आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ आल्हखण्ड । ४६८ दीख्यो जगनिक को चौंडाने गंरई हाँक दीन ललकार ॥ देउ बछेड़ा हरनागर को पाछे जाउ नदी के पार ४७ इतना सुनिकै जगनायक जी चौंडै बोले बचन सुनाय ॥ लौटिकै अइहैं जब कनउज ते घोड़ा तुरत दिहैं पठवाय ४८ ऐसे घोड़ा हम देहैं ना मानो कही चौंड़ियाराय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी आपन हाथी दीन बढ़ाय ४६ ऐंड़ लगायो जगनायक जी हौदा उपर पहुँचे जाय ॥ लीन्ह्यो कलँगी शिर चौंडाकी चौंडा बहुत गयो शरमाय ५० लैके कलँगी जगनायक जी नदी निकरि गये वा पार ॥ चौंड़ा बकशी फिरि बोलत भा मानो घोड़े के असवार ५१ तुम अस योध्या हैं मोहबे मा कस ना राज्यकरें परिहिवार ॥ कलँगी हमरी अब दै देवो जावो आप कनौजै हाल ५२ इतना सुनिकै जगनायक जी बोले सुनो चौंड़ियाराय ॥ कलँगी तुम्हरी हम ऊदन को कनउजशहरदिखाउबजाय ५३ इतना कहिकै जगनायक जी अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥ तीनि दिनौना को धावाकरि कुड़हरितुरतगयोनगच्याय ५४ जेठ महीना ठीक दुपहरी शिरपर घामगयो बहुआय ॥ बरगद दीख्यो इक जगनायक डारन रही सघनता छाय ५५ तहँहीं बाँध्यो हरनागर को आपो सोयो जीन बिछाय ॥ दीख किसानन तहँ घोड़ा का औ असवार निहारा आय ५६ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा देखि गये हर्षाय ॥ करें बतकही तहँ आपस मा ऐसो घोड़ दीख नहिं भाय ५७ करत बतकही सब आपस में अपने धाम पहुँचे आय ॥ बात फैलिगै यह कुड़हरिमा गंगा कान परी तब जाय ५८