भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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५२ - आल्हाखण्ड । ४८४ मारु मारु कै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल २३५ आगे हलका भे हाथिन के पाछे चलन लाग असवार ॥ बीच म डोला महरानिन के ह्वैगे अगलबगल सरदार २३६ भूरी हथिनी पर लाखनि हैं ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ आल्हा बैठे पचशब्दा पर इन्दल सहित भये तय्यार २३७ कीनि सवारी हरनागर पर भैने जौनु चँदेले क्यार ॥ घोड़ मनोहरपर देवा है सय्यद सिर्गापर असवार २३८ लला तमोली धनुवाँ तेली येऊ लिये ढाल तलवार ॥ पैदल सेना अनगन्ती सब गर्जतचलीसमरत्यहिबार २३९ चारिकोस जब परहुल रहिगा लाखनि डेरा दीन डराय ॥ लाखनि बोले तहँ आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय २४० दियना अंटापर परहुल मा सो त्यहि आप देउ उतराय ॥ बचन मानिकै हम पदमिन के वादा कीन तहांपर भाय २४१ दियना शालत है जियरे मा मानो कही बनाफरराय ॥ सुनिकै बातें कनौजिया की आल्हाधावनलीनबुलाय२४२ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को परहुल तुरत दीन पठवाय ॥ जहाँ कचहरी है सिंहा कै धावन तहाँ पहुँचा जाय २४३ चिट्ठी दै कै महराजा का बाकी हाल कहा शिरनाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी सिंहा जरिगा डंका तुरतदीन बजवाय २४४ धावन चलिभा तब परहुल ते लश्कर फेरि पहुँचा आय ॥ कही हकीकति सब आल्हा ते तब जरिगये कनौजीराय२४५ हुकुम लगायो अपने दलमा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजिकै सेना दुहुँतरफा ते पहुँची समरभूमिमें आय २४६