भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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३० आल्हखण्ड । ४५४ ऊदन ऊदन कै गुहरावै कहँ तुम गये फंनाफरराय १२४ लाउ शारदा यहि समया मा आल्हा केर लहुरवा भाय ॥ बिना इकेले बघऊदन के डोला कौन छुड़ाई जाय १२५ सदा भवानी ज्यहि दाहिनहैं ज्यहिघर सिद्धिकरैं गनेश ॥ पारस पत्थर ज्यहिके घर मा पूरित विभो सदा धनेश १२६ भई सहायी शारद मायी ऊदन आयगये त्यहिकाल ॥ हाथ जोरिकै योगी बोले लाला देशराजके लाल १२७ भिक्षा पावैं जो मैया हम तौ अब हरद्वार को जायँ ॥ इतना सुनिकै मल्हना रोई बोली आरत वैन सुनाय १२८ रही न ईजति अब मोहवे की पलकी लीन चौंड़िया आय ॥ जायकै पहुँचा पाँच विरवातर हा दैयागति कही न जाय १२६ विना बेंदुला के चढ़वैया नैया कौन लगैहै पार ॥ चीरिकै धरती ऊदन आवो ईजति राखिलेउ यहिवार १३० इतना सुनिकै ऊदन योगी घोड़ा तुरत दीन रपटाय ॥ जायकै पहुँचा पाँच विरवातर यहु रणबाघ लहुरवाभाय १३१ चौंड़ा दीख्यो जब ऊदन का सम्मुख हाथी दीन बढ़ाय ॥ औ ललकारा फिरि योगी का काहे प्राण गवाँवो आय १३२ इतना सुनिकै ऊदन योगी गरुई हाँक दीन ललकार ॥ डोला धरिदे चन्द्रावलि का चौड़ामानुकही यहि बार १३३ धोखे योगी के भूले ना अबहीं योग देउँ दिखलाय ॥ ऐंड़ लगाई फिरि बेंदुल के हाथी उपर पहुँचा जाय १३४ ढाल कि औझड़ ऊदन मारी चौंड़ा गयो मूर्छाखाय ॥ लैके डोला चन्द्रावलि का मल्हनापास दीनरखवाय १३५ देवा ठाकुर ते फिरि बोले अब तुम रहो यहाँपर भाय ॥