आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाकामनावन । ५८७ २१ जहँना हाथी गंगाधर का तहँ पर गये कनौजीराय ॥ कहि समुझावा भल मामा का कोड़ा अबै देउ मँगवाय २७१ नहीं बनाफर उदयसिंह जी कुड़हरि गर्द देयँ करवाय ॥ कौन दुसरिहा है आल्हा का सरबर करै समरमें आय २७२ त्यहिते तुमका समुझाइत है मामा कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै गंगा जरिगे बोले सुनो कनौजीराय २७३ काह हकीकति है आल्हा कै हमते कोड़ा लेयँ मँगाय ॥ एक बनाफर कै गिन्ती ना लाखनचढ़ैं बनाफरधाय २७४ हमते कोड़ा को पैहैं ना मैने साँच दीन बतलाय ॥ इतना सुनिकै चले कनौजी तम्बुन फेरि पहुँचे आय २७५ बत्ती दैदै दुहुँ तरफा ते तोपन दीन्हीं रारि मचाय ॥ अररर अररर गोला छूटे हाहाकार शब्दगा छाय २७६ गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥ जउने ऊंट के गोला लागै तुरतै कूला जुदा है जाय २७७ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के साथै उड़ा चील्ह अस जाय ॥ जउने रथमा गोला लागै ताके टूक टूक है जायें २७८ गोला लागै ज्यहि घोड़े के मानो मगर कुल्याचै खायँ ॥ अँधाधुंध भा दूनों दलमा धुवना रहा सरगमें छाय २७९ चुकी बरूदैं जब तोपन की तब फिरि मारु बन्द है जाय ॥ दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेतरणआय २८० कहूँकहूँ भाला कहूँकहूँ बरछीं कहूँ कहूँ कड़ाबीनकी मार ॥ गोली ओला सम कहुँ बरषैं कोताखानी चलैं कटार २८१ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार २८२