आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४५७ ३३ जों कहुँ दुनिया चौंड़ा लैगा हमरी पर्व खोंटि है जाय १६० सुनिकै बातैं चन्द्रावलि की बोला तुरत कनौजीराय ॥ लेउ दोनइया उदयसिंह तुम मानो कही बनाफरराय १६१ इतना सुनिकै उदयसिंह ने अपनो दीन्ह्यो घोड़ बढ़ाय ॥ तबै चौंड़िया ने ललकारा योगी खबरदार है जाय १६२ पैहौ दोनी ना सागर में आपन प्राण गवाँये आय ॥ इतना कहिकै चौंड़ा बकशी भालामार्थो तुरतचलाय १६३ वार बचाई तहँ भाला की तुरतै दोनी लीन उठाय ॥ लैकै दोनी दी बहिनी को बहिनी वार वार बलिजाय १६४ सूजी खोंसैं अब क्यहि के हम नहिं घर आज लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै मल्हना बोली चन्द्रावलिकोबचनबुझाय१६५ खोंसो सूजी तुम योगिन के जिन अब पबनी दीन कराय ॥ इतना सुनिकै चन्द्रावलि फिरि पहुँचीउदयसिंहढिगजाय १६६ कीन इशारा तब लाखनि का यहु रणबाघू बनाफरराय ॥ लाखनि बोले तब ऊदन ते हमरो मूड़ कटायो आय १६७ माल खजाना कछु लाये ना देवैं कौन नेगु ह्याँ आय ॥ तहिले पहुँची चन्द्रावलि तहँ सूजी धरी कानपर जाय १६८ बाइस हाथी तीनि पालकी दीन्ह्यो नेगु कनौजीराय ॥ सूजी खोंसी जब ऊदन के जूझकोकंकणदीनगहाय१६९ देखिकै कंकण उदयसिंह का निश्चय मनै लीन ठहराय ॥ साँचो योगी यहु ऊदन हैं मातैकहावचनसमुझाय १७० सुनिकै बातैं चन्द्रावलि की ऊदन नाम दीन बतलाय ॥ बड़ी खुशहाली भै सागर में सबकोउमिलींतहाँपरआय१७१