आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४५३ २६ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा की ललकार ११२ सन् सन् सन् सन् गोली छूटैं तीरन मन्न मन्न गा छाय ॥ फर फर फर फर घोड़ा रपटैं लपटैं देह देह में धाय ११३ को गति बरसै रजपूतन कै उठि उठि रुण्ड करैं तलवार ॥ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ११४ चहला द्वैगा चार कोसलों नदिया बही रक्तकी धार ॥ लड़े पिथौरा तहँ सँभराभर राजा दिल्ली का सरदार ११५ शब्द पायकै तीर चलावै कलयुग यही एकही ज्वान ॥ अबयहि समय यहि औसरमा ताहर लाखनि का मैदान ११६ देवा धाँधूकै मुर्चा मा जूझे बहुत सिपाही ज्वान ॥ पिरथी बोले फिरि चौंड़ाते हमरे बचन करो परमान ११७ रानी मल्हना चन्द्रावलि का डोला तुरत लेउ उठवाय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी डोलन पास पहुँचा जाय ११८ खबरि सुनाई सब मल्हना का जो जो कहा पिथौराशय ॥ सुनि संदेशा पृथीराज का मल्हना बोली बचन सुनाय ११९ जबै बनाफर उदयसिंह थे तब नहिं चढ़े पिथौराराय ॥ बाँधिकै मुशकै सब लड़िकन की मड़ये पाँय लिह्यानि पुजवाय १२० हथी पछारथनि जब द्वारेपर तब कहँ गये पिथौराराय ॥ ब्याहे ब्रह्मा गे दिल्ली मा समरथ हते बनाफरराय १२१ ब्रह्मा रञ्जित द्वउ लरिकन ते कीन्हेनि रारि आय महराज ॥ रारि मचैहें जो नारिन ते तौ सब द्वैहैं काज अकाज १२२ इतना सुनिकै चन्द्रावलिकैं पलकी तुरत लीन उठवाय ॥ चलिभा चौंड़ा लै पलकी को पहुँचा पद्म पेड़ तर जाय १२३ रोवै मल्हना त्यहि समय मा गिरि गिरि परै पछाराखाय ॥