आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ आल्हाखण्ड । ४८६ कीन प्रतिज्ञा हम कुड़हरिमां लौटति नगर ल्याब लुटवाय ॥ साँची करिये यहि समया मा मानो कही बनाफरराय २५६ इतना सुनिकै ऊदन जरिगे तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥ लागैं तोपैं अब कुड़हरि मा सबियाँगर्द देउ मिलवाय २६० इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही बनाफरराय ॥ गंगाधर कुड़हरि का राजा मामा सगो हमारो आय २६१ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को उनको खबरि देउ करवाय ॥ मैने तुम्हरे लाखनि आये कोड़ा आपु देउ पठवाय २६२ सुनिकै बातें लखराना की चिट्ठी लिखा बनाफरराय ॥ तुरतै धावन को बुलवायो औ कुड़हरिको दीनपठाय २६३ लैके चिट्ठी धावन चलिभा औ दरबार पहुँचाजाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो गंगाधर को धावन हाथजोरिशिर नाय २६४ कही हकीकति सब गंगा ते जो कछु कह्यो बनाफरराय ॥ सुनि संदेशा पढ़ि चिट्ठी को ठाकुरक्रोधकीनअधिकाय २६५ तुरत नगड़ची को बुलवायो डङ्का दीन तहाँ बजवाय ॥ कह्यो सँदेशा फिरि धावन ते आल्है खबरि जनावोजाय २६६ राजा आवत समरभूमि में कोड़ा लेउ तहाँ पर आय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिभा आल्है खबरि बताईजाय २६७ बाजे डङ्का ह्याँ कुड़हरि मा क्षत्री होन लागि तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार २६८ झीलम बख्तर पहिरि सिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणकाहोनलागब्यवहार २६६ चढ़िकै हथिनी गंगा ठाकुर तुरतै कूच दीन करवाय ॥ चारि घरी का अरसा गुजरा पहुँचे समरभूमिमाआय २७०