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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

कीरतिसागरकामैदान । ४५३ २६ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा की ललकार ११२ सन् सन् सन् सन् गोली छूटैं तीरन मन्न मन्न गा छाय ॥ फर फर फर फर घोड़ा रपटैं लपटैं देह देह में धाय ११३ को गति बरसै रजपूतन कै उठि उठि रुण्ड करैं तलवार ॥ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ११४ चहला द्वैगा चार कोसलों नदिया बही रक्तकी धार ॥ लड़े पिथौरा तहँ सँभराभर राजा दिल्ली का सरदार ११५ शब्द पायकै तीर चलावै कलयुग यही एकही ज्वान ॥ अबयहि समय यहि औसरमा ताहर लाखनि का मैदान ११६ देवा धाँधूकै मुर्चा मा जूझे बहुत सिपाही ज्वान ॥ पिरथी बोले फिरि चौंड़ाते हमरे बचन करो परमान ११७ रानी मल्हना चन्द्रावलि का डोला तुरत लेउ उठवाय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी डोलन पास पहुँचा जाय ११८ खबरि सुनाई सब मल्हना का जो जो कहा पिथौराशय ॥ सुनि संदेशा पृथीराज का मल्हना बोली बचन सुनाय ११९ जबै बनाफर उदयसिंह थे तब नहिं चढ़े पिथौराराय ॥ बाँधिकै मुशकै सब लड़िकन की मड़ये पाँय लिह्यानि पुजवाय १२० हथी पछारथनि जब द्वारेपर तब कहँ गये पिथौराराय ॥ ब्याहे ब्रह्मा गे दिल्ली मा समरथ हते बनाफरराय १२१ ब्रह्मा रञ्जित द्वउ लरिकन ते कीन्हेनि रारि आय महराज ॥ रारि मचैहें जो नारिन ते तौ सब द्वैहैं काज अकाज १२२ इतना सुनिकै चन्द्रावलिकैं पलकी तुरत लीन उठवाय ॥ चलिभा चौंड़ा लै पलकी को पहुँचा पद्म पेड़ तर जाय १२३ रोवै मल्हना त्यहि समय मा गिरि गिरि परै पछाराखाय ॥

३० आल्हखण्ड । ४५४ ऊदन ऊदन कै गुहरावै कहँ तुम गये फंनाफरराय १२४ लाउ शारदा यहि समया मा आल्हा केर लहुरवा भाय ॥ बिना इकेले बघऊदन के डोला कौन छुड़ाई जाय १२५ सदा भवानी ज्यहि दाहिनहैं ज्यहिघर सिद्धिकरैं गनेश ॥ पारस पत्थर ज्यहिके घर मा पूरित विभो सदा धनेश १२६ भई सहायी शारद मायी ऊदन आयगये त्यहिकाल ॥ हाथ जोरिकै योगी बोले लाला देशराजके लाल १२७ भिक्षा पावैं जो मैया हम तौ अब हरद्वार को जायँ ॥ इतना सुनिकै मल्हना रोई बोली आरत वैन सुनाय १२८ रही न ईजति अब मोहवे की पलकी लीन चौंड़िया आय ॥ जायकै पहुँचा पाँच विरवातर हा दैयागति कही न जाय १२६ विना बेंदुला के चढ़वैया नैया कौन लगैहै पार ॥ चीरिकै धरती ऊदन आवो ईजति राखिलेउ यहिवार १३० इतना सुनिकै ऊदन योगी घोड़ा तुरत दीन रपटाय ॥ जायकै पहुँचा पाँच विरवातर यहु रणबाघ लहुरवाभाय १३१ चौंड़ा दीख्यो जब ऊदन का सम्मुख हाथी दीन बढ़ाय ॥ औ ललकारा फिरि योगी का काहे प्राण गवाँवो आय १३२ इतना सुनिकै ऊदन योगी गरुई हाँक दीन ललकार ॥ डोला धरिदे चन्द्रावलि का चौड़ामानुकही यहि बार १३३ धोखे योगी के भूले ना अबहीं योग देउँ दिखलाय ॥ ऐंड़ लगाई फिरि बेंदुल के हाथी उपर पहुँचा जाय १३४ ढाल कि औझड़ ऊदन मारी चौंड़ा गयो मूर्छाखाय ॥ लैके डोला चन्द्रावलि का मल्हनापास दीनरखवाय १३५ देवा ठाकुर ते फिरि बोले अब तुम रहो यहाँपर भाय ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४५५ ३१ अब हम जावत त्यहि दलमाहैं जयहिमालड़े चँदेलाराय १३६ जितने योगी हैं सागर में सबियाँ बेगि होयँ तय्यार ॥ लाखनि आये हैं मुर्चा ते तिनकेसाथ चलैं सरदार १३७ इतना सुनिकै सबियाँ योगी तुरतै होन लागि तय्यार ॥ हिरासिंह.बिरासिंह बिरियावाले चन्दन दतिया के सरदार १३८ चिंता राजा रुसनीवाला औ पतउँज के मदनगुपाल ॥ पूरनराजा पूरा वाला जगमनिजिन्सीकानरपाल १३६ बारह कुँवर बनौधा वाले चारो गाँजर के सरदार ॥ चिन्ता दूसर गोरखपुर के रूपनि मधुकरसिंह उदार १४० ये सब योगी सजि सागर में रणका चलन हेतु तय्यार ॥ मीराताल्हन बनरस वाले सिरगा घोड़ेपर असवार १४१ सुमिरि भवानी फूलमती को हाथी चढ़ा कनौजीराय ॥ सुमिरि शारदा मैहरवाली आगे चला बनाफरराय १४२ उतसों सेना पृथीराज की सोऊ गई बरोबरि आय ॥ चली सिरोही फिरि सागरपर अद्भुतसमरकहा ना जाय १४३ ना मुँह फेरैं कनउज वाले ना ई दिल्ली के चौहान ॥ कीरतिसागर मदनताल पर क्षत्रिन कीन खूब मैदान १४४ कटि कटि कल्ला गिरैं बछेड़ा चेहरा गिरैं सिपाहिन केर ॥ बिना सूँढ़ि के हाथी घूमैं मारैं एक एकको हेर १४५ आदिभयङ्कर का चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥ भूरी हथिनी पर लखराना सम्मुखगयो तड़ाकाआय १४६ ब्रह्मा ताहर का मुर्चा है दोऊ खूब करैं तलवार ॥ चौंड़ा ऊदन का रण सोहै धाँधू बनरस का सरदार १४७ सवापहर लों चली सिरोही नदिया बही रक्त की धार ॥

३२ आल्हखण्ड । ४५६ ढालै कच्छा छूरी मच्छा वारन मानो नदी सिवार १४८ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे ठोकैं ताल भूत बैताल ॥ लूटि मचाई भल गृद्धन है फौजैं कुत्तनकी विकराल १४६ भल बनिआई तहँ चील्हन की कागन लागी कारि बजार ॥ लै लै सौदा चले श्रृगालौ आंतनमाल कण्ठमें धार १५० लाखनि पिरथी के मुर्चा मा लागी चलन खूब तलवार ॥ हौदन हौदन के ऊपर मा घूमै बेंदुल का असवार १५१ जूझक कंकण सवालाख का सो हाथे मा करै बहार ॥ त्यहिकादीख्यो जब पिरथीपति राजा दिल्ली के सरदार १५२ तब पहिंचान्यो बघऊदन का निश्चय ठीक लीन ठहराय ॥ लाखनिराना है सम्मुख मा ज्यहिमम हाथीदीनहटाय १५३ यहै शोचिकै पृथीराज ने दीन्ह्यो मारु बन्द करवाय ॥ बढ़िगे डोला महरानिन के सागर उपर पहुँचे जाय १५४ दक्षिण दिशि मा परा पिथौरा उत्तर उदयसिंह सरदार ॥ लाखनि बोले ह्याँ मलहना ते रानी करो अपन त्यवहार १५५ इतना सुनिकै तहँ चन्द्रावलि सीढ़िन उपर बैठिगै जाय ॥ पात मँगाये तहँ पुरइन के सुन्दरि दोनी लीनबनाय १५६ छोड़ि दोनइया दी सागर में माहिल दीख तमाशा आय ॥ लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया पिरथी पास पहुँचा जाय १५७ खबरि बताई सब सागर की माहिल बार बार समुझाय ॥ हाल पायकै पृथीराज ने चौंडा बकशी दीनपठाय १५८ छँड़ी दुनैया जब चन्द्रावलि चौंडा हाथी दीन बढ़ाय ॥ रोयकै बोली तब चन्द्रावलि पबनीकिहिसिखोंटियहुआय१५६ बिना बेंदुलाके चढ़वैया को अब दुनिया लेय बचाय ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४५७ ३३ जों कहुँ दुनिया चौंड़ा लैगा हमरी पर्व खोंटि है जाय १६० सुनिकै बातैं चन्द्रावलि की बोला तुरत कनौजीराय ॥ लेउ दोनइया उदयसिंह तुम मानो कही बनाफरराय १६१ इतना सुनिकै उदयसिंह ने अपनो दीन्ह्यो घोड़ बढ़ाय ॥ तबै चौंड़िया ने ललकारा योगी खबरदार है जाय १६२ पैहौ दोनी ना सागर में आपन प्राण गवाँये आय ॥ इतना कहिकै चौंड़ा बकशी भालामार्थो तुरतचलाय १६३ वार बचाई तहँ भाला की तुरतै दोनी लीन उठाय ॥ लैकै दोनी दी बहिनी को बहिनी वार वार बलिजाय १६४ सूजी खोंसैं अब क्यहि के हम नहिं घर आज लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै मल्हना बोली चन्द्रावलिकोबचनबुझाय१६५ खोंसो सूजी तुम योगिन के जिन अब पबनी दीन कराय ॥ इतना सुनिकै चन्द्रावलि फिरि पहुँचीउदयसिंहढिगजाय १६६ कीन इशारा तब लाखनि का यहु रणबाघू बनाफरराय ॥ लाखनि बोले तब ऊदन ते हमरो मूड़ कटायो आय १६७ माल खजाना कछु लाये ना देवैं कौन नेगु ह्याँ आय ॥ तहिले पहुँची चन्द्रावलि तहँ सूजी धरी कानपर जाय १६८ बाइस हाथी तीनि पालकी दीन्ह्यो नेगु कनौजीराय ॥ सूजी खोंसी जब ऊदन के जूझकोकंकणदीनगहाय१६९ देखिकै कंकण उदयसिंह का निश्चय मनै लीन ठहराय ॥ साँचो योगी यहु ऊदन हैं मातैकहावचनसमुझाय १७० सुनिकै बातैं चन्द्रावलि की ऊदन नाम दीन बतलाय ॥ बड़ी खुशहाली भै सागर में सबकोउमिलींतहाँपरआय१७१

३४ आल्हखण्ड । ४५८ सवैया ॥ मीन मिलै जलको बिछुरे जिमि पङ्कज भानु यथा सुखदाई । त्योंहि मिली परिमाल कि नारि सो डारितहाँ विपदासमुदाई ॥ नैनन मोचत बारि निहारि सो नारिनकी तहँ लागि अथाई । कौन बखान करै ललिते सुख सम्पति आय तहाँ सब छाई १७२ मिलाभेंट करि सब ऊदन ते सागर सूजी रहीं सिराय ॥ बीर भुगंतै औ धाँधू को पठयो फेरि पिथौराराय १७३ लै दल बादल दोऊ आये दोनी लेन हेतु ततकाल ॥ लाखनि बोले तब ऊदन ते सुनियेदेशराजके लाल १७४ लैगे दोनी जो दिल्ली के हमरो मान भंग ह्वै जाय ॥ बट्टा लागी रजपूती माँ औ सब क्षत्री धर्मनशाय १७५ बातैं सुनिकै लखराना की ऊदन अटे तड़ाका धाय ॥ धाँधू बोले तब ऊदन ते योगीसाँच देयँ बतलाय १७६ निकट दुनैया के जायो ना नहिं शिर देवैं अबै गिराय ॥ बात न मानी कछु धाँधू की ऊदन दोनी लीनउठाय १७७ देखि तमाशा यहु ऊदन का धाँधू खैंचि लीन तलवार ॥ कीरतिसागर की सिढ़ियन मा लागीहोन भड़ाभड़ मार १७८ झुके सिपाही दिल्लीवाले दोऊ हाथ करें तलवार ॥ को गतिवरणै तहँ ऊदन कै ठाकुर बैंदुलका असवार १७९ फिरि फिरि मारै औ ललकारै यहु रणबाघु - बनाफरराय ॥ हटिगा मुर्चा तहँ धाँधूका कोउ रजपूत न रोकै पायँ १८० बीर भुगंता कोपित ह्वैकै अपनो हाथी दीन बढ़ाय ॥ मीरा सय्यद बनरस वाले सम्मुख गये तड़ाकाधाय १८१

कीरतिसागरकामैदान । ४५६ ३५ ऐंड़ लगावा जब घोड़े के हौदा उपर पहूँचाजाय ॥ गुर्ज चलावा बीरभुगन्ता सय्यद लैगे चोट बचाय १८२ ढाल कि औझड़ सय्यद मारी नीचे गिरा महाउत आय ॥ तहिले धाँधू तहँ आवत भा औ सय्यदकोदीनहटाय १८३ मारन लाग्यो रजपूतनका धाँधूझाय पिथौरा क्यार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार १८४ ना मुँहँ फेरै कनउजवाले ना ई दिल्ली के सरदार ॥ मूडन केरे मुड़चौराभे औ रुण्डनके लगेपहार १८५ शूर सिपाही दुहुँ तरफाके दूनों हाथकरैं तलवार ॥ कायर भागे समर भूमिते अपने डारि डारि हथियार १८६ तहिले माहिल गे तम्बूमें औ पिरथी ते कहाहवाल ॥ जीति न होई महराजाअब आयो देशराज को लाल १८७ ऊदन जावैं जब मोहबे ते तब फिरि चढ़यो पिथौराराय ॥ तुम्हें मुनासिब अब याही है देवो मारु बन्द करवाय १८८ सुनिकै बातें तहँ माहिल की तैसो कियो पिथौराराय ॥ मर्दनि सर्दनि सूरज टंको जूझे समरभूमि में आय १८६ इकसै हाथी गिरे खेतमें घोड़ा जूझे पाँच हजार ॥ लाखयुग्मकी तहँ संख्यामा जूझे दिल्लीके सरदार १६० रंजित अभई दूनों जूझे घोड़ा जूझे चार हजार ॥ डेढ़ लाख दल पैदल जूझे संख्या मोहबेकी त्यहिबार १६१ छप्पन हाथी मोहबे वाले मारा रहै पिथौराराय ॥ मेख उखरिगै फिरि सागर ते पिरथी कूच दीनकरवाय १६२ तजिकै शंका अहतंका के डंका तुरत दीन बजवाय ॥ कैयो दिनका धावा करिकै दिल्ली गयो पिथौराराय १६३

३६ आल्हाखण्ड । ४६० ह्वाँ सुधिपाई परिमालिक ने आये देशराज के लाल ॥ वन्दन कैकै यदुनन्दन को पलकी चढ़े रजापरिमाल १६४ कीरतिसागर मदनतालपर आये तुरत चँदेलेराय ॥ हाथ पकरिकै तहँ ऊदन का औछातीमा लीनलगाय १६५ पगिया धरदइ फिरि पैरन मा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ हाथ जोरिकै उदयसिंह तहँ आपनिकथा गयेसबगाय १६६ सुनिकै बातें उदयसिंह की बोले फेरि चँदेलेराय ॥ पारस पत्थर तुम लैलेवो भोगो राज्य बनाफरराय १६७ तुमका सौंपत हम ब्रह्माका ऊदन मानो कही हमार ॥ तुम जो जैहौ अब कनउज को तौ को धर्म निवाहन हार १६८ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची सुनो रजापरिमाल ॥ तीन तलाकें हमका दीन्ही सो अब रहीं करेजेशाख १६६ कहा मानिकै तुम माहिल का नाकछुकीन्ह्यो तनक विचार ॥ मोहिं निकारयो तुम भादों मा राजा मोहबे के सरदार २०० इतना सुनिकै मल्हना बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ जो तुम जैहौ अब कनउज का पिरथी मोहबालेय लुटाय २०१ दूध आपनो हम प्यावा है स्यावा तुम्हें बनाफरराय ॥ बैस बुढ़ापा मा दुखपावा रंजित मरे समरमा आय २०२ अबनहिं जावो तुम कनउजको मानों कही लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिर नाय २०३ एक महीना दिन बारा भे कनउज तजे मोहिं अब माय ॥ जो नहिं जावैं अब कनउजका भाई आल्हा उठै रिसाय २०४ कीन बहाना हम गाँजर का आयन नगर मोहोबा धाय ॥ देश निकासी हमरी द्वैहै जो कहूँ सुनी बनाफरराय २०५

कीरतिसागरकामैदान । ४६ । ३७ भई सहायी शारद मायी स्वप्ने हाल दीन बतलाय ॥ दया कनौजी लखराना की देखा नगर मोहोबा आय २०६ चढ़ी पिथौरा जो मोहबे का दिल्ली शहर लेब लुटवाय ॥ यहिमा संशय कछु नहीं है माता साँचदीन बतलाय २०७ इतना सुनिकै मल्हना बोली लाखनिराना बचन सुनाय ॥ धन्य कोखिहै वह तिलका कै ज्यहिमारहे कनौजीराय २०८ बिछुरे ऊदन इन मिलवाये हमरी पर्ब दीन करवाय ॥ मोरि गोसैयाँ लखराना हैं जो गाढ़ेमा भये सहाय २०६ सुनिकै बातें ये मल्हना की बोले फेरि कनौजीराय ॥ पुण्य तुम्हारी ते माई सब कीन्हेकाज सिद्धियदुराय २१० सुमिरन करिये जगदम्बा का अम्बा बैठि महल मा जाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै मोहबाशहर लेयँलुटवाय २११ मिला भेंट करि सब काहू सों दोऊ चलत भये सरदार ॥ छाँड़िकै बाना सब योगिनका लश्करकूचभयोत्यहिबार २१२ पार उतरिकै श्री यमुना के कुड़हरि डेरा दीन गड़ाय ॥ सातरोज को धावा करिकै कनउजगये कनौजीराय २१३ मल्हनापहुँची फिरि महलनमा राजा गये फेरि दरबार ॥ गड़े हिंडोला फिरि मोहबे मा घर घर होयँ मंगलाचार २१४ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ परे आलसी खटिया तकि तकि घौं घौं कण्ठ रहा घरांय २१५ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूर भई यह गाथ ॥ देवी देवता ये साँचे हैं इनधच पूर कीन रघुनाथ २१६ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना कैसेकहतललितयहगाय २१७

३८ आल्हखण्ड । ४६२

रहै समुन्दर में जौलों जल जौलों रहें चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तौलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २१८ करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकान्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरि भगवन्त २१६ पुत्र हमारे जो चारो हैं तिनपर कृपाकरो रघुराज ॥ रामदत्त(१)औकृष्णदत्त(२)औशम्भू(३)ब्रह्मदत्त(४)महराज २२० नन्दै चन्दे औ नन्दै वाणैंमें माधव मास विपति को काल ॥ ब्रह्मदत्त गे ब्रह्मलोक को भे अब इन्द्रदत्त युग साल २२१ सवैया ॥ संवत वनइस उनसठ आदि में माधव मास महादुखदाई । आय गयो विस्फोटक रोग अब शान्त भयो बहु देव मनाई ॥ फेरि अचानक भइ यह बात कि गर्दन फाटिगै फूट कि नाई । ब्रह्मदत्त विरंचीलोक बसे ललिते यहदुःख कहैं निज गाई २२२ भक्त तुम्हारे चारो होवैं यह बर मिलै मोहिं भगवान ॥ कीरतिसागर मदनताल का पूराचरितकीन हमगान २२३ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत कीरतिसागर कीर्त्तिवर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥ कीरतिसागरका मैदान सम्पूर्ण ॥ इति ॥

अथ आल्हखण्ड ॥ ठाकुर आल्हसिंहजी कामनावनवर्णन ॥ सवैया ॥ जौन चहै ललिते सुख सम्पति तौन भजैं नित शम्भुभवानी । अक्षत चन्दन पुष्पन बिल्व सों पूजतहैं जे महा कउ ज्ञानी ॥ नाति औ पूत परोसिन ज्ञातिन भांतिन भांति लहैं सुखखानी । बाराणसी रजधानी बिराजत छाजत शम्भु तहाँ सुखदानी १ सुमिरन ॥ ज्ञानी ध्यानी सब जानत हैं जगको शम्भु करैं उपकार ॥ विकट निशानी कलि पापनकी यामें गये सबै मन हार १ योग यज्ञकै चर्चा उठिगै अर्चा होय न एकोबार ॥ विषय कमाई घर घर होवै दर दर उलटिगये व्यवहार २ सन्ध्या तर्पण की चर्चा ना पर्चा ठुमरिन के अधिकार ॥ खर्चा होवै सँग वेश्यन के नारी पती देयँ धिक्कार ३ ऐसे पापी यहिकलियुग मा स्वामी शम्भु करैं उपकार ॥

२ आल्हखण्ड । ४६४ जो तन त्यागै श्री काशी मा सो नर चला जाय भवपार ४ है रजधानी गिरिजापति कै जाहिर तीनि लोक यहिवार ॥ अल्हा मनावन को अबजाई मैने जौनु चँदेले क्यार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया माहिल उरई का परिहार ॥ काम औ धंधा कछु ज्यहिके ना केवल चुगुलिन का बयपार १ सोयकै जागा सो उरई मा घोड़ी तुरत लीन कसवाय ॥ चढ़िकै घोड़ी माहिलठाकुर दिल्ली शहर पहुँचा जाय २ बड़ी खातिरी पिरथी कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ समय पायकै माहिल बोले मानो कही पिथौराराय ३ आल्हा ऊदन हैं कनउज मा मोहबा आपु लेउ लुटवाय ॥ ऐसो अवसर फिरि मिलिहै ना मानो कही पिथौराराय ४ इतना सुनिकै पृथीराज ने डंका तुरत दीन बजवाय ॥ चन्दन गोपी ताहर सजिगे मनमा श्रीगणेश पद ध्याय ५ लैके फौजै सातलाखलों पिरथी कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर मदनतालपर पहुँचा फेरि पिथौरा आय ६ तम्बू गड़िगे चौगिर्दा सों सब रँग ध्वजारहे फहराय ॥ पिरथी बोले फिरि माहिलते राजै खबरि सुनाबो जाय ७ हाल हमारो सब जानत हौ तुमते कहौं काह समुझाय ॥ इतनासुनिकै माहिल चलिभे पहुँचे जहाँ अँदेलेराय ८ हाल बनायो परिमालिक ते माहिल झूठ साँच समुझाय ॥ सुनिकै बातें माहिल मुखते राजा गये सनाकाखाय ९ अवापसीना परिमालिक के शिर सों छत्र गिरामहराय ॥ खबरि पायकै मल्हना रानी माहिलमहल लीनबुलवाय १०

आल्हाकामनावन । ४६५ ३ मल्हनावोली फिरिमाहिल ते काहे चढ़े पिथौराराय ॥ इतना सुनिकै माहिल बोले बहिनी साँच देयँ बतलाय ११ उड़न बछेड़ा पाँचो चाहें पारस चहैं पिथौराराय ॥ डोला चाहें चन्द्रावलि का ताहर साथ बियाही जाय १२ बैठक चाहें खजुहागढ़ की चाहें राज ग्वालियर क्यार ॥ इतना लीन्हे बिन जैहैं ना राजा दिल्ली के सरदार १३ सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना गई सनाकाखाय ॥ धीरज धरिकै फिरि बोलति भै पिरथी देउ जाय समुझाय १४ बारह दिनकी मुहलति देवैं त्यरहें डाँड़ लेयँ भरवाय ॥ जबै बनाफर उदयसिंह थे तब नहिं अये पिथौराराय १५ देखि अनाथन ह्याँ तिरियनको लूटन अये अधर्मीराय ॥ धर्मी होवैं तो मोहलति अब बारह दिन की देयँ कराय १६ त्यरहें पावैं जो पिरथी ना मुहबा शहर लेयँ लुटवाय ॥ हथी पछारा था द्वारे पर जायकै जबै लहुरखाभाय १७ मलखे ठाकुर जब सिरसा थे तब नहिं अये पिथौराराय ॥ इतना कहिकै मल्हना रानी नीचे बैठी शीश झुकाय १८ बोलि न आवा जब मल्हनाते माहिल बोले बचन बनाय ॥ बारह दिन लौं बुलै पिथौरा पहिले मूड़ देउँ कटवाय १६ त्यरहें दिन जो लुटै पिथौरा तौ माहिल कै जनै बलाय ॥ बैर बिसाहा मलखे ऊदन ताते चढ़े पिथौरा धाय २० इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ जो कछु भाषा मल्हनारानी माहिल यथातथ्य गा गाय २१ कछु नहिं ब्वाला दिल्लीवाला मल्हना गाथ सुनो यहि बार ॥ मल्हना सोचै मन अन्तर मा अबधौं कवन बचावनहार २२

४ आल्हखण्ड । ४६६ बिना बँडुला के चढ़वैया नैया कौन लगेहै पार ॥ दैया मैया सुखदैया जग मैया शारद चरण तुम्हार २३ यहै बिचारत मल्हना रानी तुरतै बोलि लीन प्रतिहार ॥ तुरत बुलावा जगनायक का मैंने जौनु चँदेले क्यार २४ खबरि पायकै जगनाय्कजी तुरतै गये तड़ाका आय ॥ आवत दीख्यो जगनायक को मल्हना उठी तड़ाकाधाय २५ पकरि कै बाहू जगनायक की अपने पास लीन बैठाय ॥ जगनिक बोले महरानी ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय २६ कौन साँकरा है माई पर हमते हाल देउ बतलाय ॥ तुरतै करिकै त्यहि कारज को पाछे शीश नवावों आय २७ इतना सुनिकै मल्हना बोली ईजति राखि लेउ यहिवार ॥ जल्दी जावो तुम कनउजको लावो उदयसिंह सरदार २८ सात लाखलों फौजैं लै कै सागर परा आय चौहान ॥ बारह दिनकी मुहलति दीन्ही त्यरहें लूटी नगर निदान २६ कहि समुझायो तुम आल्हाते की विपदामा होउ सहाय ॥ घाटि न समझा हम ब्रह्मा ते संकट परा आज दिनआय ३० इतना कहिकै रानी मल्हना कागज़ कलम दवाइतिलीन ॥ शिरी सर्बऊ ते भूषित करि पूरण पत्र समापतकीन ३१ सो दै दीन्ह्यो जगनायक को औरो कह्यो बहुत समुझाय ॥ जगनिक बोले तब मल्हनाते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३२ कैसे जावैं हम कनउज को औ मुह कौन दिखावैं माय ॥ सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरा बनिजको जाय ३३ तवै निकरिगे आल्हा ठाकुर तिनते बात न पूछा कोय ॥ विपति विदारण जगतारणकी मर्जी यही आज दिन होय ३४

आल्हाकामनावन । १६७ ५ नहीं तो होते मलखे ठाकुर कैसे चढ़त पिथौरा आय ॥ जियत न जैबे हम कनउजको कौवा मरे हाड़ लै जाय ३५ इतना सुनिकै मल्हना बोली दोऊ नैनन नीर बहाय ॥ राखो ईजति यहि समया मा जल्दी जाउ कनौजै धाय ३६ शोच बिचारन की विरिया ना मैंने बारबार बलिजायँ ॥ इतना सुनिकै जगनिक बोले माई साँच देयँ बतलाय ३७ घोड़ा मँगावो हरनागर को अबहीं जाउँ तड़ाकाधाय ॥ इतना सुनिकै रानी मल्हना ब्रह्मै खबरि दीन पठवाय ३८ माहिल ब्रह्मा जहँ बैठे थे चेरी तहाँ पहुँची जाय ॥ कह्यो सँदेशा सो मल्हना को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३६ सुनि संदेशा रनि मल्हनाका बोला उरई का सरदार ॥ घोड़ न देवो जगनायक कों ब्रह्मा मानु कही यहिबार ४० आल्हा रूठे हैं मोहवे ते कनउज बसे बनाफरराय ॥ घोड़ तुम्हारो फिरि देहैं ना तुमते साँच दीन बतलाय ४१ कहा न माना कछु माहिलका ब्रह्मा घोड़ दीन कसवाय ॥ बड़ी खुशहाली सों जगनायक सबको यथा योग शिरनाय ४२ मनियादेवनको सुमिरन करि घोड़ा उपर भयो असवार ॥ जहाँ पिथौरा दिल्ही वाला पहुँचा उरई का सरदार ४३ खबरि सुनाई जगनायक की माहिल बारबार समुझाय ॥ लेउ बछेड़ा अब हरनागर मानो कही पिथौराराय ४४ इतना सुनिकै पृथीराज ने चौंड़ा बकशी लीन बुलाय ॥ कहि समुझावा सब चौंड़ा ते यहु महराज पिथौराराय ४५ हुकुम पायकै महाराजा को चौंड़ा कूच दीन करवाय ॥ नदी बेतवा के ऊपरमा जगनिक गयो तड़ाका ध्याय ४६

६ आल्हखण्ड । ४६८ दीख्यो जगनिक को चौंडाने गंरई हाँक दीन ललकार ॥ देउ बछेड़ा हरनागर को पाछे जाउ नदी के पार ४७ इतना सुनिकै जगनायक जी चौंडै बोले बचन सुनाय ॥ लौटिकै अइहैं जब कनउज ते घोड़ा तुरत दिहैं पठवाय ४८ ऐसे घोड़ा हम देहैं ना मानो कही चौंड़ियाराय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी आपन हाथी दीन बढ़ाय ४६ ऐंड़ लगायो जगनायक जी हौदा उपर पहुँचे जाय ॥ लीन्ह्यो कलँगी शिर चौंडाकी चौंडा बहुत गयो शरमाय ५० लैके कलँगी जगनायक जी नदी निकरि गये वा पार ॥ चौंड़ा बकशी फिरि बोलत भा मानो घोड़े के असवार ५१ तुम अस योध्या हैं मोहबे मा कस ना राज्यकरें परिहिवार ॥ कलँगी हमरी अब दै देवो जावो आप कनौजै हाल ५२ इतना सुनिकै जगनायक जी बोले सुनो चौंड़ियाराय ॥ कलँगी तुम्हरी हम ऊदन को कनउजशहरदिखाउबजाय ५३ इतना कहिकै जगनायक जी अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥ तीनि दिनौना को धावाकरि कुड़हरितुरतगयोनगच्याय ५४ जेठ महीना ठीक दुपहरी शिरपर घामगयो बहुआय ॥ बरगद दीख्यो इक जगनायक डारन रही सघनता छाय ५५ तहँहीं बाँध्यो हरनागर को आपो सोयो जीन बिछाय ॥ दीख किसानन तहँ घोड़ा का औ असवार निहारा आय ५६ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा देखि गये हर्षाय ॥ करें बतकही तहँ आपस मा ऐसो घोड़ दीख नहिं भाय ५७ करत बतकही सब आपस में अपने धाम पहुँचे आय ॥ बात फैलिगै यह कुड़हरिमा गंगा कान परी तब जाय ५८

आल्हाकामनावन । ४६६ ७. उठा तड़ाका सो महलनते बरगद तरे पहुँचा आय ॥ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा कोड़ा लीन चुराय ५६ घोड़ बँधायो निज महलन मा औ यह हुकुमदीन फरमाय ॥ चर्चा करि है जो घोड़ा की ताको मूड़ देउँ गिरवाय ६० इतना कहिकै गंगा ठाकुर महलन करन लाग बिश्राम ॥ सोयकै जागे जब जगनायक लागे लेन रामको नाम ६१ घोड़ न दीख्यो हरनागर को तब देहीं ते गयो परान ॥ देखन लाग्यो चौगिर्दा ते औ मनकरनलाग अनुमान ६२ चौड़ा आयो का पाछे ते हमरो घोड़ चुरायो आय ॥ घोड़ा कोड़ा कछु देखे ना मनमा गयो सनाकाखाय ६३ चिह्न देखिकै तहँ टापन के कुड़हरि शहर पहुँचा आय ॥ जहाँ अथाई पनिहारिन की जगनिक तहाँ पहुँचाजाय ६४ करें बतकही ते आपस मा घोड़ा दीख नहीं असमाय ॥ जैसो लायो नरनायक है मानो उड़न बछेड़ा आय ६५ सुनिकै चर्चा तहँ घोड़ा की जगनिकखुशीभयोअधिकाय ॥ जहाँ कचहरी गंगाधर की जगनिक तहाँ पहुँचाजाय ६६ बड़ी खातिरी करि गंगाधर अपने पास लीन बैठाय ॥ जगनिक बोले गंगाधर ते घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ६७ चढ़ा पिथौरा है मोहवापर लीन्हे सात लाख चौहान ॥ जायें मनावन हम आल्हाको हमरे बचन करो परमान ६८ जो सुनि पैहैं आल्हा ऊदन तुम्हरो नगरलेयें लुटवाय ॥ त्यहिते तुमका समुझाइत हैं घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ६६ तब महराजा कुड़हरिवाला बोला काहगयो बौराय ॥ चोर न ठाकुर कउ कुइहरि मा घोड़ा कोड़ा लेय चुराय ७०

हमरे घोड़न की कमतीना चाहौ जौनलेउ कसवाय ॥ तुम्हरो घोड़ा हम जानैं ना ओ जगनायक बात बनाय ७१ सुनिकै बातैं गंगाधर की मैंने ब्वला चँदेलेक्यार ॥ घोड़ा कोड़ा जो पैहैं ना तौ मरिजाएँ पेटको मार ७२ ईजति रहै ना मोहवे की तुमते साँच दीन बतलाय ॥ [L6: होउ हितैषी परिमालिक के घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ७३ सुनिकै बातैं जगनायक की धीरज बहुत दीनसमुझाय ॥ खबरि पायके महरानी ने राजै पास लीन बुलवाय ७४ कहि समुझावा महराजा ते बिपदा परी मोहोवे आय ॥ तुम्है मुनासिब यह नाहीं है घोड़ा कोड़ा लेउ चुराय ७५ देउ तड़ाका घोड़ा कोड़ा राजन यहै बड़ाई आय ॥ सुनिकै बातैं महरानी की तुरतै गयो सथान धाय ७६ डाटन लाग्यो तहँ चकरन को घोड़ा पता लगाओ जाय ॥ पाय इशारा महराजा का चाकर उठे सबे चहुँ धाय ॥ लै कै घोड़ा हरनागर को राजा पास पहुँचैं आय ॥ दीख्यो सूरति हरनागर कै जगना चढ़ा तड़ाकाधाय ७८ जैसे हमका घोड़ा दीन्ह्यो तैसे कोड़ा देउ मँगाय ॥ सवालाख को ओ कोड़ा है जो बनववा चँदेलाराय ७६ लोभ न लावो मन अपने मा कोड़ा तुरत देउ मँगवाय ॥ नहीं तो लौटों जब कनउज ते कुड़हरिशहर लेउँ लुटवाय ८० कोड़ा दीन्ह्यो ना गंगाधर जगना कूच दीन करवाय ॥ छहै दिनौना के अन्तर मा कनउज शहर पहुँचे आय ८१ लगीं दुकानैं हलवाइन की सबविधिसजाशहरअधिकाय॥ ५ दुकानन मा पूछत भा कहँ पै बसैं बनाफरराय ८२

आल्हाकामनावन । ४७१ ६ कहाँ बनाफर आल्हाठाकुर हमका पता देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातैं जगनायककी बोला एक मसखरा भाय ८३ आल्हा ऊदन मोहबे वाले मरिगे समर भूमि मैदान ॥ काह बतावैं परदेशी से तिनकीकुशलनहींहैज्वान ८४ आल्हा तेली इक कनउज मा दूसर नगर आल्ह कुतवाल ॥ सुनी मसखरा की बातैं जब जगनिकद्वैगाहाल बिहाल८५ तबलों ढाढ़ी इक बोलत भा ठाकुर घोड़े के असवार ॥ आल्हा ऊदन मोहबेवाले नीके दऊ भाय सरदार ८६ अबहीं आवत हम ड्योढ़ीते ठाकुर घोड़े के असवार ॥ खड़ा धौरहर वहु ऊदन का झलकैकलश सूबरणक्यार८७ सुनिकै बातैं त्यहि ढाढ़ी की जगनिक दीन दुकान लुटाय ॥ हाट बांट में हल्ला हैगा पहुँचे राजसभा वहु जाय ८८ सुनिकै बातैं हलवाइन की लाखनि राना लीन बुलाय ॥ पकरिकै लावो त्यहि ठाकुर को हमरी नजरि गुजारो आय ८९ इतना सुनिकै लाखनि राना भूरी उपर भये असवार ॥ मीरासय्यद को सँग लैकै आये बेगि हाट त्यहिवार ६० सय्यद दीख्यो जगनायक को तब लाखनिते कह्यो हवाल ॥ यहु है भैनो महराजा को जयहिकानाम रजापरिमाल ६१ इतना सुनिकै लाखनिराना अपनो हाथी लीन घुमाय ॥ मीरासय्यद जगनायक ते भेंटे तुरत तहाँ पर आय ६२ जहाँ धौरहर बघऊदन का दोऊ तहाँ गये असवार ॥ द्वारे ठाढ़े उदयसिंह थे भेंटे तुरत आय सरदार ६३ हाथ पकरिकै जगनायक को महलन तुरत पहुँचे जाय ॥ आल्हा दीख्यो जगनायक को अपने पास लीन बैठाय ६४

१० । आल्हखण्ड । ४७२ लिखी हकीकति जो मल्हनाने सो जगनायक दीन गहाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी महरानी कै आल्हा चुपसाधि रहिजाय ९५ ऊदन बोले जगनायक ते भोजन हेतु चलौ सरदार ॥ आल्हा जावैं जो मोहबे को तो हम बैठि करें ज्यँवनार ९६ बारह दिनके अब अरसा मा लूटी नगर पिथौराराय ॥ ईजति रहै नहिं मल्हना की जो नहिं चलै बनाफरराय ९७ डोला लैहैं चन्द्रावलि का पारस पत्थर लिहैं छिड़ाये ॥ नहीं बनाफर सिरसा वाला जो गाढ़े मा होय सहाय ९८ नाहीं सुनिकै मलखाने की आल्हा छाँड़ि दीन डिंडकार ॥ ऊदन इन्दल देवा सय्यद रोवन लागि सबै सरदार ९९ बात फैलिगै यह महलन मा की मरिगये बीर मलखान ॥ को गति बरणै त्यहि समयैकै महलनछायो घोरमशान १०० द्यावलि सुनवाँ फुलवा रानी शिरधुनि बार बार पछिनायँ ॥ हाय ! बनाफर सिरसा वाले कैसे मरे समर में जाय १०१ सवैया ॥ हाय ! गयी सबमन्दिर छाय सुहाय नहीं ललिते सुख शय्या । बीर मेरे मलखान कुमार गई रणसों सब की मनसय्या ॥ हाय ! दयी बलवान सदा दुख औसुखको करि कर्म धवय्या । बीरबली मलखान समान जहाननहीं अस सोदर भय्या १०२ अस कहि रोवैं आल्हा ठाकुर दोऊ नैनन नीर बहाय ॥ बहु समुझायो जगनायक ने धीरज धरयो बनाफरराय १०३ अब नहिं जावैं हम मोहबे को तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ खबरि जो पावत मलखाने की दिल्ली शहर लेत लुटवाय१०४