आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंआल्हाकामनावन । ४८१ १० गारी देवो नहिं ऊदन का प्यारी मित्र हमारो जान ॥ करैं बियारी नहिं महलन में प्यारी सत्य प्रतिज्ञा मान १६६ सुनिकै बातैं लखराना की पदमा ठीक लीन ठहराय ॥ प्रीतम हमरे अब मनिहैं ना जैहैंअवशि मोहोबा धाय २०० यहै सोचिकै मन अपने मा रानी बोली फेरि सुनाय ॥ डोला हमरा सँगमा लैके राजन कूच देव करवाय २०१ मोरि लालसा यह इवालतिहै बालम मोहबा देउ दिखाय ॥ बनोवास को रघुनन्दन गे सीता लैगे साथ लिवाय २०२ सुर औ असुरन के संगर मा दशरथ साथ केकई माय ॥ लै सतिभामा कृष्णचन्द्र सँग भौमासुरै पछारा जाय २०३ जिन मर्याद्दा यह बाँधी है तेई नारि संग मा लीन ॥ बड़े प्रतापी कृष्णचन्द्र जी सोऊ पन्थ सत्य यह कीन २०४ आगे चलिगे जो क्षत्री हैं तिनमग चलनवही महराज ॥ संग में लैके बालम चालिये करिये सत्य धर्मको काज २०५ इतना कहिकै रानी पदमा आँखिनभरे आँसु अधिकाय ॥ तब लखराना लै रुमाल को आँसूपोंछि कहा समुझाय २०६ धीरज राखो चार मास लौं पँचये मिलब तुम्हें हम आय ॥ सत्य सनेहू ज्यहि ज्यहिपर है सोत्यहिमिलैतड़ाकाधाय २०७ यामें संशय कछु नाहीं है ब्राह्मण रोज कहैं यह गाय ॥ शास्त्र पुरातन की बानी यह रानी तुम्हें दीन बतलाय २०८ धर्म पतिव्रत ज्यहि नारी के प्यारी प्रीतम के अधिकाय ॥ कहा न टारै सो प्रीतम का चहु जस परै आपदा आय २०६ जो विलगावौ अब महलन मा तौ सब कीरति जाय नशाय॥ हँसै बनाफर म्वाहं मारग मा मेहरा बड़े कनौजीराय २१० ॥