भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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पृष्ठ 476

आल्हाकामनावना । ४७५ १३ कैसों भेने चन्देले का गड़बड़ कीन हाट माँ आय ॥ इतना सुनिकै जगनायक ने मनमा सुमिरि दूरगामाय १२६ भाला मारा ईसपात मा सातो तवा निकरिगे पार ॥ स्याबसि स्याबसि क्षत्री बोले हरषे उदयसिंह सरदार १३० सिंह कि बैठक जगना बैठ्यो राजा बहुत गयो शरमाय ॥ ऊदन बोले महाराजा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १३१ आजु साँकरा परिमालिक पर औ चढ़ि अवा पिथौरा राय ॥ आयसु पावैं महाराजा की जावैं नगरमोहोबा धाय १३२ मेरी माता सम मल्हना है तापर परी आपदा आय ॥ बीजक समझौ तुम गाँजर का दादा कैद देउ छुड़वाय १३३ घोड़ पपीहा जखमी हैगा जूझै स्वानमती के भाय ॥ जोगा भोगा की बदली मा सबियाँ कनउज जाय बिकाय १३४ घोड़ पपीहा की यउजी मा भूरी हथिनी देउ मँगाय ॥ जोगा भोगा के बदले मा लाखनि संग देउ पठवाय १३५ बारह बरसन का अरसा भा पैसा मिला न गाँजर क्यार ॥ तीनि महीना औ ग्यारह दिन गाँजर खूब कीन तलवार १३६ लैकै पैसा सब गाँजर का औ भरिदीन खजाना आय ॥ लाखनि राना को सँग देवो तब छाती का डाह बुताय १३७ कीन्हीं किरिया लखराना है मोहबे चलब तुम्हारे साथ ॥ आज्ञा देवो लखराना को साँची सुनो भूमिके नाथ १३८ बातैं सुनिकै बघऊदन की जयचंद बहुत गयो घबड़ाय ॥ बोलि न आवा महाराजा ते मुँहँ का पान गयो कुम्हिलाय १३६ थर थर काँपन देही लागी शिरते छत्र गिरा भहराय ॥ करतब अपनी पर शोचत भा यहु महराज कनौजी राय १४०