भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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आल्हाकामनावन । ४६६ ७. उठा तड़ाका सो महलनते बरगद तरे पहुँचा आय ॥ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा कोड़ा लीन चुराय ५६ घोड़ बँधायो निज महलन मा औ यह हुकुमदीन फरमाय ॥ चर्चा करि है जो घोड़ा की ताको मूड़ देउँ गिरवाय ६० इतना कहिकै गंगा ठाकुर महलन करन लाग बिश्राम ॥ सोयकै जागे जब जगनायक लागे लेन रामको नाम ६१ घोड़ न दीख्यो हरनागर को तब देहीं ते गयो परान ॥ देखन लाग्यो चौगिर्दा ते औ मनकरनलाग अनुमान ६२ चौड़ा आयो का पाछे ते हमरो घोड़ चुरायो आय ॥ घोड़ा कोड़ा कछु देखे ना मनमा गयो सनाकाखाय ६३ चिह्न देखिकै तहँ टापन के कुड़हरि शहर पहुँचा आय ॥ जहाँ अथाई पनिहारिन की जगनिक तहाँ पहुँचाजाय ६४ करें बतकही ते आपस मा घोड़ा दीख नहीं असमाय ॥ जैसो लायो नरनायक है मानो उड़न बछेड़ा आय ६५ सुनिकै चर्चा तहँ घोड़ा की जगनिकखुशीभयोअधिकाय ॥ जहाँ कचहरी गंगाधर की जगनिक तहाँ पहुँचाजाय ६६ बड़ी खातिरी करि गंगाधर अपने पास लीन बैठाय ॥ जगनिक बोले गंगाधर ते घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ६७ चढ़ा पिथौरा है मोहवापर लीन्हे सात लाख चौहान ॥ जायें मनावन हम आल्हाको हमरे बचन करो परमान ६८ जो सुनि पैहैं आल्हा ऊदन तुम्हरो नगरलेयें लुटवाय ॥ त्यहिते तुमका समुझाइत हैं घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ६६ तब महराजा कुड़हरिवाला बोला काहगयो बौराय ॥ चोर न ठाकुर कउ कुइहरि मा घोड़ा कोड़ा लेय चुराय ७०