भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 456

कीरतिसागरकामैदान । ४५५ ३१ अब हम जावत त्यहि दलमाहैं जयहिमालड़े चँदेलाराय १३६ जितने योगी हैं सागर में सबियाँ बेगि होयँ तय्यार ॥ लाखनि आये हैं मुर्चा ते तिनकेसाथ चलैं सरदार १३७ इतना सुनिकै सबियाँ योगी तुरतै होन लागि तय्यार ॥ हिरासिंह.बिरासिंह बिरियावाले चन्दन दतिया के सरदार १३८ चिंता राजा रुसनीवाला औ पतउँज के मदनगुपाल ॥ पूरनराजा पूरा वाला जगमनिजिन्सीकानरपाल १३६ बारह कुँवर बनौधा वाले चारो गाँजर के सरदार ॥ चिन्ता दूसर गोरखपुर के रूपनि मधुकरसिंह उदार १४० ये सब योगी सजि सागर में रणका चलन हेतु तय्यार ॥ मीराताल्हन बनरस वाले सिरगा घोड़ेपर असवार १४१ सुमिरि भवानी फूलमती को हाथी चढ़ा कनौजीराय ॥ सुमिरि शारदा मैहरवाली आगे चला बनाफरराय १४२ उतसों सेना पृथीराज की सोऊ गई बरोबरि आय ॥ चली सिरोही फिरि सागरपर अद्भुतसमरकहा ना जाय १४३ ना मुँह फेरैं कनउज वाले ना ई दिल्ली के चौहान ॥ कीरतिसागर मदनताल पर क्षत्रिन कीन खूब मैदान १४४ कटि कटि कल्ला गिरैं बछेड़ा चेहरा गिरैं सिपाहिन केर ॥ बिना सूँढ़ि के हाथी घूमैं मारैं एक एकको हेर १४५ आदिभयङ्कर का चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥ भूरी हथिनी पर लखराना सम्मुखगयो तड़ाकाआय १४६ ब्रह्मा ताहर का मुर्चा है दोऊ खूब करैं तलवार ॥ चौंड़ा ऊदन का रण सोहै धाँधू बनरस का सरदार १४७ सवापहर लों चली सिरोही नदिया बही रक्त की धार ॥