भारतकोश
संग्रह पर लौटें

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

६ आल्हखण्ड । ४६८ दीख्यो जगनिक को चौंडाने गंरई हाँक दीन ललकार ॥ देउ बछेड़ा हरनागर को पाछे जाउ नदी के पार ४७ इतना सुनिकै जगनायक जी चौंडै बोले बचन सुनाय ॥ लौटिकै अइहैं जब कनउज ते घोड़ा तुरत दिहैं पठवाय ४८ ऐसे घोड़ा हम देहैं ना मानो कही चौंड़ियाराय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी आपन हाथी दीन बढ़ाय ४६ ऐंड़ लगायो जगनायक जी हौदा उपर पहुँचे जाय ॥ लीन्ह्यो कलँगी शिर चौंडाकी चौंडा बहुत गयो शरमाय ५० लैके कलँगी जगनायक जी नदी निकरि गये वा पार ॥ चौंड़ा बकशी फिरि बोलत भा मानो घोड़े के असवार ५१ तुम अस योध्या हैं मोहबे मा कस ना राज्यकरें परिहिवार ॥ कलँगी हमरी अब दै देवो जावो आप कनौजै हाल ५२ इतना सुनिकै जगनायक जी बोले सुनो चौंड़ियाराय ॥ कलँगी तुम्हरी हम ऊदन को कनउजशहरदिखाउबजाय ५३ इतना कहिकै जगनायक जी अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥ तीनि दिनौना को धावाकरि कुड़हरितुरतगयोनगच्याय ५४ जेठ महीना ठीक दुपहरी शिरपर घामगयो बहुआय ॥ बरगद दीख्यो इक जगनायक डारन रही सघनता छाय ५५ तहँहीं बाँध्यो हरनागर को आपो सोयो जीन बिछाय ॥ दीख किसानन तहँ घोड़ा का औ असवार निहारा आय ५६ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा देखि गये हर्षाय ॥ करें बतकही तहँ आपस मा ऐसो घोड़ दीख नहिं भाय ५७ करत बतकही सब आपस में अपने धाम पहुँचे आय ॥ बात फैलिगै यह कुड़हरिमा गंगा कान परी तब जाय ५८

आल्हाकामनावन । ४६६ ७. उठा तड़ाका सो महलनते बरगद तरे पहुँचा आय ॥ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा कोड़ा लीन चुराय ५६ घोड़ बँधायो निज महलन मा औ यह हुकुमदीन फरमाय ॥ चर्चा करि है जो घोड़ा की ताको मूड़ देउँ गिरवाय ६० इतना कहिकै गंगा ठाकुर महलन करन लाग बिश्राम ॥ सोयकै जागे जब जगनायक लागे लेन रामको नाम ६१ घोड़ न दीख्यो हरनागर को तब देहीं ते गयो परान ॥ देखन लाग्यो चौगिर्दा ते औ मनकरनलाग अनुमान ६२ चौड़ा आयो का पाछे ते हमरो घोड़ चुरायो आय ॥ घोड़ा कोड़ा कछु देखे ना मनमा गयो सनाकाखाय ६३ चिह्न देखिकै तहँ टापन के कुड़हरि शहर पहुँचा आय ॥ जहाँ अथाई पनिहारिन की जगनिक तहाँ पहुँचाजाय ६४ करें बतकही ते आपस मा घोड़ा दीख नहीं असमाय ॥ जैसो लायो नरनायक है मानो उड़न बछेड़ा आय ६५ सुनिकै चर्चा तहँ घोड़ा की जगनिकखुशीभयोअधिकाय ॥ जहाँ कचहरी गंगाधर की जगनिक तहाँ पहुँचाजाय ६६ बड़ी खातिरी करि गंगाधर अपने पास लीन बैठाय ॥ जगनिक बोले गंगाधर ते घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ६७ चढ़ा पिथौरा है मोहवापर लीन्हे सात लाख चौहान ॥ जायें मनावन हम आल्हाको हमरे बचन करो परमान ६८ जो सुनि पैहैं आल्हा ऊदन तुम्हरो नगरलेयें लुटवाय ॥ त्यहिते तुमका समुझाइत हैं घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ६६ तब महराजा कुड़हरिवाला बोला काहगयो बौराय ॥ चोर न ठाकुर कउ कुइहरि मा घोड़ा कोड़ा लेय चुराय ७०

हमरे घोड़न की कमतीना चाहौ जौनलेउ कसवाय ॥ तुम्हरो घोड़ा हम जानैं ना ओ जगनायक बात बनाय ७१ सुनिकै बातैं गंगाधर की मैंने ब्वला चँदेलेक्यार ॥ घोड़ा कोड़ा जो पैहैं ना तौ मरिजाएँ पेटको मार ७२ ईजति रहै ना मोहवे की तुमते साँच दीन बतलाय ॥ [L6: होउ हितैषी परिमालिक के घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ७३ सुनिकै बातैं जगनायक की धीरज बहुत दीनसमुझाय ॥ खबरि पायके महरानी ने राजै पास लीन बुलवाय ७४ कहि समुझावा महराजा ते बिपदा परी मोहोवे आय ॥ तुम्है मुनासिब यह नाहीं है घोड़ा कोड़ा लेउ चुराय ७५ देउ तड़ाका घोड़ा कोड़ा राजन यहै बड़ाई आय ॥ सुनिकै बातैं महरानी की तुरतै गयो सथान धाय ७६ डाटन लाग्यो तहँ चकरन को घोड़ा पता लगाओ जाय ॥ पाय इशारा महराजा का चाकर उठे सबे चहुँ धाय ॥ लै कै घोड़ा हरनागर को राजा पास पहुँचैं आय ॥ दीख्यो सूरति हरनागर कै जगना चढ़ा तड़ाकाधाय ७८ जैसे हमका घोड़ा दीन्ह्यो तैसे कोड़ा देउ मँगाय ॥ सवालाख को ओ कोड़ा है जो बनववा चँदेलाराय ७६ लोभ न लावो मन अपने मा कोड़ा तुरत देउ मँगवाय ॥ नहीं तो लौटों जब कनउज ते कुड़हरिशहर लेउँ लुटवाय ८० कोड़ा दीन्ह्यो ना गंगाधर जगना कूच दीन करवाय ॥ छहै दिनौना के अन्तर मा कनउज शहर पहुँचे आय ८१ लगीं दुकानैं हलवाइन की सबविधिसजाशहरअधिकाय॥ ५ दुकानन मा पूछत भा कहँ पै बसैं बनाफरराय ८२

आल्हाकामनावन । ४७१ ६ कहाँ बनाफर आल्हाठाकुर हमका पता देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातैं जगनायककी बोला एक मसखरा भाय ८३ आल्हा ऊदन मोहबे वाले मरिगे समर भूमि मैदान ॥ काह बतावैं परदेशी से तिनकीकुशलनहींहैज्वान ८४ आल्हा तेली इक कनउज मा दूसर नगर आल्ह कुतवाल ॥ सुनी मसखरा की बातैं जब जगनिकद्वैगाहाल बिहाल८५ तबलों ढाढ़ी इक बोलत भा ठाकुर घोड़े के असवार ॥ आल्हा ऊदन मोहबेवाले नीके दऊ भाय सरदार ८६ अबहीं आवत हम ड्योढ़ीते ठाकुर घोड़े के असवार ॥ खड़ा धौरहर वहु ऊदन का झलकैकलश सूबरणक्यार८७ सुनिकै बातैं त्यहि ढाढ़ी की जगनिक दीन दुकान लुटाय ॥ हाट बांट में हल्ला हैगा पहुँचे राजसभा वहु जाय ८८ सुनिकै बातैं हलवाइन की लाखनि राना लीन बुलाय ॥ पकरिकै लावो त्यहि ठाकुर को हमरी नजरि गुजारो आय ८९ इतना सुनिकै लाखनि राना भूरी उपर भये असवार ॥ मीरासय्यद को सँग लैकै आये बेगि हाट त्यहिवार ६० सय्यद दीख्यो जगनायक को तब लाखनिते कह्यो हवाल ॥ यहु है भैनो महराजा को जयहिकानाम रजापरिमाल ६१ इतना सुनिकै लाखनिराना अपनो हाथी लीन घुमाय ॥ मीरासय्यद जगनायक ते भेंटे तुरत तहाँ पर आय ६२ जहाँ धौरहर बघऊदन का दोऊ तहाँ गये असवार ॥ द्वारे ठाढ़े उदयसिंह थे भेंटे तुरत आय सरदार ६३ हाथ पकरिकै जगनायक को महलन तुरत पहुँचे जाय ॥ आल्हा दीख्यो जगनायक को अपने पास लीन बैठाय ६४

१० । आल्हखण्ड । ४७२ लिखी हकीकति जो मल्हनाने सो जगनायक दीन गहाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी महरानी कै आल्हा चुपसाधि रहिजाय ९५ ऊदन बोले जगनायक ते भोजन हेतु चलौ सरदार ॥ आल्हा जावैं जो मोहबे को तो हम बैठि करें ज्यँवनार ९६ बारह दिनके अब अरसा मा लूटी नगर पिथौराराय ॥ ईजति रहै नहिं मल्हना की जो नहिं चलै बनाफरराय ९७ डोला लैहैं चन्द्रावलि का पारस पत्थर लिहैं छिड़ाये ॥ नहीं बनाफर सिरसा वाला जो गाढ़े मा होय सहाय ९८ नाहीं सुनिकै मलखाने की आल्हा छाँड़ि दीन डिंडकार ॥ ऊदन इन्दल देवा सय्यद रोवन लागि सबै सरदार ९९ बात फैलिगै यह महलन मा की मरिगये बीर मलखान ॥ को गति बरणै त्यहि समयैकै महलनछायो घोरमशान १०० द्यावलि सुनवाँ फुलवा रानी शिरधुनि बार बार पछिनायँ ॥ हाय ! बनाफर सिरसा वाले कैसे मरे समर में जाय १०१ सवैया ॥ हाय ! गयी सबमन्दिर छाय सुहाय नहीं ललिते सुख शय्या । बीर मेरे मलखान कुमार गई रणसों सब की मनसय्या ॥ हाय ! दयी बलवान सदा दुख औसुखको करि कर्म धवय्या । बीरबली मलखान समान जहाननहीं अस सोदर भय्या १०२ अस कहि रोवैं आल्हा ठाकुर दोऊ नैनन नीर बहाय ॥ बहु समुझायो जगनायक ने धीरज धरयो बनाफरराय १०३ अब नहिं जावैं हम मोहबे को तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ खबरि जो पावत मलखाने की दिल्ली शहर लेत लुटवाय१०४

आल्हाकामनावन । ४७३ ११

मलखे मरिगे जब सिरसा मा तबहुँ न लड़े चँदेलेराय ॥ मोहिं निकार्यो उन भादों मा दारुण बाणी बज्र चलाय १०५ इतना कहिकै जगनायक सों आल्हा ठाकुर रह्यो चुपाय ॥ ऊदन बोले जगनायक ते भोजनकरो शोक बिसराय १०६ तब जगनायक फिरि बोलत भे मानो कही बनाफरराय ॥ संग न जावो जो मोहबे को हमरो शीश लेउ कटवाय १०७ बातैं सुनिकै जगनायक की द्यावलि कहा बचन समुझाय ॥ विपदा तुम्हरी के संगी हैं समरथ बड़े बनाफरराय १०८ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता काह गई बौराय ॥ तीनि तलाकें राजै दीन्हीं सो छाती माँ गई समाय १०६ विपदा भोगी हम मारग में सावन बिकट बादरी घाम ॥ पियैं लयवारिन इन्दल पानी जो सुख चैन करै विश्राम ११० इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ करो तयारी अब मोहबे की पाछिल बात सबै बिसराय १११ इतना सुनिकै आल्हा जरिगे नैनन गई लालरी छाय ॥ तब समुझायो देवा ठाकुर चहिये चलन महोबे भाय ११२ मनै आयगै यह आल्हाके तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥ भोजन करिये जगनायक जी चलिबेअबशिशोमहोबेभाय ११३ भोजन कीन्ह्यो जगनायकजी संग मा उदयसिंह सरदार ॥ जहाँ कचहरी चन्देलेकी आल्हा गये राज दरबार ११४ कही हक़ीक़ति महराजा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आज्ञा पावैं महराजा की देखें नगर मोहोबा जाय ११५ चढ़ा पिथौरा दिल्लीवाला लीन्हे सातलाख चौहान ॥ जो नहिं जावैं हम मोहबे को तौ वह लूटै नगर निदान ११६

१२ आल्हखण्ड । ४७४ तेहिते आज्ञा हम को देवो ओ महराज कनौजीराय ॥ इतना सुनिकै जयचंद जरिगे बोले सुनो बनाफरराय ११७ रय्यति लूटी तुम गाँजर की मोहवे द्रव्य दीन पहुँचाय ॥ दै समझौता सब गाँजर का पाछे जाउ बनाफरराय ११८ घोड़ा लूटे तुम बूँदी के सो-सब कहाँ दीन पठवाय ॥ गेहूँ खाये तुम गाँजर के ताते गई म्टाई आय ११९ इतना कहिकै जयचंद राजा पहरा चौकी दीन कराय ॥ कैद जानिकै आल्हा ठाकुर रूपनबारी लीन बुलाय १२० खबरि सुनावो तुम ऊदन का आल्हा परे कैदमा जाय ॥ दै समझौता तुम गाँजर का भाई अपन छुटाओ आय १२१ इतना सुनिकै रूपन चलि भा रिजिगिरि अटा तड़ाकाधाय ॥ खबरि सुनाई बघऊदन का सुनतै जरा लहुरवाभाय १२२ द्यावलि बोली जगनायक ते तुमहूं चलेजाउ यहि बार ॥ कपड़ा मैले सब हमरे हैं कैसे जायें राजदरवार १२३ इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर तुरतै इन्दल लीन बुलाय ॥ कपड़ा दीन्ह्यो जगनायक को तुरतै बेंदुल लीन सजाय १२४ उड़न बछेड़ा हरनागर पर जगना तुरत भयो असवार ॥ घोड़ बेंदुला के ऊपर मा ठाकुर उदयसिंह सरदार १२५ जयचंद राजा की ड्योढ़ी मा दोऊ अटे तड़ाका आय !! मस्ता हाथी जयचंद राजा फाटक ऊपर दीन ढिलवाय १२६ मारिकै भाला जगनायक ने हाथी दीन्ह्यो तुरत भगाय ॥ जहाँ कचहरी महराजा की दोऊ अटे तड़ाकाधाय १२७ सात तवा तहँ ईसपात के जयचंद राजा दीन धराय ॥ भाला गाड़ै ई लोहे पर औ बलमोहिंदेय दिखलाय १२८

आल्हाकामनावना । ४७५ १३ कैसों भेने चन्देले का गड़बड़ कीन हाट माँ आय ॥ इतना सुनिकै जगनायक ने मनमा सुमिरि दूरगामाय १२६ भाला मारा ईसपात मा सातो तवा निकरिगे पार ॥ स्याबसि स्याबसि क्षत्री बोले हरषे उदयसिंह सरदार १३० सिंह कि बैठक जगना बैठ्यो राजा बहुत गयो शरमाय ॥ ऊदन बोले महाराजा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १३१ आजु साँकरा परिमालिक पर औ चढ़ि अवा पिथौरा राय ॥ आयसु पावैं महाराजा की जावैं नगरमोहोबा धाय १३२ मेरी माता सम मल्हना है तापर परी आपदा आय ॥ बीजक समझौ तुम गाँजर का दादा कैद देउ छुड़वाय १३३ घोड़ पपीहा जखमी हैगा जूझै स्वानमती के भाय ॥ जोगा भोगा की बदली मा सबियाँ कनउज जाय बिकाय १३४ घोड़ पपीहा की यउजी मा भूरी हथिनी देउ मँगाय ॥ जोगा भोगा के बदले मा लाखनि संग देउ पठवाय १३५ बारह बरसन का अरसा भा पैसा मिला न गाँजर क्यार ॥ तीनि महीना औ ग्यारह दिन गाँजर खूब कीन तलवार १३६ लैकै पैसा सब गाँजर का औ भरिदीन खजाना आय ॥ लाखनि राना को सँग देवो तब छाती का डाह बुताय १३७ कीन्हीं किरिया लखराना है मोहबे चलब तुम्हारे साथ ॥ आज्ञा देवो लखराना को साँची सुनो भूमिके नाथ १३८ बातैं सुनिकै बघऊदन की जयचंद बहुत गयो घबड़ाय ॥ बोलि न आवा महाराजा ते मुँहँ का पान गयो कुम्हिलाय १३६ थर थर काँपन देही लागी शिरते छत्र गिरा भहराय ॥ करतब अपनी पर शोचत भा यहु महराज कनौजी राय १४०

३४ आल्हखण्ड । ४७६ कीन बहाना फिरि ऊदन ते बोला कनउज का महिपाल ॥ कीन हँसौवा हम आल्हा ते लाला देशराज के लाल १४१ जितनी फौजैं हैं कनउज मा सो लैलेउ बनाफरराय ॥ रुपिया पैसा जो कछु चाहौ तुम्हरौ मालखजाना आय १४२ लाखनि रानाको तिलका सों माँगो जाय बनाफरराय ॥ हमरी ठकुरी नहीं लाखनि पर तुम ते साँचदीन बतलाय १४३ कैद करैया को आल्हा को नीके जाउ लहुरवाभाय ॥ सुनि जगनायक ऊदन आल्हा तीनों चले शीशकोनाय १४४ ऊदन पहुँचे ढिग लाखनि के औ सब हाल कहा समुझाय ॥ चढ़ा पिथौरा दिल्लीवाला गाँसानगर मोहोबा आय १४५ बिदा मांगिकै अब माता सों चलिये बेगि कनौजीराय ॥ इतना सुनिकै लाखनि चलिभे सँगमालिहेलहुरवाभाय १४६ रानी तिलका के महलन मा दोऊ अटे तड़ाका धाय ॥ सोने चौकी दोऊ बैठे माताचरणनशीशनवाय १४७ कही हकीकति सब तिलका ते यहु रणबाधु लहुरवाभाय ॥ आयसु पावैं लखराना जो देखैं नगर मोहोबा जाय १४८ सुनिकै बातें उदयसिंह की तिलका गई सनाकाखाय ॥ बारह रानिन मा इकलौता साँची सुनो बनाफरराय १४६ सो चलिजैहैं जो मोहवे का हमरी जियत मौत है जाय ॥ इतना कहिकै रानी तिलका तुरतै बाँदी लीन बुलाय १५० कहि समुझावा त्यहि बाँदीका पद्मै खबरि जनावो जाय ॥ करि श्रृङ्गार महल अपने मा राखै बहू तहाँ बिलमाय १५१ इतना सुनिकै बाँदी दौरी रानी खबरि जनाई जाय ॥ सुनिकै बातें त्यहि बाँदी की लीन्ह्यो गंगनीर मँगवाय १५२

आल्हाकामनावन । ४७७ १५ हनवन कीन्ह्यो गंगजलसों रेशम सारी लीन मँगाय ॥ ओढ़ी सारी काशमीर की चोलीबन्दकसे अधिकाय १५३ पैर महाउर को लगवाग्रो नैनन सुरमा लीन लगाय ॥ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजैं त्यहिपर पायजेब हहराय १५४ पहिरि करगता करिहाँयैमा नई नई चुरियाँ लीन मँगाय ॥ ग्वरिग्वरिबिहियाँ हरिहरिचुरियाँ शोभा कही बून ना जाय १५५ अगे आगेला पिछे पछेला तिन बिच ककना करें बहार ॥ जोसन पट्टी बांधि बज़ुल्ला टाँड़ै भुजन केर श्रृंगार १५६ को गति बरणै तहँ हमेल कै चमकै हार मोतियनक्यार ॥ नथुनी लटकन पहिरिनासिका कानन करनफूलकोथार १५७ गुज्झी पहिरी दोउ कानन में टीका मस्तक करै बहार ॥ बँदिया शिर पर सोनेवाली पैरन बिछिया की झनकार १५८ अनवट पहिरे द्वउ अँगुठन में हाथन लीन आरसीधार ॥ मुँदरी छल्ला सब अँगुरिनमा रानी खूबकीन श्रृंगार १५६ बिदा माँगिकै महतारी ते ह्वाँ चलि दिये कन्नौजीराय ॥ द्वार राखिकै उदयसिंह का रानी महलगये फिरिआय १६० रानी कुसुमा आवत दीख्यो तुरतै उठी तड़ाकाधाय ॥ पकरिकै बाहू द्वउ प्रीतमकी पलँगा ऊपर लीन बैठाय १६१ पंसासारी को मँगवावा सखियाँ लाईं तुरत उठाय ॥ बड़ी खातिरी करि पदमाकै खेलन लाग कन्नौजीराय १६२ कुसुमा बोली तब लाखनि ते स्वामी हाल देउ बतलाय ॥ किह्यो तयारी तुम कहँना की काहेगयो अचाकाआय १६३ सुनिकै बातें ये पदमा की बोला तुरत कन्नौजीराय ॥ किरिया कीन्ही हम ऊदन ते औबातील गंगमँझाय १६४

१६ आल्हखण्ड । ४७५ जबै मोहोबे को तुम चलिहौ चलिबे साथ बनाफरराय ॥ आजु साँकरा परिमालिक पर औ चढ़िआवा पिथौराराय १६५ संगै जैबे हम ऊदन के करिबे जूझ तहाँपर जाय ॥ जो मरिजबै समरभूमि मा तौ यशरही लोकमाछाय १६६ जो बचि अइबे हम मोहबे ते रानी संग करब फिरि आय ॥ सुनिकै बातें लखराना की पदमिनिगिरीपछाराखाय १६७ होश उड़ाने महरानी के पीले अंग भये अधिकाय ॥ थर थर देही काँपन लागी रोवाँ सकल उठे तन्नाय १६८ यह गति देख्यो महरानी कै तब गहिलीन कनौजीराय ॥ चूम्यो चाट्यो बदन लगायो धीरज फेरिदीनअधिकाय १६६ रानी पदमिनि पलँगा बैठी नैनन आँसू रही बहाय ॥ बोले लाखनि तब पदमिनि ते रानी काह गयी बौराय १७० बिटिया आहिउ का बनिया की जो रण सुनिकै गयी डराय ॥ भरम न राखै क्षत्रानी मन रानी साँचदीन बतलाय १७१ सुनि सुनि बातें लखराना की रानी गयी सनाकाखाय ॥ मनमा शोचै मनै विचारै मनमन बारबार पछिताय १७२ धीरज धरिकै पदमिनि बोली प्रीतम साँच देयँ बतलाय ॥ कहे रुकाचिन के लाग्यो ना नहिं सब जैहैं कामनशाय १७३ कहाँ कनौजी तुम महराजा चाकर कहाँ बनाफरराय ॥ नौकर स्वामी की समता ना विद्या काह दयी बिसराय १७४ बनते कन्या धरि आई ती त्यहिके अर्ही बनाफरराय ॥ अर्ही कुकरहा परिमालिक के तुम्हरीकीनगुलामीआय १७५ साथ गुलामन औ राजा का कहँ तुम पढ़ा कनौजीराय ॥ किरिया कीन्ही जो ऊदन ते स्वामी ताहि देउ बिसराय १७६

आल्हाकामनावन । ४७६ १७ सवैया ॥ स्वस्थिर चित्त बिचार करौ यह नाथ सबै बिधि बात अनैसी । रूप औ यौवन छाँड़ितिया सोपिया क्यहिभांतिकहौ तुमऐसी॥ धीरजवन्त कुलीनन की गति नाथ विचारि कहौ तुम कैसी । बात सुहात नहीं ललिते अनरीतिकि प्रीतकरी तुम जैसी १७७ सुनिकै बातें ये पदमिनि की बोला फेरि कनौजीराय ॥ कउने गँवार की बिटियाहै हमते टेढ़ि मेढ़ि बतलाय १७८ ऐसी बातें अब बोलेना दशनन चापि जीभको लेय ॥ जो नहिं जावैं सँग ऊदन के तौसबजगतअयशकोदेय १७६ कहा न मानैं हम काहू को निश्चय जानु मोर प्रस्थान ॥ इतना सुनिकै कुसुमा बोली स्वामी करो बचन परमान १८० राति बसेरा करि महलन मा भुरहीं कूच दिह्यो करवाय ॥ अम्बरे संगकी सखी सहिलरी डुइइइ बालकरहीं खिलाय १८१ दुनियादारी कछु जानी ना कबहुँ न धरा सेज पै पायँ ॥ कैसे काटब हम यौवन का प्रीतम साँचदेउ बतलाय १८२ तुम्हें मोहेबे का जाना रह नाहक लाये गवन हमार ॥ मई बाप का फिरि गरिआवै दैके बार बार धिक्कार १८३ सुनि सुनि बातें ये पदमिनिकी बोला फेरि कनौजीराय ॥ लौटि मोहोबे ते आवब जब रानी संग करब तब आय १८४ द्वार बनाफर उदयसिंह हैं रानी मोह देउ बिसराय ॥ संकट टारे बिन मल्हना के हमको योग रोग दिखलाय १८५ साथ बनाफर के हम जैहैं अइहैं जीति पिथौरा राय ॥ कीरति गैहै सब दुनिया मा रानी संग करब तब आय १८६

१८ आल्हखण्ड । ४८० इतना कहिकै लाखनि चलिभे रानी पकरिलीन बैठाय ॥ करी बदरिया तुमका ध्यावैं कउँधाबीरनकीबलिजायँ १८७ झिमिकिकैवरसोम्वरेमहल नमा कन्ता एक रैनि रहिजायँ ॥ इतना सुनिकै लाखनि बोले रानी साँच देयँ बतलाय १८८ पाथर बरसैं आसमान ते तबहुं न रहैं कनौजीराय ॥ लौटि मोहोवे ते आवब जब रानी संग करब तब आय १८६ तेज न रहै जो देहीमा को मुहँ धरी पिथौराक्यार ॥ मुची परि है बादशाह ते लड़िहैं बड़े बड़े सरदार १६० लौटि मोहोवे ते आवब जब रानी कहा न टारब त्वार ॥ अब हम जावत हैं जल्दी सों द्वारे उदयसिंह सरदार १६१ सुनिकै बातें ये लाखनि की रानी फेरि लीन बैठाय ॥ कैसे रहिबे हम कनउज में स्वामी देउ मोहिं बतलाय १६२ पगिया अरझी तब मोहवे मा यहु मरि जाय बनाफरराय ॥ हाय ! पियारे ज्यहि प्रीतम को ज्वानीसमयदीन अलगाय १६३ भुखी भवानी आल्है भक्षी इन्दल सहित लहुरवाभाय ॥ भरी जवानी ज्यहि प्रीतमको हमते अलगदीन करवाय १६४ काहे जनमी द्यावलि इनका ई दहिजार बड़े बरियार ॥ सुनवाँ फुलवा चित्तररेखा तीनों होउ बिना भरतार १६५ करो बियारी तुम महलन मा पलँगा उपर करो विश्राम ॥ मोरि जवानी स्वारथ करिकै तब तुम जाउ मोहोवेग्राम १६६ सुनिकै बातें ये पदमिनि की बोला फेरि कनौजीराय ॥ खड़ा बनाफर है द्वारे मा रानी काह गई बौराय १६७ अब तुम ध्यावो फूलमती का तेई फेरि मिलैहैं आय ॥ धर्म पतिव्रत का छाँड़यो ना गाही कहैं तोहिं समुझाय १६८

आल्हाकामनावन । ४८१ १० गारी देवो नहिं ऊदन का प्यारी मित्र हमारो जान ॥ करैं बियारी नहिं महलन में प्यारी सत्य प्रतिज्ञा मान १६६ सुनिकै बातैं लखराना की पदमा ठीक लीन ठहराय ॥ प्रीतम हमरे अब मनिहैं ना जैहैंअवशि मोहोबा धाय २०० यहै सोचिकै मन अपने मा रानी बोली फेरि सुनाय ॥ डोला हमरा सँगमा लैके राजन कूच देव करवाय २०१ मोरि लालसा यह इवालतिहै बालम मोहबा देउ दिखाय ॥ बनोवास को रघुनन्दन गे सीता लैगे साथ लिवाय २०२ सुर औ असुरन के संगर मा दशरथ साथ केकई माय ॥ लै सतिभामा कृष्णचन्द्र सँग भौमासुरै पछारा जाय २०३ जिन मर्याद्दा यह बाँधी है तेई नारि संग मा लीन ॥ बड़े प्रतापी कृष्णचन्द्र जी सोऊ पन्थ सत्य यह कीन २०४ आगे चलिगे जो क्षत्री हैं तिनमग चलनवही महराज ॥ संग में लैके बालम चालिये करिये सत्य धर्मको काज २०५ इतना कहिकै रानी पदमा आँखिनभरे आँसु अधिकाय ॥ तब लखराना लै रुमाल को आँसूपोंछि कहा समुझाय २०६ धीरज राखो चार मास लौं पँचये मिलब तुम्हें हम आय ॥ सत्य सनेहू ज्यहि ज्यहिपर है सोत्यहिमिलैतड़ाकाधाय २०७ यामें संशय कछु नाहीं है ब्राह्मण रोज कहैं यह गाय ॥ शास्त्र पुरातन की बानी यह रानी तुम्हें दीन बतलाय २०८ धर्म पतिव्रत ज्यहि नारी के प्यारी प्रीतम के अधिकाय ॥ कहा न टारै सो प्रीतम का चहु जस परै आपदा आय २०६ जो विलगावौ अब महलन मा तौ सब कीरति जाय नशाय॥ हँसै बनाफर म्वाहं मारग मा मेहरा बड़े कनौजीराय २१० ॥

आल्हखण्ड । ४८२ शोहरा फैली यहु दुनिया मा हँसिहैं जाति बिरादर भाय ॥ मेहरा लड़का रतीभान का सँगमालिहे जनानाजाय २११ तैसो समया अब नाहीं है जैसे समय भये रघुराय ॥ बड़े प्रतापी कृष्णचन्द्रजी द्वापरजन्मलीनतिनआय २१२ कलियुग बाबा की रजधानी रानी कहा गई बौराय ॥ दया धर्म दुनिया तें उठिगे दर दर सत्य पछारा जाय २१३ घर घर कुलटा हैं कलियुग में नर नर पाप भरा अधिकाय ॥ जर जर जरना है दुनिया मा हर हर हरी हरी बिसराय २१४ आखिर मरना है दुनिया मा लरना धर्म हमारा आय ॥ इतना कहिकै चला कनौजी रानी फेरि लीन बैठाय २१५ दिया बुझायो तुम परहुलका इतना किह्यो राहमें जाय ॥ पाँव पिछारी का डारयो ना चहुतनधजीधजीउड़िजाय २१६ कीरति प्यारी नर नारिन के निन्दा सुने मौत है जाय ॥ तहिले ठाकुर बघऊदन जी लाखनिलाखनिरहेबुलाय २१७ हाँक पाय कै बघऊदन कै तुरतै चला कनौजीराय ॥ द्वारे मिलिकै बघऊदन को जयचंदसभागयोफिरिधाय २१८ मस्तक धरिकै दुउ चरणनमा लाखनि ठाढ़भयो शिरनाय ॥ तब शिर सूंध्यो जयचंदराजा आयसु फेरिदीन हर्षाय २१९ आल्हा ऊदन को बुलवायो लाखनि बाँह दीन पकराय ॥ तुम्हें कनौजी का सौंपत हैं दोऊ सुनो बनाफरराय २२० सुनिकै बातें महराजा की दोऊ भाय बनाफरराय ॥ बोलन लागे महराजा ते राजन साँचदेयँ बतलाय २२१ जहाँ पसीना लखराना का तहँ गिरि जैहैं मूड़ हमार ॥ यामें संशय कछु नाहीं है मानो सत्य भूमिभरतार २२२

आल्हाकामनावन । ४८३ २१ इतना कहिकै आल्हा ऊदन लाखनि साथ चले शिरनाय ॥ बाजे डंका अहलंका के हाहाकार शब्द गे छाय २२३ चारों राजा गाँजर वाले बारहु कुँवर बनौधा केर ॥ लला तमोली धनुवाँ तेली इनते कहा चँदेले टेर २२४ लाखनि तुमका हम सौंपत हैं रक्षा किह्यो सबै सरदार ॥ बंश लकड़िया यह इकली है इतना लीन्ह्यो खूब विचार २२५ इतना कहिकै जयचँद राजा पंडित लीन्ह्यो तुरत बुलाय ॥ प्रथम पुजायो श्रीगणेश को पाछे तिलक दिह्यो करवाय २२६ गजाननहिं अरु लम्बोदर को तीसर गणाध्यक्ष को ध्याय ॥ सुमिरि भवानीसुत गणेशको लेशकलेश दीनबिसराय २२७ रानी तिलका पूजन कीन्ह्यो भूरी हथिनी तुरत मँगाय ॥ थाती सौंप्यो लखराना को हथिनीसम्मुख बैन सुनाय २२८ फिरि कर पकरयो लखरानाका ऊदन हाथ दीन पकराय ॥ मोहिं अभागिनि के बालककी रक्षा किह्यो बनाफरराय २२९ सुनिकै बातें महरानी की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ जहाँ पसीना लखराना का तहँ हम मूड़ देयँ कटवाय २३० घाटि न जानैं हम भाई ते माता साँच देयँ बतलाय ॥ फिकिरि न राख्यो लखरानाकी इनको बार न बाँको जाय २३१ इतना कहिकै महरानी ते ऊदन फेरि कहा ललकार ॥ करो तयारी अब मोहबे की सबियाँ शूरवीर सरदार २३२ हुकुम पायकै बघऊदन का सबहिन बाँधिलीन हथियार ॥ हथी चदैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार २३३ पायँ लागिकै दोउ तिलका के भूरी चढ़ा कनौजियाराय ॥ बजे नगारा त्यहि समया मा हाहाकार शब्द गा छाय २३४

५२ - आल्हाखण्ड । ४८४ मारु मारु कै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल २३५ आगे हलका भे हाथिन के पाछे चलन लाग असवार ॥ बीच म डोला महरानिन के ह्वैगे अगलबगल सरदार २३६ भूरी हथिनी पर लाखनि हैं ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ आल्हा बैठे पचशब्दा पर इन्दल सहित भये तय्यार २३७ कीनि सवारी हरनागर पर भैने जौनु चँदेले क्यार ॥ घोड़ मनोहरपर देवा है सय्यद सिर्गापर असवार २३८ लला तमोली धनुवाँ तेली येऊ लिये ढाल तलवार ॥ पैदल सेना अनगन्ती सब गर्जतचलीसमरत्यहिबार २३९ चारिकोस जब परहुल रहिगा लाखनि डेरा दीन डराय ॥ लाखनि बोले तहँ आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय २४० दियना अंटापर परहुल मा सो त्यहि आप देउ उतराय ॥ बचन मानिकै हम पदमिन के वादा कीन तहांपर भाय २४१ दियना शालत है जियरे मा मानो कही बनाफरराय ॥ सुनिकै बातें कनौजिया की आल्हाधावनलीनबुलाय२४२ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को परहुल तुरत दीन पठवाय ॥ जहाँ कचहरी है सिंहा कै धावन तहाँ पहुँचा जाय २४३ चिट्ठी दै कै महराजा का बाकी हाल कहा शिरनाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी सिंहा जरिगा डंका तुरतदीन बजवाय २४४ धावन चलिभा तब परहुल ते लश्कर फेरि पहुँचा आय ॥ कही हकीकति सब आल्हा ते तब जरिगये कनौजीराय२४५ हुकुम लगायो अपने दलमा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजिकै सेना दुहुँतरफा ते पहुँची समरभूमिमें आय २४६

आल्हाकामनावत । ४८५ ५३ लाखनि राना इत हाथी पर वैसी परहुल का सरदार ॥ भाला छूटे असवारन के पैदलचलनलागितलवार २४७ झुके सिपाही दुहुँ तरफा के लागे करन भड़ाभड़ मार ॥ मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार २४८ बड़ी लड़ाई मै परहुल में लाखनि राना के मैदान ॥ लड़ैं सिपाही दुहुँ तरफा के कटि २ गिरैंसुघरूवाज्वान२४९ उठि उठि ठाकुर लरैं खेत में कहुँ कहुँ रुण्ड करैं तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार २५० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे अहिर विडारै गाय ॥ तैसे मारै ऊदन ठाकुर सिंहाफौजगई बिललाय २५१ भागीं फौजै जब परहुल की लाखनि हाथी दीन बढ़ाय ॥ लाखनिराना के मुर्चा मा सिंहा आपु पहुँचा आय २५२ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे दोऊ लड़न लागि सरदार ॥ सिंहा मार्यो तलवारी को लाखनिलीन ढालपरवार २५३ भाला मार्यो लखराना ने नीचे गिरा महाउत आय ॥ बलछी मारा सिंहा ठाकुर लाखनि लैगे वार बचाय २५४ खाली वार परी सिंहा की लाखनि तुरत लीन बँधवाय ॥ जायकै पहुँचे फिरि परहुल मा तुरतै दिया दीन गिरवाय २५५ लैके फौजैं सिंहा ठाकुर संगै कूच दीन करवाय ॥ कोस अढ़ाई कुड़हरि रहिगा डेरा तहाँ दीन डखाय २५६ भैने बोल्यो परिमालिक का मानो कही बनाफरराय ॥ गंगा ठाकुर कुड़हरि वाला कोड़ा घोड़ा लीन चुराय २५७ सवा लाख का सो कोड़ा है जो बनवा राजापरिमाल ॥ महामुशकिलिन घोड़ा दीन्ह्यो कोड़ानहींदीनत्यहिकाल २५८

२४ आल्हाखण्ड । ४८६ कीन प्रतिज्ञा हम कुड़हरिमां लौटति नगर ल्याब लुटवाय ॥ साँची करिये यहि समया मा मानो कही बनाफरराय २५६ इतना सुनिकै ऊदन जरिगे तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥ लागैं तोपैं अब कुड़हरि मा सबियाँगर्द देउ मिलवाय २६० इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही बनाफरराय ॥ गंगाधर कुड़हरि का राजा मामा सगो हमारो आय २६१ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को उनको खबरि देउ करवाय ॥ मैने तुम्हरे लाखनि आये कोड़ा आपु देउ पठवाय २६२ सुनिकै बातें लखराना की चिट्ठी लिखा बनाफरराय ॥ तुरतै धावन को बुलवायो औ कुड़हरिको दीनपठाय २६३ लैके चिट्ठी धावन चलिभा औ दरबार पहुँचाजाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो गंगाधर को धावन हाथजोरिशिर नाय २६४ कही हकीकति सब गंगा ते जो कछु कह्यो बनाफरराय ॥ सुनि संदेशा पढ़ि चिट्ठी को ठाकुरक्रोधकीनअधिकाय २६५ तुरत नगड़ची को बुलवायो डङ्का दीन तहाँ बजवाय ॥ कह्यो सँदेशा फिरि धावन ते आल्है खबरि जनावोजाय २६६ राजा आवत समरभूमि में कोड़ा लेउ तहाँ पर आय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिभा आल्है खबरि बताईजाय २६७ बाजे डङ्का ह्याँ कुड़हरि मा क्षत्री होन लागि तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार २६८ झीलम बख्तर पहिरि सिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणकाहोनलागब्यवहार २६६ चढ़िकै हथिनी गंगा ठाकुर तुरतै कूच दीन करवाय ॥ चारि घरी का अरसा गुजरा पहुँचे समरभूमिमाआय २७०

आल्हाकामनावन । ५८७ २१ जहँना हाथी गंगाधर का तहँ पर गये कनौजीराय ॥ कहि समुझावा भल मामा का कोड़ा अबै देउ मँगवाय २७१ नहीं बनाफर उदयसिंह जी कुड़हरि गर्द देयँ करवाय ॥ कौन दुसरिहा है आल्हा का सरबर करै समरमें आय २७२ त्यहिते तुमका समुझाइत है मामा कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै गंगा जरिगे बोले सुनो कनौजीराय २७३ काह हकीकति है आल्हा कै हमते कोड़ा लेयँ मँगाय ॥ एक बनाफर कै गिन्ती ना लाखनचढ़ैं बनाफरधाय २७४ हमते कोड़ा को पैहैं ना मैने साँच दीन बतलाय ॥ इतना सुनिकै चले कनौजी तम्बुन फेरि पहुँचे आय २७५ बत्ती दैदै दुहुँ तरफा ते तोपन दीन्हीं रारि मचाय ॥ अररर अररर गोला छूटे हाहाकार शब्दगा छाय २७६ गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥ जउने ऊंट के गोला लागै तुरतै कूला जुदा है जाय २७७ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के साथै उड़ा चील्ह अस जाय ॥ जउने रथमा गोला लागै ताके टूक टूक है जायें २७८ गोला लागै ज्यहि घोड़े के मानो मगर कुल्याचै खायँ ॥ अँधाधुंध भा दूनों दलमा धुवना रहा सरगमें छाय २७९ चुकी बरूदैं जब तोपन की तब फिरि मारु बन्द है जाय ॥ दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेतरणआय २८० कहूँकहूँ भाला कहूँकहूँ बरछीं कहूँ कहूँ कड़ाबीनकी मार ॥ गोली ओला सम कहुँ बरषैं कोताखानी चलैं कटार २८१ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार २८२