आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ आल्हखण्ड । ४५६ ढालै कच्छा छूरी मच्छा वारन मानो नदी सिवार १४८ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे ठोकैं ताल भूत बैताल ॥ लूटि मचाई भल गृद्धन है फौजैं कुत्तनकी विकराल १४६ भल बनिआई तहँ चील्हन की कागन लागी कारि बजार ॥ लै लै सौदा चले श्रृगालौ आंतनमाल कण्ठमें धार १५० लाखनि पिरथी के मुर्चा मा लागी चलन खूब तलवार ॥ हौदन हौदन के ऊपर मा घूमै बेंदुल का असवार १५१ जूझक कंकण सवालाख का सो हाथे मा करै बहार ॥ त्यहिकादीख्यो जब पिरथीपति राजा दिल्ली के सरदार १५२ तब पहिंचान्यो बघऊदन का निश्चय ठीक लीन ठहराय ॥ लाखनिराना है सम्मुख मा ज्यहिमम हाथीदीनहटाय १५३ यहै शोचिकै पृथीराज ने दीन्ह्यो मारु बन्द करवाय ॥ बढ़िगे डोला महरानिन के सागर उपर पहुँचे जाय १५४ दक्षिण दिशि मा परा पिथौरा उत्तर उदयसिंह सरदार ॥ लाखनि बोले ह्याँ मलहना ते रानी करो अपन त्यवहार १५५ इतना सुनिकै तहँ चन्द्रावलि सीढ़िन उपर बैठिगै जाय ॥ पात मँगाये तहँ पुरइन के सुन्दरि दोनी लीनबनाय १५६ छोड़ि दोनइया दी सागर में माहिल दीख तमाशा आय ॥ लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया पिरथी पास पहुँचा जाय १५७ खबरि बताई सब सागर की माहिल बार बार समुझाय ॥ हाल पायकै पृथीराज ने चौंडा बकशी दीनपठाय १५८ छँड़ी दुनैया जब चन्द्रावलि चौंडा हाथी दीन बढ़ाय ॥ रोयकै बोली तब चन्द्रावलि पबनीकिहिसिखोंटियहुआय१५६ बिना बेंदुलाके चढ़वैया को अब दुनिया लेय बचाय ॥