोहबे के सरदार १ डोलादैके चन्द्रावलि को पाछे धरूयो अगाड़ी पाँय ॥ हुकुम पिथौरा का याही है तुमते साँच दीन बतलाय २ इतना सुनिकै अभई बोल्यो चौंड़ा काह गयो बौराय ॥ अस गति नाहीं पृथीराज-कै डोला लेयँ आज मँगवाय ३ खाली मोहबा तुम जान्यो ना मान्यो साँच बचन विश्वास ॥ शूर सराहें त्यहि ठाकुर को जो अब जाय पालकी पास ४ इतना गुनिकै चौंड़ा तुरतै अपनी खैंचिलीन तलवार ॥ पाँव अगाड़ी का डाख्यो ना ठाकुर उरई के सरदार ५ इतना सुनिकै रंजित ठाकुर फौजन हुकुम दीन फरमाय ॥ जान न पावैं दिल्लीवाले इनके देवो मूड़ गिराय ६ हुकुमपायकै यह रंजित का क्षत्रिन खैंचिलीन तलवार ॥ पैदल के सँग पैदल अभिरे औ असवार साथ असवार ७ सूंदि लपेटा हाथी भिड़िगे मारन लागि शूर सरदार ॥ भाला बलछी तीर तमंचा कोताखानी चलै कटार ८ विकट लड़ाई भै फाटक पर नदिया बही रक्तकी धार ॥ ना मुहँ फेरैं दिल्लीवाले ना ई मुहवे के सरदार ६ रंजित अभई की मारुन मा सब दल होनलाग खरिहान ॥

२० आल्हाखण्ड । ४१४ रही न आशा क्यहु लड़िवेकी आरी भये समरमें ज्वान १० सवैया ॥ मारत औ ललकारत संगर लंगर भे क्यहु बुद्धि चलैना । शूर शिरोमणि रंजित ज्वान सो मान किये रण पैर टरैना ॥ होत जहाँ घमसान महाँ तहँ बीर कोऊ अभिमान करैना । माहिल पूत सुपुत जहाँ सो तहाँ ललिते कोउ देखि परैना ११ बड़ा लड़ैया माहिल वाला आला उरई का सरदार ॥ हनि हनि मारे राजपूतन का भारी हाँक देय ललकार १२ चौंड़ा बकशी पृथीराज का सोऊ खूब करै तलवार ॥ चौंड़ा सोहत है हाथी पर अभई घोड़े पर असवार १३ सेल चौंड़िया हनिकै मारा अभई लीन्ह्यो वार बचाय ॥ ऐँड़ लगावा फिरि घोड़े के हाथी उपर पहुँचा जाय १४ ढालकि औझड़ अभई मारा चौंड़ा गयो मूर्छा खाय ॥ भागि सिपाही दिल्लीवाले रंजित दीन्ह्यो फौज बढ़ाय १५ कीरतिसागर मदनताल पर पहुँचा फेरि चँदेला आय ॥ गा हरिकारा ह्वाँ फौजन ते राजै खबरि सुनाई जाय १६ हाल पायकै पृथीराज ने सूरज पूत दीन पठवाय ॥ सूरज आयो जब सागरपै बोल्यो दोऊ भुजा उठाय १७ डोला दैकै चन्द्रावलि का रंजित कूच देउ करवाय ॥ नहीं तो बचिहौ ना संगर मा जो विधि आपु बचावैं आय १८ इतना सुनिकै रंजित बोले सूरज काह गये बौराय ॥ मर्द सराहौं त्यहि ठाकुर का डोला पास जाय नगण्वाय १६ जितनी बिल्ली दिल्लीवाली तिनको देवों समर सुवाय ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४४५ ३१ तौ तौ लौरिका परिमालिक का नहिंई मुच्छ डरों मुड़वाय २० इतना सुनिकै सूरज जरिगे अपने कहा सिपाहिन टेर ॥ जान न पावैं मोहबेवाले मारो एक एक को घेर २१ सुनिकै बातें ये सूरज की क्षत्रिन खैंचि लीन तलवार ॥ कीरतिसागर मदनताल पर लाग्यो होन भड़ाभड़मार २२ पैग पैग पर पैदल गिरिगे दुइ दुइ पैग गिरे असवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार २३ को गति वरणै तहँ अझई कै मारे ढूँढ़ि ढूँढ़ि सरदार ॥ रंजित लड़का परिमालिकका दूनों हाथ करै तलवार २४ सूरज ठाकुर दिल्लीवाला आला समरधनी चौहान ॥ गनि गनि मारै रजपूतन का कीरतिसागर के मैदान २५ रंजित सूरज द्वउ ठकुरन का मुर्चा परा बरोबरि आय ॥ दोऊ सोहैं भल घोड़न पै दोऊ रूपशील अधिकाय २६ सूरज मारै जब रंजित का दाहिन बाँउ खेलि तब जाय ॥ रंजित मारै जब सूरज का सोऊ लेवै वार बचाय २७ उसरिन उसरिन दोऊ खेलैं पानी भरै यथा पनिहार ॥ कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ लड़ैं तहाँ सरदार २८ सवैया ॥ सिंह समान सो रंजित वीर औ सूरजहू बल घाटि कछूना । मार अपार भई ललिते पै उदारन के मन शङ्क कछूना ॥ शक्ति औ शूल चलै तलवार सो मार कही कहिजात कछूना । रक्त कि धार अपार बही पर हार औ जीत लखात कछूना २९ सब्जा घोड़े पर रंजितहैं सूरज सुरखा पर असवार ॥

२२ आल्हाखण्ड । ४४६ दोऊ मारैं तलवारिन सों दोऊ लेयँ ढाल पर वार ३० कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ रण परा बरोबरि आय ॥ वार चलाई रंजित ठाकुर सूरज लैगा चोट बचाय ३१ सूरज मारा तलवारी का रंजित लीन ढाल पर-वार ॥ रंजित मारा तलवारी का चेहरा काटि निकरिगै पार ३२ सूरज जूझे जब मुर्चा में पहुँचा टंक तुर्तही आय ॥ टंक सामने अभई आये खेलन लागि जूझके दायँ ३३ यहु रणनाहर माहिलवाला गरुई हाँक देय ललकार ॥ टंक शंक तजि त्यहि औसरमा दूनों हाथ करै तलवार ३४ साँँग चलाई नृपति टंक ने अभई लीन्ही वार बचाय ॥ भाला मारा जब अभई ने तोंदी परा घाव सो जाय ३५ टंक औ सूरज दोऊ मरिगे हाहाकार फौज मा छाय ॥ गा हरिकारा फिरि फौजन ते राजै खबरि जनाई जाय ३६ हाल पायकै पृथीराज ने ताहर बेटा लीन बुलाय ॥ मर्दनि सर्दनि को बुलवावा तिनते हालकहा समुझाय ३७ टंक और सूरज दोऊ जूझे कीरतिसागर के मैदान ॥ लाश लयआवो दुउ वीरन की भावी जानि सदा बलवान ३८ हुकुम पायकै महाराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ तीन लाखलों लश्कर लैके तुरतै कूच दीन करवाय ३६ कीरतिसागर मदनपालपर ताहर अटा तुरतही धाय ॥ लाश देखिकै दुउ वीरन कै सो पलकी म दीन रखवाय ४० निकट जायकै दल रंजितके गरुई हाँक कहा गुहराय । कौन बहादुर है मोहवे का सूरज टंकै दीन गिराय ४१ डोला दैके चन्द्रावलि का अबहीं कूच देउ करवाय ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४४७ २३ 'नहीं सुहागिल कोउ वचिहै ना मोहवा रंडन सों भरिजाय ४२ इतना सुनिकै अभई बोले रण माँ दोऊ भुजा उठाय ॥ हम नहिं देखें गति काहूकै डोला पासजाय नगच्याय ४३ पर्व आपनी पूरी करिकै अबहीं कूच देव करवाय ॥ रारि मचाये कछु पैहौ ना साँची बात दीन बतलाय ४४ अबै मोहोवा अस सूना ना जैसा समझि लीन सरदार ॥ मूड़ न रहैं जब देही मा तवहूं रुण्ड करैं तलवार ४५ इतना सुनिकै ताहर ठाकुर लाशौ फौज दीन पठवाय ॥ हुकुम लगावा रजपूतन का इनके देवो मूड़ गिराय ४६ हुकुम पाय कै यह ताहर का लागे लड़न शूर सरदार ॥ पैदल पैदल कै बरणी मै औ असवार साथ असवार ४७ भाला वलंछी छूटन लागे पागे मोद शूर त्यहि बार ॥ अपन परावा कछु सूझै ना आमाझोर चलै तलवार ४८ कटि कटि कल्ला गिरैं खेत माँ उठि उठि रुण्ड मचावैं मार ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै नदिया बही रक्तकी धार ४९ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ यहु रणनाहर मल्हनावाला आल्हा मोहबे का सरदार ५० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे सिंह बिडारै गाय ॥ तैसे मारै रजपूतन का छप्पन दीन्हे मूड़ गिराय ५१ बड़ा प्रतापी रण नाहर यहु यहिके बाँट परी तलवार ॥ यहिके मारे हाथी गिरिगे मरिगे सूरजसे सरदार ५२ रंजित नामी यहु ठाकुर जो रणमाँ भली मचाई रार ॥ पटा बनेठी बाना फेंकें टेकें दऊ हाथ तलवार ५३ लोह कि टोपी शिर में धारे सब्जा घोड़ेपर असवार ॥

२४ आल्हखण्ड । १४८ झीलम बखतर दोऊ पहिरे रंजित मोहवे का सरदार ५४ ताहर बेटा पृथीराज का सोऊ आयगयो त्यहिबार ॥ गरुई हाँकन ते ललकारा ठाकुर मोहवे के सरदार ५५ कीन ढिठाई तुम अब लग है अब हम साँच देत बतलाय ॥ डोला दैकै चन्द्रावलि का अबहीं कूच देउ करवाय ५६ नहीं तो आशा तजु जीवनकी यमपुर देत आज दिखलाय ॥ दीखि लड़ाई नहिं ताहर की नाहर खबरदार है जाय ५७ इतना कहिकै ताहर ठाकुर रंजित पास पहुँचा जाय ॥ रंजित मारी तलवारी को ताहर लैगा चोट बचाय ५८ ताहर मारा तलवारी का रंजित लीन ढाल पर वार ॥ खैंचि सिरोही रंजित मारी ताहर रोंकिलीन त्यहिबार ५६ जैसे रसरी गगरी लैके पानी खैंचि रही 'पनिहार ॥ तैसे रंजित ताहर दोऊ रणमाँ भली मचाई रार ६० सवैया ॥ मार अपार भई त्यहि बार सो यार सँभार रह्यो कछु नाँहीं। जूझिगये बहु पैदल स्वार तजे हथियार कबों रण नाहीं ॥ जातभये सुरलोक तबै औ जबै तजि प्राण दिये रणमाहीं। कीरति लोक रहै ललिते परलोक बनै क्षण एकहि माहीं ६१ दोऊ प्यारे रघुनन्दन के बन्दन करैं हृदय कत्तार ॥ दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढालपर वार ६२ रंजित चूके तलवारी ते कटिकै मूड़ गिरा त्यहिबार ॥ पूत सपूत माहिलवाला आला उरई का सरदार ६३ सम्मुख ताहर के आवा सो सुर्खा घोड़ेपर असवार ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४४६ २५ ओ ललकारा फिरि ताहर को सँभरो दिल्ली के सरदार ६४ इतना सुनिकै ताहर बोले अभई बार बार धिकार॥ लिल्लीघोड़ी के चढ़वैया माहिल बाप तुम्हारे यार ६५ तिनके लरिका तुम तलवरिहा कबते भयो कहौ सरदार ॥ इतना सुनिकै अभई ठाकुर अपनी खैंचि लीन तलवार ६६ ताहर अभई दोउ बीरन का परिगा समर बरोबरि आय ॥ रञ्जित जूझे हैं संगर में धावन खबरि सुनाई जाय ६७ खबरि पायकै मल्हना रानी तुरतै गिरी तहाँ कुम्हिलाय ॥ बारह रानी परिमालिक की गिरि गिरि परैं पछाराखाय ६८ रञ्जित रञ्जित कै गुहरावैं छाती धड़कि धड़कि रहिजाय ॥ मारे डरके पिंडुरी काँपैं थर थर देह रही थर्राय ६६ कोगति बरौ चन्द्रावलि कै भलिकैविपत्ति कही ना जाय ॥ सावधान भै मल्हनारानी तुरतै दीन्ह्यो दूत पठाय ७० बोलन लागी चन्द्रावलि ते मनमा बार बार पछिताय ॥ खप्पर भरिगा धिक् बेटी त्वहिं सागर पूत गँवावा आय ७१ इतना कहिकै मल्हना रानी तुरतै गिरी पछाराखाय ॥ गा हरिकारा हाँ मोहबे मा ब्रह्म खबरि जनाई जाय ७२ रञ्जित जूझे हैं सागर पर तिनकी लाश लेहु उठवाय ॥ इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ७३ सजि हरनागर तहँ ठाढ़ो थो तापर कूदि भये असवार ॥ पाँचलाख लौं फौजैं लैंकै सागर चलन हेतु तय्यार ७४ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ७५ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथमें लई ढाल तलवार ॥ १९

३६ आल्हखण्ड । ४५० आगे हलका भा हाथिन का पाछे चले घोड़ असवार ७६ अभई ठाकुर ह्वाँ ताहर का होवै खूब भड़ाभड़ मार ॥ दूनों मारैं तलवारी सों दूनों लेयँ ढालपर वार ७७ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ७८ को गति बरणै त्यहि समया कै आमाझोर चलै तलवार ॥ बार चूकिगा माहिलवाला झूझा उरई का सरदार ७९ रञ्जित अभई दुउ ठकुरन के उठि उठि रुण्ड करें तलवार ॥ सुरपुर पहुँचे दोऊ ठाकुर ब्रह्मा आयगयो त्यहिबार ८० लाश पाय कै दुउ बीरन कै मोहबे तुरत दीन पठवाय ॥ सुमिरिगजानन शिवशङ्करको मारन लाग फौज मा जाय ८१ ब्रह्मा मारै तलवारी सों घोड़ा टापन देय गिराय ॥ ब्रह्मा ठाकुर के मुर्च्चामा सईनिगयो तड़ाका आय ८२ हँसिकै बोला सो ब्रह्माते ठाकुर साँच देयँ बतलाय ॥ डोला दैकै चन्द्रावलि का पवनी करो आपनी जाय ८३ सुनिकै बातें ये सईनि की बोला मोहबे का सरदार ॥ नाम न लीन्हे अब डोलाका नहिं मुखघाँसिदेउँ तलवार ८४ सुनिकै बातें ये ब्रह्माकी सईनि मारा गुर्ज उठाय ॥ वार रोकि कै ब्रह्माठाकुर तुरतै दीन्ह्यो मूड़ गिराय ८५ मईनि आवा तब सम्मुखमा सोऊ वार चलावा आय ॥ खाली वार परी मईनि कै ब्रह्मा दीन्ह्यो मूड़ गिराय ८६ मईनि सईनि दोऊ झूझे माहिल अटे तड़ाका धाय् ॥ हाल बतावा पृथीराज का माहिल बारबार समुझाय ८७ इकले ब्रह्मा हैं मोहवेमा तिनका आप लेउ बँधवाय ॥

[Header] कीरतिसागरकामैदान । ४५ । २७

मर्दनि सर्दनि दोऊ जूझे अब तुम चढ़ो पिथोराराय ८८ सुनिकै बातें ये माहिल की हाथी तुरत लीन सजवाय ॥ सुमिरि भवानीसुत गणेश को पहुँचा समरभूमिमा आय ८६ चौंड़ा बकशी का बुलवावा औ यह हुकुम दीन फरमाय ॥ जितने डोलाहैं सागर में सबका अबै लेउ लुटवाय ६० पाछे, मल्हना चन्द्रावलि का दिल्ली शहर देउ पठवाय ॥ हुकुम पायकै पृथीराज का तहँपर अटा चौंड़िया धाय ६१ लाखनि बोले हाँ ऊदन ते नाहर सुनो बनाफरराय ॥ कीरतिसागर मदनताल पर चलिये बेगि लहुरवाभाय ६२ सुनिकै बातें लखराना की डङ्का तुरत दीन बजवाय ॥ सजे सिपाही कनउज वाले मनमा फूलमतीको ध्याय ६३ सुमिरि भवानी महरानी को दानी तीनिलोक की माय ॥ फूलमती पद बन्दन कैकै हाथी चढ़ा कनौजीराय ६४ चढ़ा बेंदुला का चढ़वैया मैया शारद चरण मनाय ॥ ध्याय भवानीसुत गणेश को देवा चढ़ा मनोहर जाय ६५ मीराताल्हन बनरस वाले सोऊ बेगि भये असवार ॥ योगिहा बाना मर्दाना सब ठाकुर भये समर तय्यार ६६ धुरपद संगीत तिल्लाना गावन लागे मेघमलार ॥ घोर घटा हैं कहुँ सावन के आवन प्रीतम केरि बहार ६७ सोचैं विरहिनी घर आँगन में जब कहुँ परै पर्ब त्यवहार ॥ प्रीतम होते जो सावन में तौ दुख दावन जात हमार ६८ को गति वर्णै त्यहि समया कै ऊदन गावैं मेघमलार ॥ पावन वर्षा है सावन कै जङ्गल देखि परै हरियार ६६ फसल आँबकी नर बागन में जंगल देखि परै गुलजार ॥

२८ आल्हखण्ड । १५३ काली जामुन काले मेघा नीचे ऊपर करें बहार १०० योगी पहुँचे मदनताल पर यारो सुनो कथा यहिवार ॥ चौंड़ा ठाढ़ो तट मल्हना के बकशी जौनुपिथौराक्यार १०१ कहन सँदेशा सो जब लाग्यो आयो देशराज के लाल ॥ धरिकै डाट्यो तहँ चौंड़ाका झगरा काह करें नरपाल १०२ कीनि प्रतिज्ञा हम रानी ते तुम्हरी पर्व व्याव करवाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै लूटैं मदनताल पर आय १०३ इतना सुनिकै ताहर जरिगे अपनी खैंचिलीन तलवार ॥ तब लखराना कनउज वाला सम्मुखभयो तुरत सरदार १०४ ताहर लाखनि का मुर्चा भा चौंड़ा मैनपुरी चौहान ॥ कोगति वरणै बघऊदन कै लागो करन खूब घमसान १०५ हौदा हौदा बेंदुल नाचैं ऊदन करें खूब तलवार ॥ बावनहौदा खाली हैगे जूझे हाथिन के असवार १०६ चोट लागिगै कछु धाँधू के सोऊ गिरे मूर्च्छाखाय ॥ सँभरिकै बैठे फिरि हौदा पर मनमाशोचिशोचिरहिजाय १०७ बड़े लड़ैया सब योगी हैं मुर्चा पूरे दीन जमाय ॥ अपने अपने सब मुर्चन मा ठकुरन दीन्ही राखिबढ़ाय १०८ ललातमोली धनुवाँ तेली सय्यद बनरस का सरदार ॥ लाखनि ऊदन देवाठाकुर रणमा खूब करें तलवार १०६ कोगति वरणै तहँ ताहर कै नाहर दिल्ली का सरदार ॥ चौंड़ा धाँधू कछु कमती ना येऊ करें भड़ाभड़ मार ११० चलै सिरोही भल सागर में ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ खट खट खट खट तेगा बोलै बोलै छपकछपक तलवार १११ झलझल् झलझल् छूरीचमकै चमकै रणमा खूब कटार ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४५३ २६ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा की ललकार ११२ सन् सन् सन् सन् गोली छूटैं तीरन मन्न मन्न गा छाय ॥ फर फर फर फर घोड़ा रपटैं लपटैं देह देह में धाय ११३ को गति बरसै रजपूतन कै उठि उठि रुण्ड करैं तलवार ॥ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ११४ चहला द्वैगा चार कोसलों नदिया बही रक्तकी धार ॥ लड़े पिथौरा तहँ सँभराभर राजा दिल्ली का सरदार ११५ शब्द पायकै तीर चलावै कलयुग यही एकही ज्वान ॥ अबयहि समय यहि औसरमा ताहर लाखनि का मैदान ११६ देवा धाँधूकै मुर्चा मा जूझे बहुत सिपाही ज्वान ॥ पिरथी बोले फिरि चौंड़ाते हमरे बचन करो परमान ११७ रानी मल्हना चन्द्रावलि का डोला तुरत लेउ उठवाय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी डोलन पास पहुँचा जाय ११८ खबरि सुनाई सब मल्हना का जो जो कहा पिथौराशय ॥ सुनि संदेशा पृथीराज का मल्हना बोली बचन सुनाय ११९ जबै बनाफर उदयसिंह थे तब नहिं चढ़े पिथौराराय ॥ बाँधिकै मुशकै सब लड़िकन की मड़ये पाँय लिह्यानि पुजवाय १२० हथी पछारथनि जब द्वारेपर तब कहँ गये पिथौराराय ॥ ब्याहे ब्रह्मा गे दिल्ली मा समरथ हते बनाफरराय १२१ ब्रह्मा रञ्जित द्वउ लरिकन ते कीन्हेनि रारि आय महराज ॥ रारि मचैहें जो नारिन ते तौ सब द्वैहैं काज अकाज १२२ इतना सुनिकै चन्द्रावलिकैं पलकी तुरत लीन उठवाय ॥ चलिभा चौंड़ा लै पलकी को पहुँचा पद्म पेड़ तर जाय १२३ रोवै मल्हना त्यहि समय मा गिरि गिरि परै पछाराखाय ॥

३० आल्हखण्ड । ४५४ ऊदन ऊदन कै गुहरावै कहँ तुम गये फंनाफरराय १२४ लाउ शारदा यहि समया मा आल्हा केर लहुरवा भाय ॥ बिना इकेले बघऊदन के डोला कौन छुड़ाई जाय १२५ सदा भवानी ज्यहि दाहिनहैं ज्यहिघर सिद्धिकरैं गनेश ॥ पारस पत्थर ज्यहिके घर मा पूरित विभो सदा धनेश १२६ भई सहायी शारद मायी ऊदन आयगये त्यहिकाल ॥ हाथ जोरिकै योगी बोले लाला देशराजके लाल १२७ भिक्षा पावैं जो मैया हम तौ अब हरद्वार को जायँ ॥ इतना सुनिकै मल्हना रोई बोली आरत वैन सुनाय १२८ रही न ईजति अब मोहवे की पलकी लीन चौंड़िया आय ॥ जायकै पहुँचा पाँच विरवातर हा दैयागति कही न जाय १२६ विना बेंदुला के चढ़वैया नैया कौन लगैहै पार ॥ चीरिकै धरती ऊदन आवो ईजति राखिलेउ यहिवार १३० इतना सुनिकै ऊदन योगी घोड़ा तुरत दीन रपटाय ॥ जायकै पहुँचा पाँच विरवातर यहु रणबाघ लहुरवाभाय १३१ चौंड़ा दीख्यो जब ऊदन का सम्मुख हाथी दीन बढ़ाय ॥ औ ललकारा फिरि योगी का काहे प्राण गवाँवो आय १३२ इतना सुनिकै ऊदन योगी गरुई हाँक दीन ललकार ॥ डोला धरिदे चन्द्रावलि का चौड़ामानुकही यहि बार १३३ धोखे योगी के भूले ना अबहीं योग देउँ दिखलाय ॥ ऐंड़ लगाई फिरि बेंदुल के हाथी उपर पहुँचा जाय १३४ ढाल कि औझड़ ऊदन मारी चौंड़ा गयो मूर्छाखाय ॥ लैके डोला चन्द्रावलि का मल्हनापास दीनरखवाय १३५ देवा ठाकुर ते फिरि बोले अब तुम रहो यहाँपर भाय ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४५५ ३१ अब हम जावत त्यहि दलमाहैं जयहिमालड़े चँदेलाराय १३६ जितने योगी हैं सागर में सबियाँ बेगि होयँ तय्यार ॥ लाखनि आये हैं मुर्चा ते तिनकेसाथ चलैं सरदार १३७ इतना सुनिकै सबियाँ योगी तुरतै होन लागि तय्यार ॥ हिरासिंह.बिरासिंह बिरियावाले चन्दन दतिया के सरदार १३८ चिंता राजा रुसनीवाला औ पतउँज के मदनगुपाल ॥ पूरनराजा पूरा वाला जगमनिजिन्सीकानरपाल १३६ बारह कुँवर बनौधा वाले चारो गाँजर के सरदार ॥ चिन्ता दूसर गोरखपुर के रूपनि मधुकरसिंह उदार १४० ये सब योगी सजि सागर में रणका चलन हेतु तय्यार ॥ मीराताल्हन बनरस वाले सिरगा घोड़ेपर असवार १४१ सुमिरि भवानी फूलमती को हाथी चढ़ा कनौजीराय ॥ सुमिरि शारदा मैहरवाली आगे चला बनाफरराय १४२ उतसों सेना पृथीराज की सोऊ गई बरोबरि आय ॥ चली सिरोही फिरि सागरपर अद्भुतसमरकहा ना जाय १४३ ना मुँह फेरैं कनउज वाले ना ई दिल्ली के चौहान ॥ कीरतिसागर मदनताल पर क्षत्रिन कीन खूब मैदान १४४ कटि कटि कल्ला गिरैं बछेड़ा चेहरा गिरैं सिपाहिन केर ॥ बिना सूँढ़ि के हाथी घूमैं मारैं एक एकको हेर १४५ आदिभयङ्कर का चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥ भूरी हथिनी पर लखराना सम्मुखगयो तड़ाकाआय १४६ ब्रह्मा ताहर का मुर्चा है दोऊ खूब करैं तलवार ॥ चौंड़ा ऊदन का रण सोहै धाँधू बनरस का सरदार १४७ सवापहर लों चली सिरोही नदिया बही रक्त की धार ॥

३२ आल्हखण्ड । ४५६ ढालै कच्छा छूरी मच्छा वारन मानो नदी सिवार १४८ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे ठोकैं ताल भूत बैताल ॥ लूटि मचाई भल गृद्धन है फौजैं कुत्तनकी विकराल १४६ भल बनिआई तहँ चील्हन की कागन लागी कारि बजार ॥ लै लै सौदा चले श्रृगालौ आंतनमाल कण्ठमें धार १५० लाखनि पिरथी के मुर्चा मा लागी चलन खूब तलवार ॥ हौदन हौदन के ऊपर मा घूमै बेंदुल का असवार १५१ जूझक कंकण सवालाख का सो हाथे मा करै बहार ॥ त्यहिकादीख्यो जब पिरथीपति राजा दिल्ली के सरदार १५२ तब पहिंचान्यो बघऊदन का निश्चय ठीक लीन ठहराय ॥ लाखनिराना है सम्मुख मा ज्यहिमम हाथीदीनहटाय १५३ यहै शोचिकै पृथीराज ने दीन्ह्यो मारु बन्द करवाय ॥ बढ़िगे डोला महरानिन के सागर उपर पहुँचे जाय १५४ दक्षिण दिशि मा परा पिथौरा उत्तर उदयसिंह सरदार ॥ लाखनि बोले ह्याँ मलहना ते रानी करो अपन त्यवहार १५५ इतना सुनिकै तहँ चन्द्रावलि सीढ़िन उपर बैठिगै जाय ॥ पात मँगाये तहँ पुरइन के सुन्दरि दोनी लीनबनाय १५६ छोड़ि दोनइया दी सागर में माहिल दीख तमाशा आय ॥ लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया पिरथी पास पहुँचा जाय १५७ खबरि बताई सब सागर की माहिल बार बार समुझाय ॥ हाल पायकै पृथीराज ने चौंडा बकशी दीनपठाय १५८ छँड़ी दुनैया जब चन्द्रावलि चौंडा हाथी दीन बढ़ाय ॥ रोयकै बोली तब चन्द्रावलि पबनीकिहिसिखोंटियहुआय१५६ बिना बेंदुलाके चढ़वैया को अब दुनिया लेय बचाय ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४५७ ३३ जों कहुँ दुनिया चौंड़ा लैगा हमरी पर्व खोंटि है जाय १६० सुनिकै बातैं चन्द्रावलि की बोला तुरत कनौजीराय ॥ लेउ दोनइया उदयसिंह तुम मानो कही बनाफरराय १६१ इतना सुनिकै उदयसिंह ने अपनो दीन्ह्यो घोड़ बढ़ाय ॥ तबै चौंड़िया ने ललकारा योगी खबरदार है जाय १६२ पैहौ दोनी ना सागर में आपन प्राण गवाँये आय ॥ इतना कहिकै चौंड़ा बकशी भालामार्थो तुरतचलाय १६३ वार बचाई तहँ भाला की तुरतै दोनी लीन उठाय ॥ लैकै दोनी दी बहिनी को बहिनी वार वार बलिजाय १६४ सूजी खोंसैं अब क्यहि के हम नहिं घर आज लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै मल्हना बोली चन्द्रावलिकोबचनबुझाय१६५ खोंसो सूजी तुम योगिन के जिन अब पबनी दीन कराय ॥ इतना सुनिकै चन्द्रावलि फिरि पहुँचीउदयसिंहढिगजाय १६६ कीन इशारा तब लाखनि का यहु रणबाघू बनाफरराय ॥ लाखनि बोले तब ऊदन ते हमरो मूड़ कटायो आय १६७ माल खजाना कछु लाये ना देवैं कौन नेगु ह्याँ आय ॥ तहिले पहुँची चन्द्रावलि तहँ सूजी धरी कानपर जाय १६८ बाइस हाथी तीनि पालकी दीन्ह्यो नेगु कनौजीराय ॥ सूजी खोंसी जब ऊदन के जूझकोकंकणदीनगहाय१६९ देखिकै कंकण उदयसिंह का निश्चय मनै लीन ठहराय ॥ साँचो योगी यहु ऊदन हैं मातैकहावचनसमुझाय १७० सुनिकै बातैं चन्द्रावलि की ऊदन नाम दीन बतलाय ॥ बड़ी खुशहाली भै सागर में सबकोउमिलींतहाँपरआय१७१

३४ आल्हखण्ड । ४५८ सवैया ॥ मीन मिलै जलको बिछुरे जिमि पङ्कज भानु यथा सुखदाई । त्योंहि मिली परिमाल कि नारि सो डारितहाँ विपदासमुदाई ॥ नैनन मोचत बारि निहारि सो नारिनकी तहँ लागि अथाई । कौन बखान करै ललिते सुख सम्पति आय तहाँ सब छाई १७२ मिलाभेंट करि सब ऊदन ते सागर सूजी रहीं सिराय ॥ बीर भुगंतै औ धाँधू को पठयो फेरि पिथौराराय १७३ लै दल बादल दोऊ आये दोनी लेन हेतु ततकाल ॥ लाखनि बोले तब ऊदन ते सुनियेदेशराजके लाल १७४ लैगे दोनी जो दिल्ली के हमरो मान भंग ह्वै जाय ॥ बट्टा लागी रजपूती माँ औ सब क्षत्री धर्मनशाय १७५ बातैं सुनिकै लखराना की ऊदन अटे तड़ाका धाय ॥ धाँधू बोले तब ऊदन ते योगीसाँच देयँ बतलाय १७६ निकट दुनैया के जायो ना नहिं शिर देवैं अबै गिराय ॥ बात न मानी कछु धाँधू की ऊदन दोनी लीनउठाय १७७ देखि तमाशा यहु ऊदन का धाँधू खैंचि लीन तलवार ॥ कीरतिसागर की सिढ़ियन मा लागीहोन भड़ाभड़ मार १७८ झुके सिपाही दिल्लीवाले दोऊ हाथ करें तलवार ॥ को गतिवरणै तहँ ऊदन कै ठाकुर बैंदुलका असवार १७९ फिरि फिरि मारै औ ललकारै यहु रणबाघु - बनाफरराय ॥ हटिगा मुर्चा तहँ धाँधूका कोउ रजपूत न रोकै पायँ १८० बीर भुगंता कोपित ह्वैकै अपनो हाथी दीन बढ़ाय ॥ मीरा सय्यद बनरस वाले सम्मुख गये तड़ाकाधाय १८१

कीरतिसागरकामैदान । ४५६ ३५ ऐंड़ लगावा जब घोड़े के हौदा उपर पहूँचाजाय ॥ गुर्ज चलावा बीरभुगन्ता सय्यद लैगे चोट बचाय १८२ ढाल कि औझड़ सय्यद मारी नीचे गिरा महाउत आय ॥ तहिले धाँधू तहँ आवत भा औ सय्यदकोदीनहटाय १८३ मारन लाग्यो रजपूतनका धाँधूझाय पिथौरा क्यार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार १८४ ना मुँहँ फेरै कनउजवाले ना ई दिल्ली के सरदार ॥ मूडन केरे मुड़चौराभे औ रुण्डनके लगेपहार १८५ शूर सिपाही दुहुँ तरफाके दूनों हाथकरैं तलवार ॥ कायर भागे समर भूमिते अपने डारि डारि हथियार १८६ तहिले माहिल गे तम्बूमें औ पिरथी ते कहाहवाल ॥ जीति न होई महराजाअब आयो देशराज को लाल १८७ ऊदन जावैं जब मोहबे ते तब फिरि चढ़यो पिथौराराय ॥ तुम्हें मुनासिब अब याही है देवो मारु बन्द करवाय १८८ सुनिकै बातें तहँ माहिल की तैसो कियो पिथौराराय ॥ मर्दनि सर्दनि सूरज टंको जूझे समरभूमि में आय १८६ इकसै हाथी गिरे खेतमें घोड़ा जूझे पाँच हजार ॥ लाखयुग्मकी तहँ संख्यामा जूझे दिल्लीके सरदार १६० रंजित अभई दूनों जूझे घोड़ा जूझे चार हजार ॥ डेढ़ लाख दल पैदल जूझे संख्या मोहबेकी त्यहिबार १६१ छप्पन हाथी मोहबे वाले मारा रहै पिथौराराय ॥ मेख उखरिगै फिरि सागर ते पिरथी कूच दीनकरवाय १६२ तजिकै शंका अहतंका के डंका तुरत दीन बजवाय ॥ कैयो दिनका धावा करिकै दिल्ली गयो पिथौराराय १६३

३६ आल्हाखण्ड । ४६० ह्वाँ सुधिपाई परिमालिक ने आये देशराज के लाल ॥ वन्दन कैकै यदुनन्दन को पलकी चढ़े रजापरिमाल १६४ कीरतिसागर मदनतालपर आये तुरत चँदेलेराय ॥ हाथ पकरिकै तहँ ऊदन का औछातीमा लीनलगाय १६५ पगिया धरदइ फिरि पैरन मा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ हाथ जोरिकै उदयसिंह तहँ आपनिकथा गयेसबगाय १६६ सुनिकै बातें उदयसिंह की बोले फेरि चँदेलेराय ॥ पारस पत्थर तुम लैलेवो भोगो राज्य बनाफरराय १६७ तुमका सौंपत हम ब्रह्माका ऊदन मानो कही हमार ॥ तुम जो जैहौ अब कनउज को तौ को धर्म निवाहन हार १६८ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची सुनो रजापरिमाल ॥ तीन तलाकें हमका दीन्ही सो अब रहीं करेजेशाख १६६ कहा मानिकै तुम माहिल का नाकछुकीन्ह्यो तनक विचार ॥ मोहिं निकारयो तुम भादों मा राजा मोहबे के सरदार २०० इतना सुनिकै मल्हना बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ जो तुम जैहौ अब कनउज का पिरथी मोहबालेय लुटाय २०१ दूध आपनो हम प्यावा है स्यावा तुम्हें बनाफरराय ॥ बैस बुढ़ापा मा दुखपावा रंजित मरे समरमा आय २०२ अबनहिं जावो तुम कनउजको मानों कही लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिर नाय २०३ एक महीना दिन बारा भे कनउज तजे मोहिं अब माय ॥ जो नहिं जावैं अब कनउजका भाई आल्हा उठै रिसाय २०४ कीन बहाना हम गाँजर का आयन नगर मोहोबा धाय ॥ देश निकासी हमरी द्वैहै जो कहूँ सुनी बनाफरराय २०५

कीरतिसागरकामैदान । ४६ । ३७ भई सहायी शारद मायी स्वप्ने हाल दीन बतलाय ॥ दया कनौजी लखराना की देखा नगर मोहोबा आय २०६ चढ़ी पिथौरा जो मोहबे का दिल्ली शहर लेब लुटवाय ॥ यहिमा संशय कछु नहीं है माता साँचदीन बतलाय २०७ इतना सुनिकै मल्हना बोली लाखनिराना बचन सुनाय ॥ धन्य कोखिहै वह तिलका कै ज्यहिमारहे कनौजीराय २०८ बिछुरे ऊदन इन मिलवाये हमरी पर्ब दीन करवाय ॥ मोरि गोसैयाँ लखराना हैं जो गाढ़ेमा भये सहाय २०६ सुनिकै बातें ये मल्हना की बोले फेरि कनौजीराय ॥ पुण्य तुम्हारी ते माई सब कीन्हेकाज सिद्धियदुराय २१० सुमिरन करिये जगदम्बा का अम्बा बैठि महल मा जाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै मोहबाशहर लेयँलुटवाय २११ मिला भेंट करि सब काहू सों दोऊ चलत भये सरदार ॥ छाँड़िकै बाना सब योगिनका लश्करकूचभयोत्यहिबार २१२ पार उतरिकै श्री यमुना के कुड़हरि डेरा दीन गड़ाय ॥ सातरोज को धावा करिकै कनउजगये कनौजीराय २१३ मल्हनापहुँची फिरि महलनमा राजा गये फेरि दरबार ॥ गड़े हिंडोला फिरि मोहबे मा घर घर होयँ मंगलाचार २१४ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ परे आलसी खटिया तकि तकि घौं घौं कण्ठ रहा घरांय २१५ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूर भई यह गाथ ॥ देवी देवता ये साँचे हैं इनधच पूर कीन रघुनाथ २१६ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना कैसेकहतललितयहगाय २१७