भारतकोश
संग्रह पर लौटें

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

आल्हाकामनावना । ४७५ १३ कैसों भेने चन्देले का गड़बड़ कीन हाट माँ आय ॥ इतना सुनिकै जगनायक ने मनमा सुमिरि दूरगामाय १२६ भाला मारा ईसपात मा सातो तवा निकरिगे पार ॥ स्याबसि स्याबसि क्षत्री बोले हरषे उदयसिंह सरदार १३० सिंह कि बैठक जगना बैठ्यो राजा बहुत गयो शरमाय ॥ ऊदन बोले महाराजा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १३१ आजु साँकरा परिमालिक पर औ चढ़ि अवा पिथौरा राय ॥ आयसु पावैं महाराजा की जावैं नगरमोहोबा धाय १३२ मेरी माता सम मल्हना है तापर परी आपदा आय ॥ बीजक समझौ तुम गाँजर का दादा कैद देउ छुड़वाय १३३ घोड़ पपीहा जखमी हैगा जूझै स्वानमती के भाय ॥ जोगा भोगा की बदली मा सबियाँ कनउज जाय बिकाय १३४ घोड़ पपीहा की यउजी मा भूरी हथिनी देउ मँगाय ॥ जोगा भोगा के बदले मा लाखनि संग देउ पठवाय १३५ बारह बरसन का अरसा भा पैसा मिला न गाँजर क्यार ॥ तीनि महीना औ ग्यारह दिन गाँजर खूब कीन तलवार १३६ लैकै पैसा सब गाँजर का औ भरिदीन खजाना आय ॥ लाखनि राना को सँग देवो तब छाती का डाह बुताय १३७ कीन्हीं किरिया लखराना है मोहबे चलब तुम्हारे साथ ॥ आज्ञा देवो लखराना को साँची सुनो भूमिके नाथ १३८ बातैं सुनिकै बघऊदन की जयचंद बहुत गयो घबड़ाय ॥ बोलि न आवा महाराजा ते मुँहँ का पान गयो कुम्हिलाय १३६ थर थर काँपन देही लागी शिरते छत्र गिरा भहराय ॥ करतब अपनी पर शोचत भा यहु महराज कनौजी राय १४०

३४ आल्हखण्ड । ४७६ कीन बहाना फिरि ऊदन ते बोला कनउज का महिपाल ॥ कीन हँसौवा हम आल्हा ते लाला देशराज के लाल १४१ जितनी फौजैं हैं कनउज मा सो लैलेउ बनाफरराय ॥ रुपिया पैसा जो कछु चाहौ तुम्हरौ मालखजाना आय १४२ लाखनि रानाको तिलका सों माँगो जाय बनाफरराय ॥ हमरी ठकुरी नहीं लाखनि पर तुम ते साँचदीन बतलाय १४३ कैद करैया को आल्हा को नीके जाउ लहुरवाभाय ॥ सुनि जगनायक ऊदन आल्हा तीनों चले शीशकोनाय १४४ ऊदन पहुँचे ढिग लाखनि के औ सब हाल कहा समुझाय ॥ चढ़ा पिथौरा दिल्लीवाला गाँसानगर मोहोबा आय १४५ बिदा मांगिकै अब माता सों चलिये बेगि कनौजीराय ॥ इतना सुनिकै लाखनि चलिभे सँगमालिहेलहुरवाभाय १४६ रानी तिलका के महलन मा दोऊ अटे तड़ाका धाय ॥ सोने चौकी दोऊ बैठे माताचरणनशीशनवाय १४७ कही हकीकति सब तिलका ते यहु रणबाधु लहुरवाभाय ॥ आयसु पावैं लखराना जो देखैं नगर मोहोबा जाय १४८ सुनिकै बातें उदयसिंह की तिलका गई सनाकाखाय ॥ बारह रानिन मा इकलौता साँची सुनो बनाफरराय १४६ सो चलिजैहैं जो मोहवे का हमरी जियत मौत है जाय ॥ इतना कहिकै रानी तिलका तुरतै बाँदी लीन बुलाय १५० कहि समुझावा त्यहि बाँदीका पद्मै खबरि जनावो जाय ॥ करि श्रृङ्गार महल अपने मा राखै बहू तहाँ बिलमाय १५१ इतना सुनिकै बाँदी दौरी रानी खबरि जनाई जाय ॥ सुनिकै बातें त्यहि बाँदी की लीन्ह्यो गंगनीर मँगवाय १५२

आल्हाकामनावन । ४७७ १५ हनवन कीन्ह्यो गंगजलसों रेशम सारी लीन मँगाय ॥ ओढ़ी सारी काशमीर की चोलीबन्दकसे अधिकाय १५३ पैर महाउर को लगवाग्रो नैनन सुरमा लीन लगाय ॥ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजैं त्यहिपर पायजेब हहराय १५४ पहिरि करगता करिहाँयैमा नई नई चुरियाँ लीन मँगाय ॥ ग्वरिग्वरिबिहियाँ हरिहरिचुरियाँ शोभा कही बून ना जाय १५५ अगे आगेला पिछे पछेला तिन बिच ककना करें बहार ॥ जोसन पट्टी बांधि बज़ुल्ला टाँड़ै भुजन केर श्रृंगार १५६ को गति बरणै तहँ हमेल कै चमकै हार मोतियनक्यार ॥ नथुनी लटकन पहिरिनासिका कानन करनफूलकोथार १५७ गुज्झी पहिरी दोउ कानन में टीका मस्तक करै बहार ॥ बँदिया शिर पर सोनेवाली पैरन बिछिया की झनकार १५८ अनवट पहिरे द्वउ अँगुठन में हाथन लीन आरसीधार ॥ मुँदरी छल्ला सब अँगुरिनमा रानी खूबकीन श्रृंगार १५६ बिदा माँगिकै महतारी ते ह्वाँ चलि दिये कन्नौजीराय ॥ द्वार राखिकै उदयसिंह का रानी महलगये फिरिआय १६० रानी कुसुमा आवत दीख्यो तुरतै उठी तड़ाकाधाय ॥ पकरिकै बाहू द्वउ प्रीतमकी पलँगा ऊपर लीन बैठाय १६१ पंसासारी को मँगवावा सखियाँ लाईं तुरत उठाय ॥ बड़ी खातिरी करि पदमाकै खेलन लाग कन्नौजीराय १६२ कुसुमा बोली तब लाखनि ते स्वामी हाल देउ बतलाय ॥ किह्यो तयारी तुम कहँना की काहेगयो अचाकाआय १६३ सुनिकै बातें ये पदमा की बोला तुरत कन्नौजीराय ॥ किरिया कीन्ही हम ऊदन ते औबातील गंगमँझाय १६४

१६ आल्हखण्ड । ४७५ जबै मोहोबे को तुम चलिहौ चलिबे साथ बनाफरराय ॥ आजु साँकरा परिमालिक पर औ चढ़िआवा पिथौराराय १६५ संगै जैबे हम ऊदन के करिबे जूझ तहाँपर जाय ॥ जो मरिजबै समरभूमि मा तौ यशरही लोकमाछाय १६६ जो बचि अइबे हम मोहबे ते रानी संग करब फिरि आय ॥ सुनिकै बातें लखराना की पदमिनिगिरीपछाराखाय १६७ होश उड़ाने महरानी के पीले अंग भये अधिकाय ॥ थर थर देही काँपन लागी रोवाँ सकल उठे तन्नाय १६८ यह गति देख्यो महरानी कै तब गहिलीन कनौजीराय ॥ चूम्यो चाट्यो बदन लगायो धीरज फेरिदीनअधिकाय १६६ रानी पदमिनि पलँगा बैठी नैनन आँसू रही बहाय ॥ बोले लाखनि तब पदमिनि ते रानी काह गयी बौराय १७० बिटिया आहिउ का बनिया की जो रण सुनिकै गयी डराय ॥ भरम न राखै क्षत्रानी मन रानी साँचदीन बतलाय १७१ सुनि सुनि बातें लखराना की रानी गयी सनाकाखाय ॥ मनमा शोचै मनै विचारै मनमन बारबार पछिताय १७२ धीरज धरिकै पदमिनि बोली प्रीतम साँच देयँ बतलाय ॥ कहे रुकाचिन के लाग्यो ना नहिं सब जैहैं कामनशाय १७३ कहाँ कनौजी तुम महराजा चाकर कहाँ बनाफरराय ॥ नौकर स्वामी की समता ना विद्या काह दयी बिसराय १७४ बनते कन्या धरि आई ती त्यहिके अर्ही बनाफरराय ॥ अर्ही कुकरहा परिमालिक के तुम्हरीकीनगुलामीआय १७५ साथ गुलामन औ राजा का कहँ तुम पढ़ा कनौजीराय ॥ किरिया कीन्ही जो ऊदन ते स्वामी ताहि देउ बिसराय १७६

आल्हाकामनावन । ४७६ १७ सवैया ॥ स्वस्थिर चित्त बिचार करौ यह नाथ सबै बिधि बात अनैसी । रूप औ यौवन छाँड़ितिया सोपिया क्यहिभांतिकहौ तुमऐसी॥ धीरजवन्त कुलीनन की गति नाथ विचारि कहौ तुम कैसी । बात सुहात नहीं ललिते अनरीतिकि प्रीतकरी तुम जैसी १७७ सुनिकै बातें ये पदमिनि की बोला फेरि कनौजीराय ॥ कउने गँवार की बिटियाहै हमते टेढ़ि मेढ़ि बतलाय १७८ ऐसी बातें अब बोलेना दशनन चापि जीभको लेय ॥ जो नहिं जावैं सँग ऊदन के तौसबजगतअयशकोदेय १७६ कहा न मानैं हम काहू को निश्चय जानु मोर प्रस्थान ॥ इतना सुनिकै कुसुमा बोली स्वामी करो बचन परमान १८० राति बसेरा करि महलन मा भुरहीं कूच दिह्यो करवाय ॥ अम्बरे संगकी सखी सहिलरी डुइइइ बालकरहीं खिलाय १८१ दुनियादारी कछु जानी ना कबहुँ न धरा सेज पै पायँ ॥ कैसे काटब हम यौवन का प्रीतम साँचदेउ बतलाय १८२ तुम्हें मोहेबे का जाना रह नाहक लाये गवन हमार ॥ मई बाप का फिरि गरिआवै दैके बार बार धिक्कार १८३ सुनि सुनि बातें ये पदमिनिकी बोला फेरि कनौजीराय ॥ लौटि मोहोबे ते आवब जब रानी संग करब तब आय १८४ द्वार बनाफर उदयसिंह हैं रानी मोह देउ बिसराय ॥ संकट टारे बिन मल्हना के हमको योग रोग दिखलाय १८५ साथ बनाफर के हम जैहैं अइहैं जीति पिथौरा राय ॥ कीरति गैहै सब दुनिया मा रानी संग करब तब आय १८६

१८ आल्हखण्ड । ४८० इतना कहिकै लाखनि चलिभे रानी पकरिलीन बैठाय ॥ करी बदरिया तुमका ध्यावैं कउँधाबीरनकीबलिजायँ १८७ झिमिकिकैवरसोम्वरेमहल नमा कन्ता एक रैनि रहिजायँ ॥ इतना सुनिकै लाखनि बोले रानी साँच देयँ बतलाय १८८ पाथर बरसैं आसमान ते तबहुं न रहैं कनौजीराय ॥ लौटि मोहोवे ते आवब जब रानी संग करब तब आय १८६ तेज न रहै जो देहीमा को मुहँ धरी पिथौराक्यार ॥ मुची परि है बादशाह ते लड़िहैं बड़े बड़े सरदार १६० लौटि मोहोवे ते आवब जब रानी कहा न टारब त्वार ॥ अब हम जावत हैं जल्दी सों द्वारे उदयसिंह सरदार १६१ सुनिकै बातें ये लाखनि की रानी फेरि लीन बैठाय ॥ कैसे रहिबे हम कनउज में स्वामी देउ मोहिं बतलाय १६२ पगिया अरझी तब मोहवे मा यहु मरि जाय बनाफरराय ॥ हाय ! पियारे ज्यहि प्रीतम को ज्वानीसमयदीन अलगाय १६३ भुखी भवानी आल्है भक्षी इन्दल सहित लहुरवाभाय ॥ भरी जवानी ज्यहि प्रीतमको हमते अलगदीन करवाय १६४ काहे जनमी द्यावलि इनका ई दहिजार बड़े बरियार ॥ सुनवाँ फुलवा चित्तररेखा तीनों होउ बिना भरतार १६५ करो बियारी तुम महलन मा पलँगा उपर करो विश्राम ॥ मोरि जवानी स्वारथ करिकै तब तुम जाउ मोहोवेग्राम १६६ सुनिकै बातें ये पदमिनि की बोला फेरि कनौजीराय ॥ खड़ा बनाफर है द्वारे मा रानी काह गई बौराय १६७ अब तुम ध्यावो फूलमती का तेई फेरि मिलैहैं आय ॥ धर्म पतिव्रत का छाँड़यो ना गाही कहैं तोहिं समुझाय १६८

आल्हाकामनावन । ४८१ १० गारी देवो नहिं ऊदन का प्यारी मित्र हमारो जान ॥ करैं बियारी नहिं महलन में प्यारी सत्य प्रतिज्ञा मान १६६ सुनिकै बातैं लखराना की पदमा ठीक लीन ठहराय ॥ प्रीतम हमरे अब मनिहैं ना जैहैंअवशि मोहोबा धाय २०० यहै सोचिकै मन अपने मा रानी बोली फेरि सुनाय ॥ डोला हमरा सँगमा लैके राजन कूच देव करवाय २०१ मोरि लालसा यह इवालतिहै बालम मोहबा देउ दिखाय ॥ बनोवास को रघुनन्दन गे सीता लैगे साथ लिवाय २०२ सुर औ असुरन के संगर मा दशरथ साथ केकई माय ॥ लै सतिभामा कृष्णचन्द्र सँग भौमासुरै पछारा जाय २०३ जिन मर्याद्दा यह बाँधी है तेई नारि संग मा लीन ॥ बड़े प्रतापी कृष्णचन्द्र जी सोऊ पन्थ सत्य यह कीन २०४ आगे चलिगे जो क्षत्री हैं तिनमग चलनवही महराज ॥ संग में लैके बालम चालिये करिये सत्य धर्मको काज २०५ इतना कहिकै रानी पदमा आँखिनभरे आँसु अधिकाय ॥ तब लखराना लै रुमाल को आँसूपोंछि कहा समुझाय २०६ धीरज राखो चार मास लौं पँचये मिलब तुम्हें हम आय ॥ सत्य सनेहू ज्यहि ज्यहिपर है सोत्यहिमिलैतड़ाकाधाय २०७ यामें संशय कछु नाहीं है ब्राह्मण रोज कहैं यह गाय ॥ शास्त्र पुरातन की बानी यह रानी तुम्हें दीन बतलाय २०८ धर्म पतिव्रत ज्यहि नारी के प्यारी प्रीतम के अधिकाय ॥ कहा न टारै सो प्रीतम का चहु जस परै आपदा आय २०६ जो विलगावौ अब महलन मा तौ सब कीरति जाय नशाय॥ हँसै बनाफर म्वाहं मारग मा मेहरा बड़े कनौजीराय २१० ॥

आल्हखण्ड । ४८२ शोहरा फैली यहु दुनिया मा हँसिहैं जाति बिरादर भाय ॥ मेहरा लड़का रतीभान का सँगमालिहे जनानाजाय २११ तैसो समया अब नाहीं है जैसे समय भये रघुराय ॥ बड़े प्रतापी कृष्णचन्द्रजी द्वापरजन्मलीनतिनआय २१२ कलियुग बाबा की रजधानी रानी कहा गई बौराय ॥ दया धर्म दुनिया तें उठिगे दर दर सत्य पछारा जाय २१३ घर घर कुलटा हैं कलियुग में नर नर पाप भरा अधिकाय ॥ जर जर जरना है दुनिया मा हर हर हरी हरी बिसराय २१४ आखिर मरना है दुनिया मा लरना धर्म हमारा आय ॥ इतना कहिकै चला कनौजी रानी फेरि लीन बैठाय २१५ दिया बुझायो तुम परहुलका इतना किह्यो राहमें जाय ॥ पाँव पिछारी का डारयो ना चहुतनधजीधजीउड़िजाय २१६ कीरति प्यारी नर नारिन के निन्दा सुने मौत है जाय ॥ तहिले ठाकुर बघऊदन जी लाखनिलाखनिरहेबुलाय २१७ हाँक पाय कै बघऊदन कै तुरतै चला कनौजीराय ॥ द्वारे मिलिकै बघऊदन को जयचंदसभागयोफिरिधाय २१८ मस्तक धरिकै दुउ चरणनमा लाखनि ठाढ़भयो शिरनाय ॥ तब शिर सूंध्यो जयचंदराजा आयसु फेरिदीन हर्षाय २१९ आल्हा ऊदन को बुलवायो लाखनि बाँह दीन पकराय ॥ तुम्हें कनौजी का सौंपत हैं दोऊ सुनो बनाफरराय २२० सुनिकै बातें महराजा की दोऊ भाय बनाफरराय ॥ बोलन लागे महराजा ते राजन साँचदेयँ बतलाय २२१ जहाँ पसीना लखराना का तहँ गिरि जैहैं मूड़ हमार ॥ यामें संशय कछु नाहीं है मानो सत्य भूमिभरतार २२२

आल्हाकामनावन । ४८३ २१ इतना कहिकै आल्हा ऊदन लाखनि साथ चले शिरनाय ॥ बाजे डंका अहलंका के हाहाकार शब्द गे छाय २२३ चारों राजा गाँजर वाले बारहु कुँवर बनौधा केर ॥ लला तमोली धनुवाँ तेली इनते कहा चँदेले टेर २२४ लाखनि तुमका हम सौंपत हैं रक्षा किह्यो सबै सरदार ॥ बंश लकड़िया यह इकली है इतना लीन्ह्यो खूब विचार २२५ इतना कहिकै जयचँद राजा पंडित लीन्ह्यो तुरत बुलाय ॥ प्रथम पुजायो श्रीगणेश को पाछे तिलक दिह्यो करवाय २२६ गजाननहिं अरु लम्बोदर को तीसर गणाध्यक्ष को ध्याय ॥ सुमिरि भवानीसुत गणेशको लेशकलेश दीनबिसराय २२७ रानी तिलका पूजन कीन्ह्यो भूरी हथिनी तुरत मँगाय ॥ थाती सौंप्यो लखराना को हथिनीसम्मुख बैन सुनाय २२८ फिरि कर पकरयो लखरानाका ऊदन हाथ दीन पकराय ॥ मोहिं अभागिनि के बालककी रक्षा किह्यो बनाफरराय २२९ सुनिकै बातें महरानी की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ जहाँ पसीना लखराना का तहँ हम मूड़ देयँ कटवाय २३० घाटि न जानैं हम भाई ते माता साँच देयँ बतलाय ॥ फिकिरि न राख्यो लखरानाकी इनको बार न बाँको जाय २३१ इतना कहिकै महरानी ते ऊदन फेरि कहा ललकार ॥ करो तयारी अब मोहबे की सबियाँ शूरवीर सरदार २३२ हुकुम पायकै बघऊदन का सबहिन बाँधिलीन हथियार ॥ हथी चदैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार २३३ पायँ लागिकै दोउ तिलका के भूरी चढ़ा कनौजियाराय ॥ बजे नगारा त्यहि समया मा हाहाकार शब्द गा छाय २३४

५२ - आल्हाखण्ड । ४८४ मारु मारु कै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल २३५ आगे हलका भे हाथिन के पाछे चलन लाग असवार ॥ बीच म डोला महरानिन के ह्वैगे अगलबगल सरदार २३६ भूरी हथिनी पर लाखनि हैं ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ आल्हा बैठे पचशब्दा पर इन्दल सहित भये तय्यार २३७ कीनि सवारी हरनागर पर भैने जौनु चँदेले क्यार ॥ घोड़ मनोहरपर देवा है सय्यद सिर्गापर असवार २३८ लला तमोली धनुवाँ तेली येऊ लिये ढाल तलवार ॥ पैदल सेना अनगन्ती सब गर्जतचलीसमरत्यहिबार २३९ चारिकोस जब परहुल रहिगा लाखनि डेरा दीन डराय ॥ लाखनि बोले तहँ आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय २४० दियना अंटापर परहुल मा सो त्यहि आप देउ उतराय ॥ बचन मानिकै हम पदमिन के वादा कीन तहांपर भाय २४१ दियना शालत है जियरे मा मानो कही बनाफरराय ॥ सुनिकै बातें कनौजिया की आल्हाधावनलीनबुलाय२४२ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को परहुल तुरत दीन पठवाय ॥ जहाँ कचहरी है सिंहा कै धावन तहाँ पहुँचा जाय २४३ चिट्ठी दै कै महराजा का बाकी हाल कहा शिरनाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी सिंहा जरिगा डंका तुरतदीन बजवाय २४४ धावन चलिभा तब परहुल ते लश्कर फेरि पहुँचा आय ॥ कही हकीकति सब आल्हा ते तब जरिगये कनौजीराय२४५ हुकुम लगायो अपने दलमा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजिकै सेना दुहुँतरफा ते पहुँची समरभूमिमें आय २४६

आल्हाकामनावत । ४८५ ५३ लाखनि राना इत हाथी पर वैसी परहुल का सरदार ॥ भाला छूटे असवारन के पैदलचलनलागितलवार २४७ झुके सिपाही दुहुँ तरफा के लागे करन भड़ाभड़ मार ॥ मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार २४८ बड़ी लड़ाई मै परहुल में लाखनि राना के मैदान ॥ लड़ैं सिपाही दुहुँ तरफा के कटि २ गिरैंसुघरूवाज्वान२४९ उठि उठि ठाकुर लरैं खेत में कहुँ कहुँ रुण्ड करैं तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार २५० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे अहिर विडारै गाय ॥ तैसे मारै ऊदन ठाकुर सिंहाफौजगई बिललाय २५१ भागीं फौजै जब परहुल की लाखनि हाथी दीन बढ़ाय ॥ लाखनिराना के मुर्चा मा सिंहा आपु पहुँचा आय २५२ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे दोऊ लड़न लागि सरदार ॥ सिंहा मार्यो तलवारी को लाखनिलीन ढालपरवार २५३ भाला मार्यो लखराना ने नीचे गिरा महाउत आय ॥ बलछी मारा सिंहा ठाकुर लाखनि लैगे वार बचाय २५४ खाली वार परी सिंहा की लाखनि तुरत लीन बँधवाय ॥ जायकै पहुँचे फिरि परहुल मा तुरतै दिया दीन गिरवाय २५५ लैके फौजैं सिंहा ठाकुर संगै कूच दीन करवाय ॥ कोस अढ़ाई कुड़हरि रहिगा डेरा तहाँ दीन डखाय २५६ भैने बोल्यो परिमालिक का मानो कही बनाफरराय ॥ गंगा ठाकुर कुड़हरि वाला कोड़ा घोड़ा लीन चुराय २५७ सवा लाख का सो कोड़ा है जो बनवा राजापरिमाल ॥ महामुशकिलिन घोड़ा दीन्ह्यो कोड़ानहींदीनत्यहिकाल २५८

२४ आल्हाखण्ड । ४८६ कीन प्रतिज्ञा हम कुड़हरिमां लौटति नगर ल्याब लुटवाय ॥ साँची करिये यहि समया मा मानो कही बनाफरराय २५६ इतना सुनिकै ऊदन जरिगे तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥ लागैं तोपैं अब कुड़हरि मा सबियाँगर्द देउ मिलवाय २६० इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही बनाफरराय ॥ गंगाधर कुड़हरि का राजा मामा सगो हमारो आय २६१ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को उनको खबरि देउ करवाय ॥ मैने तुम्हरे लाखनि आये कोड़ा आपु देउ पठवाय २६२ सुनिकै बातें लखराना की चिट्ठी लिखा बनाफरराय ॥ तुरतै धावन को बुलवायो औ कुड़हरिको दीनपठाय २६३ लैके चिट्ठी धावन चलिभा औ दरबार पहुँचाजाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो गंगाधर को धावन हाथजोरिशिर नाय २६४ कही हकीकति सब गंगा ते जो कछु कह्यो बनाफरराय ॥ सुनि संदेशा पढ़ि चिट्ठी को ठाकुरक्रोधकीनअधिकाय २६५ तुरत नगड़ची को बुलवायो डङ्का दीन तहाँ बजवाय ॥ कह्यो सँदेशा फिरि धावन ते आल्है खबरि जनावोजाय २६६ राजा आवत समरभूमि में कोड़ा लेउ तहाँ पर आय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिभा आल्है खबरि बताईजाय २६७ बाजे डङ्का ह्याँ कुड़हरि मा क्षत्री होन लागि तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार २६८ झीलम बख्तर पहिरि सिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणकाहोनलागब्यवहार २६६ चढ़िकै हथिनी गंगा ठाकुर तुरतै कूच दीन करवाय ॥ चारि घरी का अरसा गुजरा पहुँचे समरभूमिमाआय २७०

आल्हाकामनावन । ५८७ २१ जहँना हाथी गंगाधर का तहँ पर गये कनौजीराय ॥ कहि समुझावा भल मामा का कोड़ा अबै देउ मँगवाय २७१ नहीं बनाफर उदयसिंह जी कुड़हरि गर्द देयँ करवाय ॥ कौन दुसरिहा है आल्हा का सरबर करै समरमें आय २७२ त्यहिते तुमका समुझाइत है मामा कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै गंगा जरिगे बोले सुनो कनौजीराय २७३ काह हकीकति है आल्हा कै हमते कोड़ा लेयँ मँगाय ॥ एक बनाफर कै गिन्ती ना लाखनचढ़ैं बनाफरधाय २७४ हमते कोड़ा को पैहैं ना मैने साँच दीन बतलाय ॥ इतना सुनिकै चले कनौजी तम्बुन फेरि पहुँचे आय २७५ बत्ती दैदै दुहुँ तरफा ते तोपन दीन्हीं रारि मचाय ॥ अररर अररर गोला छूटे हाहाकार शब्दगा छाय २७६ गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥ जउने ऊंट के गोला लागै तुरतै कूला जुदा है जाय २७७ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के साथै उड़ा चील्ह अस जाय ॥ जउने रथमा गोला लागै ताके टूक टूक है जायें २७८ गोला लागै ज्यहि घोड़े के मानो मगर कुल्याचै खायँ ॥ अँधाधुंध भा दूनों दलमा धुवना रहा सरगमें छाय २७९ चुकी बरूदैं जब तोपन की तब फिरि मारु बन्द है जाय ॥ दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेतरणआय २८० कहूँकहूँ भाला कहूँकहूँ बरछीं कहूँ कहूँ कड़ाबीनकी मार ॥ गोली ओला सम कहुँ बरषैं कोताखानी चलैं कटार २८१ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार २८२

२६ आल्हखण्ड । १८८८ ना मुँह फेरैं कुड़हरि वाले ना ई मोहबे के सरदार ॥ कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि रणमा चलै खूब तलवार २८३ भागि सिपाही कुड़हरि वाले अपने डारि डारि हथियार ॥ गंगा ठाकुर के मुर्चा मा आवा उदयसिंह सरदार २८४ ऍंड़ लगावा तब बेंबुल के हाथी उपर पहुँचा जाय ॥ भाला मारा बघऊदन ने गंगा लैगा वार बचाय २८५ तवलों आये आल्हा ठाकुर हाथी भिड़ा बरोबरि आय ॥ दैकै साँकरि पचशब्दा को तुरतै कैदलीन करवाय २८६ लैकै फौजैं ऊदन ठाकुर कुड़हरिशहर लीन लुटवाय ॥ काछी कुरमी तेली भागे कोरीभागि थानविसराय २८७ दर्जी भुर्जी सब भागे तहँ भागे बड़े बड़े महराज ॥ कौन बखानै त्यहि समयाकै रहिगैनहींक्यहूँकहूँलाज २८८ साँच वातकरि जगनायक कै दीन्ह्यों लूट बन्दकरवाय ॥ लैकै कोड़ा बौना चलिभा आल्हानजरिगुजाराजाय २८६ कोड़ा दीन्ह्यो जगनायक को आल्हा तुर्त तहाँ बुलवाय ॥ कैद छुड़ाय दई गंगा की आदर कियो कन्नौजीराय २६० लैकै फौजैं गंगा ठाकुर साथै कूच दीन करवाय ॥ चलिभालश्कर कनौजियाका यमुना उपर पहुँचा जाय २६१ मज्जन करि कै श्रीयमुनाजल पाछे शम्भुचरण धरि ध्यान ॥ संध्या तर्पण विधिवत करिकै दीन्ह्योद्विजनतहाँपरदान २६२ कूच करायो श्रीयमुना ते कलपी पास पहुँचे जाय ॥ लैकै फौजैं लाखनिराना कलपीशहरलीनलुटवाय २६३ ऊदन बोले तब लाखनि ते यह्र का कीन कन्नौजीराय ॥ बदले कुड़हरिके लुटवावा मानो साँच बनाफरराय २६४

आल्हाकामनावन । ४८६ २७ बातैं सुनिकै लखराना की देवा कहा तुरत शिरनाय ॥ साँचे धर्मन के राँचे हैं याँचे मिले कनौजीराय २६५ कर्म कुलीनन के कीन्हे हैं साँचे मित्र बनाफरराय ॥ बातैं सुनिकै ये देवा की बोले तुरत उदयसिंहराय २६६ स्याबसि स्याबसि लाखनिराना कीन्ह्यो धर्म युद्धसों रार ॥ काहे न होवै यश क्षत्रिन को ऐसे युद्ध बीर बरियार २६७ इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतै कूच दीन करवाय ॥ नदी बेतवा के ऊपर मा छोरी कमर बनाफरराय २६८ डेरा गड़िगे तहँ क्षत्रिन के तम्बू गड़ा बनाफर क्यार ॥ जहँ महराजा लाखनि बैठे भारी लाग तहाँ दरबार २६६ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भैने गयो चँदेले क्यार ॥ कलम दवाइति कागज लैके आल्हा पत्र कीन तैयार ३०० चिट्ठी दीन्ही आल्हा ठाकुर बोले उदयसिंह सरदार ॥ खबरि जनावो तुम मल्हनाको आये कनउज राजकुमार ३०१ हमरी दादाकी दिशि हैंकै रानिन कीन्ह्यो दण्ड प्रणाम ॥ काह हकीकति है पिरथी कै सुखसोंकरो महल बिश्राम ३०२ जितनी बिल्ली हैं दिल्ली की किल्ली पकरि नचावों माय ॥ तौ तौ साँचे हम ऊदन हैं यहतुमकह्योसँदेशाजाय ३०३ सुनि संदेशा बघऊदन का हरनागरै लीन कसवाय ॥ चढ़ा तड़ाका हरनागर पर जगनिकयथातथ्यशिरनाय ३०४ नदी बेतवाको उतरत भा पहुँचत भयो मोहोबेद्वार ॥ फाटक खोल्यो दरवानी ने पहुँचे राजभवन सरदार ३०५ रानी मल्हना के महलन मा माहिल आयगयो त्यहिबार ॥ तबलौं पहुँचे जगनायक जी बोला उरई का सरदार ३०६

२८ आल्हाखण्ड । ४६० कवलों अइहैं आल्हा ठाकुर नीके हवैं बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै जगनायक जी तुरतै बोले बचन बनाय ३०७ हिंया न अइहैं आल्हा ठाकुर अब चहु करू मनावनजाय ॥ उनकै खातिर कनौजिया घर नीके दऊ बनाफरराय ३०८ पारस लैके तुम कुठरी ते पिरथी पास देउ पहुँचाय ॥ लैके कुंजी जगनायक जी कुठरीखोलिदीनवतलाय ३०६ उठे झड़ाका माहिल ठाकुर कुठरी अटे तड़ाकाधाय ॥ साँकरिमारी जगनायक जी ताला तुरत दीन डरवाय ३१० बन्द कुठरिया माहिल ठाकुर मल्हना गई सनाकाखाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो फिरिजगनायक औसबहालकह्योसमुझाय ३११ पढ़िकै चिट्ठी मल्हना रानी औ जगनायक संग लिवाय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक की चिट्ठी तहाँ दिखाई जाय ३१२ छन्द ॥ पढ़ि पत्रतहाँ। लहिमोद महाँ॥ परिमाल जहाँ। तजिशोकतहाँ॥ भवनमें आय । महासुख पाय ॥ लखिकैदतहाँ । उरई को जहाँ ॥ महरानि गई । तजि बन्धु दई ॥ अतिबेगचला । उरईको लला ॥ पृथिराजजहाँ। स्वउ आयतहाँ॥ सबहालकहा। बिपदाजोलहा३१३ सुनिकै बातें सब माहिल की यहु महराज पिथौराराय ॥ घाट बयालसि तेरहघाटी सबियाँतुरंतदीन रुकवाय ३१४ पहरा घूमें कहुँ पैदल का कहुँ कहुँ फिरैं घोड़असवार ॥ अनँद बधैया मोहबे बाजै घर घर होयं मंगलाचार ३१५ फाटक बन्दी है मोहवे मा घरका अवै न बाहर जाय ॥ आल्हा ऊदन की कीरति तहँ घर घर रहे नारि नर गाय ३१६ आल्ह मनौआ पूरण करिकै ध्यावों रामचन्द्र महराज ॥

आल्हाकामनावन । ४६१ २६ जलथलजनमों जहँ दुनियामा होवों तहाँ भक्त शिरताज ३१७ पिता मातु के मैं चरणन का ध्यावों बार बार शिरनाय ॥ जिन बल गाथा यह पूरण भै भुजबलनहीं भरोसाभाय ३१८ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ३१६ आशिर्बाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतगाथकसगाय ३२० रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ३२१ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को ह्वाँते करों तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त ३२२ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृत आल्हामनावनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ ठाकुरआल्हासिंहजीकामनावन सम्पूर्ण ॥ इति ॥

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अथ आल्हखण्ड ॥ नदीबेतवापरलाखनिपृथ्वीराज काप्रथमयुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ रामसिया पद दोउ मनाय सो ध्याय शिवा शिव चर्ण यथारथ । कीरति कृष्ण बखान करों जिनके बलसों बलवान भे पारथ ॥ भीषम कर्ण सुयोधन ज्वान महान सबै मरिगे रणभारथ । चाहत कृष्ण नहीं ललिते बलते थलते जगते सो अकारथ १ सुमिरन ॥ दशरथ नन्दन को बन्दन करि सीता चरण कमलको ध्याय ॥ सुमिरि भवानी शिवशंकर को औ यदुनन्दन चरण मनाय १ बड़े प्रतापी कुंती नन्दन बन्दन करों युधिष्ठिरराय ॥ गदा प्रहारी भीमसेन को ध्यावों बार बार शिरनाय २ शूर धनुर्धर नर अर्जुन की कीरति सकै कौन नर गाय ॥

२ आल्हाखण्ड। ४६४ विद्या पूरण सहदेऊ की कीरति रही जगतमें छाय ३ बड़ा प्रतापी रण मण्डल मा नकुलो समरधनी तलवार ॥ करण न होतो जो दुनिया मा तौ को होत दान वरियार ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो पिथौरा क्यार ॥ नदी बेतवाके डाँड़ेपर लाखनि करी खूब तलवार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भारी लाग राज दरवार ॥ त्यही समैया त्यहि औसर मा बोले उदयसिंह सरदार १ घाट बयालस पिरथी रोंके दादा करो कछू तदबीर ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले ऊदन धरो हृदय में धीर २ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर तुरतै पान दीन धरवाय ॥ है कोउ योधा दूनों दल मा जो बितवा पर पान चवाय ३ इतना सुनिकै दोऊ दल के क्षत्री गये सनाकाखाय ॥ बोलि न आवा क्यहु क्षत्री ते सबहिन मूड़ लीन अउँधाय ४ ऊदन तड़पे त्यहि समया मा पहुँचे पाननिकट फिरिजाय ॥ आल्हा बोले तब ऊदन ते मानो कही लघुरवाभाय ५ अबती बारी है लाखनि कै गाँजर फते कीन तुम जाय ॥ नदी बेतवा के मोर्चा पर जावैं अवशि कनौजीराय ६ मीराताल्हन धनुवाँ तेली बोले दोऊ शीश नवाय ॥ तजी सम्पदा सब कनउज की आये लड़न कनौजीराय ७ नव दिन दश दिन भे गौने के सो तजिदई पदमिनी नारि ॥ बीरा खैये लाखनि राना करिये नदी भयानक रारि ८ बात बराबरी की सहिये ना चहिये जायँ नदी पर प्रान ॥ बातैं सुनिकै ये सय्यद की बीरा लीन कनौजी जवान ६